मोरैंग विजय के बाद: कर्नल की डायरी – पन्ना 4




‘आज़ाद हिन्द फ़ौज’ के जवानों के हौसले और कामयाबी को देखकर नेताजी ने रेजिमेंट के जवानों को संबोधित करते हुए कहा था –

“बहादुरों, यदि तुम इसी तरह डटे रहे तो वह दिन दूर नहीं जब लाल किला भी तुम्हारी विजय पताका का अभिवादन स्वीकार करेगा.”

नेताजी के इस सिंहनाद ने हमारी जवान रगों में खून की रफ़्तार तेज़ कर दी थी. हमारे हौसले बुलंद थे. हम जवानों ने एक स्वर में उन्हें विश्वास दिलाया था – आप जो चाहते हैं वही हमारा फ़र्ज़ है, आप का हुक्म सर आँखों पर.

‘मोरैंग’ विजय के इस अवसर पर नेताजी ने कर्नल शौकत मल्लिक की बहादुरी को सम्मानित करते हुए ‘आज़ाद हिन्द फ़ौज’ की ओर से उन्हें विशिष्ट तगमा प्रदान किया था.

यकीनन वह एक ऐतिहासिक दिन था. नेताजी द्वारा दिए गए इस स्नेह और सम्मान ने उनकी शख्सियत को अहम् दर्जा दे दिया गया था. उस दिन हम जवानों को पहली बार लगा कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस उस इंसान का नाम है जो अपने फ़र्ज़ के लिए जितना हिम्मतवर, दिलेर और कठोर हैं अपने साथियों की हिम्मत और बहादुरी को इज्ज़त और प्यार देने में उतना ही फराख दिल. आज भी मैं पूरे यक़ीन के साथ कह सकता हूँ कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस में उम्दा लीडरशिप क्वालिटी इस क़दर कूट-कूट कर भरी थी कि ‘आज़ाद हिन्द फ़ौज’ के मुट्ठी भर जवान अँगरेज़ हुकूमत से हर वक़्त लोहा लेने को तैयार थे.

रंगून! मार्च सन 1944!

रंगून की वादियों से पतझड़ विदा ले चुका था. हवा में हलकी सी खुनक. बसंत के आने की सूचना थी यह. कुल मिलाकर मौसम बेहद खुशगवार हो चला था. पेड़ों पर कोपलें निकल आयी थी.

‘मौरैंग’ विजय के बाद हमारी फ़ौज का हौसला और ज़्यादा बुलंद हो चुका था. ठीक ऐसे ही वक़्त पर हमारी रेजिमेंट जनरल शाह नवाब खां के नेतृत्व में रंगून पहुंची थी, यह वह वक़्त था जब हिटलर और मित्र-राष्ट्रों की सेनाएं एक दुसरे पर जीत का दावा कर रही थीं. हमारी फ़ौज का रंगून पहुंचना कई मायनों में महत्वपूर्ण क़दम था.

रंगून पहुँचते ही नेताजी ने मुझे अपने पास बुलाया था. एकांत में बड़े आत्मविश्वास के साथ उनहोंने कहा था,

महबूब, तुम आज से मेरे सैन्य-सचिव का पद संभालोगे. अब ‘आज़ाद हिन्द फ़ौज’ का सारा दारोमदार तुम पर है.

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का यह हुक्म मेरे लिए एकदम अप्रत्याशित था. मुझे लगा, अचानक मैं बहुत ऊंचाई पर खड़ा कर दिया गया हूँ. यक़ीन नहीं आ रहा था कि मुझ जैसा अदना सिपाही इतने बड़े सम्मान का हक़दार हो सकता है. लेकिन नेताजी की पारखी आँखें अपनी फ़ौज के हर सिपाही को तौलती रहती थीं और उनका हर हौसला बेहद ठोस और दूरगामी हुआ करता था.

मैं भावातिरेक से भर उठा था. नेताजी द्वारा सौंपे गए इस गुरुत्तर दायित्व के जवाब में मैं इतना ही कह पाया था,

“नेताजी, आपने जिस विश्वास के साथ यह पद मुझे सौंपा है, मैं मरते दम तक इसकी गरीमा क़ायम रखूंगा.

सैन्य-सचिव की जिम्मेदारी संभालने के बाद मैंने महसूस किया कि अचानक ही मुझे किसी इम्तहान में खड़ा कर दिया गया है. मेरे लिए यह एक चुनौती थी और तय था कि मुझे यह इम्तहान पास करना था.

उन दिनों बतौर सैन्य-सचिव मेरा मुख्य काम था ‘आज़ाद हिन्द फ़ौज’ द्वारा 21 अक्टूबर, 1943 को गठित स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार और फ़ौज के बीच में ताल मेल बनाये रखना. ‘आज़ाद हिन्द फ़ौज’ की इस अस्थायी सरकार को दुनिया की 9 सरकारों ने मान्यता दे दी थी. मान्यता देनेवालों में जर्मनी, जापान, और आयरलैंड की डीभलेरा सरकारें प्रमुख थीं. बतौर सैन्य सचिव ‘आज़ाद हिन्द फ़ौज’ के सारे अफसरों को प्रोन्नति, पदस्थापना और रिहायश आदि से संबंधित सूची तैयार करने से लेकर नेताजी के दस्तखत से जारी करने तक का काम भी मुझे देखना पड़ता था.

खोदा का शुक्र है कि बतौर सैन्य-सचिव मैंने अपनी जिम्मेदारी को पूरी ईमानदारी से निभाया और नेताजी की उम्मीदों पर खरा उतरा. अपने बारे में कुछ लिखना, कहना मुझे कभी कतई पसंद नहीं रहा लेकिन अपने किए गए काम के मूल्यांकन की ख़ुशी को नकारना भी मुमकिन नहीं है. श्री के. आर. पाल्टा ने एक किताब लिखी है, ‘माई एडवेंचर विथ आई.एन.ए.’. श्री पाल्टा ने ‘आज़ाद हिन्द फ़ौज’ की गतिविधियों को क़रीब से देखा था और मुझे फख्र है कि उनहोंने इस किताब में मेरा ज़िक्र करते हुए बतौर सैन्य-सचिव मेरे द्वारा किए गए कामों का सही प्रेजेंटेशन किया है.

 

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