थाना बदला पर ना जगह बदली ना गवाह…




फ़हमीना हुसैन

बेशक तीन दशक में दिल्ली में क्षेत्रफल के हिसाब से थानों की संख्या बढ़ गई। जो मुकदमा महरौली थाने में दर्ज किया गया था, अब वह वसंत कुंज (नार्थ)थानाक्षेत्र में आ गया है। लेकिन, इतने साल बाद कुछ स्थानीय लोग मामले में अहम गवाह के तौर पर सामने आए।

वर्ष 1984 सिख दंगे मामले में एसआईटी के पहले मामले में अदालत ने दो लोगों को दोषी ठहराया। लेकिन. इंसाफ की असली लड़ाई अपने दो भाइयों की हत्या के खिलाफ 70 वर्षीय संगत सिंह ने लड़ी।

30 साल बाद केन्द्र सरकार ने सिख विरोधी दंगों की जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित किया था। दिल्ली-पंजाब में पीड़ितों को आगे आने के लिए प्रेरित किया गया। अखबारों में विज्ञापन दिया गया। फिर दंगा पीड़ितों की ऐसी कहानी सामने आई, जिससे किसी का भी दिल पसीज जाए। इन्हीं पीड़ितों में से एक परिवार को बुधवार को 34 साल बाद पटियाला हाउस अदालत से इंसाफ मिला है।

दंगाइयों की क्रूरता का शिकार बने 75 वर्षीय संगत सिंह ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अजय पांडे की अदालत में दंगों की आंखों देखी तस्वीर पेश की। उन्होंने बताया कि 1 नवंबर की सुबह वह अपने चार भाइयों के साथ महिपालपुर इलाके में स्थित अपनी दुकान पर बैठे थे। तभी तकरीबन पांच सौ लोगों की भीड़ ने उनकी दुकान पर धावा बोल दिया। दंगाइयों ने दुकान के सामान को लूटा और पांचों भाइयों पर हमला बोल दिया। मुझ समेत अवतार सिंह और हरदेव सिंह को आग लगा दी। दो अन्य भाइयों संतोख सिंह व कृपाल सिंह पर हमला किया।



अवतार सिंह व हरदेव सिंह की मौत हो गई, जबकि वह गंभीर रूप से जख्मी हो गए। बमुश्किल बची जान के चलते वह इस कदर भयभीत हो गए कि पंजाब चले गए और कभी दिल्ली लौटना नहीं चाहते थे। अदालत में बयान दर्ज कराते समय संगत सिंह कई बार उस समय को याद कर इतने भावुक हो गए थे कि उन्हें बीच में बैठाकर न्यायिक अधिकारी को ही हिम्मत बंधानी पड़ी। अदालत ने मामले में निर्णय करते समय इन सभी बातों को ध्यान में रखा।

संगत सिंह बुधवार को फैसला सुनाए जाने के समय अदालत कक्ष में मौजूद थे। जैसे ही उन्होंने अदालत का फैसला सुना, उनकी आंखों से आंसू छलक गए। फैसला सुनने के बाद उनका कहना था कि इन बूढ़ी आंखों में फिर से रोशनी की किरण फूटी है। अब उन्हें विश्वास हो गया है कि देश में कानून का शासन है। देर-सबेर ही सही उनके परिवार को न्याय मिला है। उनका यह भी कहना था कि उन्हें दूसरों ने हौसला दिया। कोर्ट में गवाही देने का हमारा निर्णय दूसरों के लिए सीख बनेगा।

सिख दंगा मामले में केन्द्र सरकार द्वारा गठित एसआईटी ने इस मामले के अलावा 52 अन्य मामलों में चश्मदीद गवाह व सबूत एकत्रित किए हैं। जिनमें से 16 मामलों में अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है। एसआईटी के सूत्रों से के अनुसार सिख दंगों से संबंधित 186 ऐसे मामले रहे जिनमें या तो आरोपियों की मौत हो चुकी है या फिर पीड़ितो की मृत्यु हो चुकी है। इस लिहाज से इन मामलो को आगे नहीं बढ़ाया जा सका है।



8 अगस्त और 11 नवंबर 2016 को दिल्ली-पंजाब के बड़े अखबारों में विज्ञापन देकर पीड़ितों को सामने आने की अपील की। संगत के रिश्तेदारों ने उन्हें अपनों को इंसाफ दिलाने के लिए समझाया। परन्तु, वह किसी कीमत पर दिल्ली लौटना नहीं चाहते थे। लेकिन, पड़ोसियों व परिवार के हौसला बढ़ाने पर उन्होंने एसआईटी के सामने पेश होने की हामी भरी।

(इनपुट पीटीआई, हिंदुस्तान)

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