महात्मा गांधी को गोडसे के हमले से बचाने वाले भिलारे गुरूजी का आज निधन




शायद आपमें कईयों को यह पता न हो कि बापू की जान लेने से पहले कई बार उन पर वार हुआ था। बापू के पोते तुषार गांधी ने अपनी 2017 में आई पुस्तक LET’S KILL GANDHI : A CHRONICLE OF HIS LAST DAYS, THE CONSPIRACY, MURDER. INVESTIGATIONS AND TRIAL में इस बारे में विस्तार से लिखा है।

इस पुस्तक के अनुसार, मोहनदास करमचंद गांधी पर पहली बार तब बम फेंका गया था जब वह हरिजन यात्रा में शामिल होने के लिए पूना आए थे। वह दिन 25 जून 1934 का था जब उन्हें दीक्षांत समारोह सभागार में भाषण देना था। तुषार गांधी अपनी पुस्तक में श्रीपद जोशी लिखित पुस्तक महात्मा, मेरे बापू के चौथे पाठ “मौत के मुंह से” का सन्दर्भ देते हुए कहते हैं जिसमें किसी चश्मदीद का बयान दर्ज है। दर्ज बयान के अनुसार “यह शाम पूना वासियों के लिए एक यादगार शाम था। गांधी छूत-छात जैसी समाजी बुराई को खत्म करने के लिए पूरे भारत की यात्रा के क्रम में यहाँ आये हुए थे। ब्रिटिश सरकार की नाखुशी के बावजूद पूना नगर निगम ने इस महान कार्य के लिए पूना वासियों की ओर से उनके सम्मान का निर्णय लिया था। निगम हॉल खचाखच भरा हुआ था और गांधी जी को देखने के लिए गलियों में आदमी भरे पड़े थे। जैसे ही हमने सुना कि बापू आ गए, एक ज़ोरदार धमाका हुआ। सौभाग्य से उस गाड़ी में बापू नहीं थे वह किसी और की गाड़ी थी। धमाके के थोड़ी देर बाद गांधी आए उनका दुर्बल शरीर हमने देखा। वह कार्यक्रम हुआ। जब हम जा रहे थे तब सभी लोगों की तलाशी ली गयी लेकिन असल गुनाहगार भाग निकला था।“

दूसरा हमला नाथूराम गोडसे ने गांधी पर पंचघनी में किया था। गांधी ब्रिटिश सरकार ने पूना के आगा खान पैलेस को गांधी और उनके सहयोगियों के लिए जेल में तब्दील कर दिया था। गांधी को जेल में रहते हुए मलेरिया हो गया था जब वह वहां से क़ैद काट कर निकले तो वह पंचघनी में आराम करने के लिए चले गए। वहां वह दिलखुश गार्डन में स्वास्थ्य लाभ ले रहे थे तभी प्राइवेट बस से 15 से 20 नौजवानों का जत्था पंचघनी पहुंचा और पूरे दिन गांधी की मुखालफ़त में नारे लगाने लगा। जब गांधी को इस बारे में बताया गया तो उनकी मंशा हुई कि वह इस समूह के नेता से मिले। इस समूह का नेता और कोई नहीं गांधी को मारने वाला हत्यारा गोडसे था। लेकिन नाथूराम विनायक गोडसे ने इससे मना कर दिया।

शाम में गांधी जी जब प्रार्थना के लिए निकले तब उस प्रार्थना सभा में गोडसे कांग्रेसी कार्यकर्त्ता के रूप में पेश हुआ और चाकू लहराते हुए और गांधी के ख़िलाफ़ बोलते हुए गांधी की ओर लपका। तब वहां पर मौजूद मणिशंकर पुरोहित और भिलारे गुरूजी ने गोडसे को पकड़ कर क़ाबू में किया था। भिलारे बाद में महाबलेश्वर से कांग्रेस विधायक भी रहे। आज इनकी पुण्य तिथि है।

पुस्तक के अनुसार, इसके बाद भी गोडसे ने गांधी का पीछा नहीं छोड़ा और जब वह सेवाग्राम में जिन्ना से मिलने गए तो गोडसे ने धमकी दी थी कि वह गांधी को इस मीटिंग से रोकने के लिए कुछ भी करेगा। गांधी के इस विरोध में गोडसे के साथ एल.जी. थेते भी था। इस मीटिंग का विरोध आरएसएस और हिन्दू महासभा ने भी किया था। 29 जून, 1946 को गांधी जिस ट्रेन में सवार थे उसकी दुर्घटना भी कराई गयी थी और इसमें संभवतः गोडसे और आरएसएस का ही हाथ था। इसके बाद 20 जनवरी 1948 को गांधी जहाँ प्रार्थना सभा किया करते उससे मात्र 20 मीटर की दुरी पर बम फटा था जिसमें मदन लाल पहवा को पकड़ा गया था जिसने कबूल किया था कि यह बम गांधी को मारने के लिए फोड़े गए थे और फिर आएगा।

अंततः वह आया और बापू को मार गया। इस किताब में संभवतः बत्तख कियां द्वारा गांधी को बचाने के लिए किया गया प्रयास मौजूद नहीं है। 1917 में अंग्रेजों की मोतिहारी स्थित नील फैक्ट्री के मैनेजर इरविन ने महात्मा गांधी की हत्या की साजिश रची थी। लेकिन बत्तख मियां ने गांधीजी को इस बात से अवगत कराया और उनकी जान बचा ली।

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