हिंदुस्तान को प्रेम करने वाला कोई भी शख्स इस गाने को सुन कर भाव विभोर हो ही जाएगा




सुनील दत्त, फिरोज खान और जयश्री अभिनीत फिल्म “दीदी” का यह गाना जब मैंने सुना तो मेरी प्रवृति के विपरीत मेरे आंसू अपना रास्ता ख़ुद बना गए। मैं घंटों सोचता रहा कि वाकई हिन्दुस्तान बनाने वालों की क्या सोच रही होगी अगर किसी को जानना है तो यह गाना सुन ले।

इस फिल्म का मुख्य पात्र सूट-बूट वाला शिक्षक है जो डबल एम ए और पीएचडी है उसका पसंदीदा पेशा शिक्षा है – आज जहाँ केंद्र सरकार शिक्षा को लाभ वाला व्यावसायिक मॉडल बनाने में लगी है, उनके लिए भी इसमें सन्देश निहित है कि शिक्षा को व्यापार न बनाया जाए और हो सके तो आज के बेहतरीन नौजवानों को सिलिकॉन वैली जाने के बजाय और वाशिंग मशीन और एसी के लिए सॉफ्टवेयर डेवलप करने के बजाय इन्सानों को इंसानियत सिखाने और जीने का उद्देश्य सीखाने के लिए आगे आना चाहिए।

इस गाने की पृष्ठभूमि यह है कि स्कूल का शिक्षक बच्चों को कक्षा में प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करता है जिसका भी आज बड़ा अभाव है। खैर, बच्चे अपने शिक्षक से जो पूछते हैं वह आज हम सबको पूछना चाहिए। बच्चे अपने मास्टर जी से बारी बारी करके पूछते हैं और मास्टर जी सबका जवाब रुक कर, सोच कर, सहम कर देते हैं।

पहला बच्चा गाने की शुरुआत करते हुए पूछता है –

हमने सुना था एक है भारत

सब मुल्कों से नेक है भारत

लेकिन जब नज़दीक से देखा

सोच समझ कर ठीक से देखा

हमने नक़्शे और ही पाए

बदले हुए सब तौर ही पाए

एक से एक की बात जुदा है

धर्म जुदा है जात जुदा है

आपने जो कुछ हमको पढ़ाया

वो तो कही नज़र ना आया

इसके बाद मास्टरजी जवाब देते हैं –

जो कुछ मैंने तुमको पढ़ाया

उसमें कुछ भी झूठ नहीं

भाषा से भाषा न मिले तो

इसका मतलब फूट नहीं

एक डाली पर रह कर जैसे

फूल जुदा है पात जुदा

बुरा नहीं गर यूँही वतन में

धरम जुदा हो जात जुदा

अपने वतन में

इसके बाद एक और लड़का गाता हुआ यह अत्यंत रहस्मयी प्रश्न पूछता है-

वही है जब क़ुरान का कहना

जो है वेद पुराण का कहना

फिर यह शोर शराबा क्यों है

इतना खून खराबा क्यूँ है

अपने वतन में

मास्टर साहब इसका बड़ा तार्किक जवाब गाने में पिरोते हैं –

सदियों तक इस देश में बच्चों

रही हुकूमत गैरों की

अभी तलक हम सब के मुह पर

धुल है उनके पैरों की

लडवाओ और राज करो

ये उन लोगों की हिकमत थी

उन लोगों की चाल में आना

हम लोगों की ज़िल्लत थी

ये जो बैर है एक दूजे से

ये जो फूट और रंजिश है

उन्ही विदेशों आकाओं की

सोची समझी बख्शीश है

फिर दूसरा लड़का यह पूछता है जो आज हम बड़े भी नहीं पूछ पाते, वह पूछता है –

कुछ इंसान ब्राह्मण क्यों है

कुछ इंसान हरिजन क्यों है

एक की इतनी इज्ज़त क्यों है

एक की इतनी ज़िल्लत क्यूँ है

इस पर मास्टर साहब का जवाब लाजवाब करने वाला है, वह गाते हुए कहते हैं –

धन और ज्ञान को

ताक़त वालों ने अपनी जागीर कहा

मेहनत और गुलामी को

कमज़ोरों की तकदीर कहा

इंसानों का ये बटवारा

वेह्शत और जहालत है

जो नफरत की शिक्षा दे

वो धर्म नहीं है लानत है

जनम से कोई नीच नहीं है

जनम से कोई महान नहीं

करम से बढ़ कर किसी मनुष्य की

कोई भी पहचान नहीं

इसके बाद एक लड़का जो प्रश्न करता है वह आज भी हम अपने राजनेताओं से पूछ सकते हैं –

अब तो देश में आज़ादी है

अब क्यूं जनता फ़रियादी है

कब जाएगा दौर पुराना

कब आएगा नया ज़माना

इस पर मास्टर साहब ने जो जवाब दिया वह 50 साल से अधिक पुराना है। इसमें निस्संदेह बहुत बदलाव आया है और धुंधली तस्वीरें अब साफ़ भी होने लगी है। वह गाते हुए जवाब देते हैं –

सदियों की भूख और बेकारी

क्या एक दिन में जायेगी

इस उजड़े गुलशन पर रंगत

आते आते आएगी

ये जो नए मनसूबे हैं

और ये जो नई तामीरे हैं

आने वाले दौर की कुछ

धुंधली धुंधली तस्वीरे हैं

तुम ही इन्हें चमकाओगे

नवयुग आप नहीं आएगा

नवयुग को तुम लाओगे

नवयुग तो तुम लाओगे, आज की भारतीय पीढ़ी दुनिया की सबसे जवान पीढ़ी है। नवयुग आएगा और नवयुग हमारी भावी पीढ़ी अवश्य लाएगी।

इस गाने को और पूरी फिल्म को देखने के बाद ऐसा ही लगता है कि हमारी रचनात्मकता, हमारे आदर्शवाद, हमारे भारत को इंसानों का देश बनाने की अथक कोशिश अब रुपहले परदे से भी कहीं ग़ायब हो गयी है। अब न कोई सुनील दत्त जैसा अदाकार नज़र आता न कोई साहिर ही है जो रचनाएं तन के सुख की बजाए मन की शान्ति के लिए लिख दे।

इस गाने को YouTube पर हमारे चैनल पर सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें।

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