आस्था की अनूठी बेला – छठ पूजा




बिहार की पूर्व मुख्य मंत्री राबरी देवी अपने परिवार के साथ छठ मनाती हुई (चित्र साभार: ट्विटर)

-अरीबा नेयाज़

सूर्य की लालिमा को पृथ्वी को चूमने से पहले घाट की ओर अग्रसर होना, ठेकुआ पुआ की खुशबू का पुरे घर को आरोहित कर देना और भक्ति भाव में लीनं छठी मईया का आवाहन, छठ पर्व नहीं परंपरा है, यादो की पूजा है और सर्व प्रथम एक नारी संस्कृति की झांकी है। इस दिन ऐसा लगता है मानो आत्मा की एक एक अणु सुर से सुर मिला कर बस गाए जा रही है।

“कांच ही बांस के बहिंग्या, बहँगी लचकत जाए

उग हो रे सूरज देवता, भईल अरधिया के बेर”

छठ पूजा बिहार प्रदेश की प्रकृति के प्रति अटूट आस्था, समर्पण और विश्वास का आइना है जिसका उल्लेख पौराणिक काल से रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथो में है। इस पूजा से उत्पन्न उर्जा का श्रोत, वो भक्ति है जिसे श्रद्धालु सूर्य और उनकी पत्नी उषा के लिए व्रत कर जागृत करते है. पूरा प्रदेश हर्षौल्लास से झूम रहा होता है।

कार्तिक मास के छ्ठे दिन मनाये जाने वाले इस त्यौहार से जुडी कई मान्यताएं हैं। कहा जाता है कि जब राम जी 14 वर्ष का वनवास पूरा कर अयोध्या लौटे तब सीता जी के साथ उन्होंने सूर्य देवता के लिए उपवास किया तबसे यह परम्परा आज तक लोगो के बीच छठ पर्व के रूप में प्रचलित है। छठ पर्व का वर्णन महाभारत के कुछ अध्यायों में भी है, जब कुंती ने सूर्य देवता की उपासना कर अपनी मनचाही इच्छा प्राप्त की थी। आज भी औरते इस कठिन पर्व के हर नियम को पूरी ज़िम्मेदारी और संयम से पूरा कर सूर्य देवता की उपासना करती है।

छठ विश्व के सबसे कठिन व्रतों में से एक है क्योंकि इसके विधि और नियम अत्यधिक कठिन होते है, जहां किसी भी भूल चूक की कोई गुंजाइश नहीं की जा सकती। माना जाता है की किसी भी प्रकार की गलती का फल उसी समय छठी मईया श्रद्धालुओं को श्राप स्वरुप दे देती है।

छठ का शाब्दिक अर्थ छः के रूप में मान सकते है क्यूंकि छठ पर्व कार्तिक मास के छठे दिन मनाया जाता है। भक्ति भाव से विभोर श्रद्धालु चार दिनों तक सूर्य देवता की अराधना में लीनं रहते है। गीत गायन मदमस्त स्त्रियाँ एक जुट हो कर बड़े सहजता से सारे कार्य को रूप देते जाती है और पलक झपकते ही ये चार दिन बड़ी आसानी से निकल जाते है। वहां छठी मईया की उपासना एक अग्नि परीक्षा के स्वरुप में होती है वहीँ ऐसा माना जाता है की इससे मनचाहे फल की प्राप्ति होती है।

इस पर्व में सूप की महत्वपूर्ण भूमिका होती है और वही देखा जाए तो सूप पिछड़े वर्ग द्वारा बनाया जाता है। यह दर्शाता है की ईश्वरीय कार्य में समाज का हर वर्ग विशेष और अलौकिक भूमिका निभाता है।

प्रकृति वैज्ञानिको ने छठ पर्व को ईको फ्रेंडली पर्व का दर्जा दिया है। अन्य त्योहारों की भांति यहाँ रंग/पटाखे, नशा सेवन जैसी चीज़ वर्जित है जो इस त्यौहार को और पवित्र बनाता है। दिवाली के ठीक चार दिन बाद छठ पर्व की शुरुआत हो जाती है और अगले चार दिनों तक इसे मनाया जाता है। पहले दिन व्रती सरोवर में स्नान करती है और इसके पश्चात चावल व लौकी की सब्जी का सेवन करती है। दूसरे दिन जिसे खरना कहते है व्रती पूरे नियमो का ध्यान रखते हुए सावधानीपूर्वक खीर पूरी बनाते है और तद्पश्चात व्रत की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। यह व्रत निर्जला होता है। तीसरे दिन प्रसाद तैयार होता है, और बनाये गए प्रसाद को सूर्यास्त होने से पहले सूर्य देवता को अर्पण किया जाता है। चौथे दिन प्रातः काल पूरा नगर अर्घ के लिए घाट पर एक जुट होता है।

छठ बिहार के सभ्यता की एक ऐसी देन है जो हर एक व्यक्ति का प्रकृति के प्रति रुझान बढ़ा देता है। प्रत्येक व्यक्ति इस दिन अपने आप को अपने वातावरण से अध्यात्मिक तथा प्राकृतिक रूप से जुड़ा हुआ महसूस करता है। घाट में उपस्थित सभी छोटे और बड़े शांति का अनुभव करते है। सूर्य पृथ्वी पर उर्जा का स्रोत है और इसे पर्व के माध्यम से हर एक आम इन्सांन अपना ऋण और कृतज्ञता सूर्य के सामने प्रकट करता है।

हर साल की तरह इस साल भी यह पर्व न सिर्फ बिहार बल्कि दिल्ली जैसे जैसे बड़े राज्यों में भी मनाया गया। दिल्ली में राज घाट पर इसे हर साल बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। हर साल की तरह इस साल भी यहाँ छठ के कई रंग दिखाई दिए और उनमे से सबसे अनोखा रंग निखर कर तब आया जब वहां भक्ति में लीनं व्रतियों ने नारी शक्ति के रूप को अलग अंदाज़ में दर्शाया। बात-चीत करने के दोरान उन्होंने स्त्रियों के संयम व हौसले को सर्वश्रेष्ठ बताया। और सही मानो में इस पर्व की खासियत ही महिलाओं का संयम है। लोगो की भक्ति व होसला देखने लायक था। बच्चे अपने माता पिता का हाथ पकडे घर की परंपरा को आगे ले जाने को जैसे तैयार बैठे थे।

इस पर्व के नियम कुछ अनकहे संदेशो को बड़े ही सहजता के साथ बयान कर देते है। इस पर्व के समय व्रती को ज़मीन पर सोना पड़ता होता है, जोकि न लोगों के जेब की पूँजी देखता है ना किसी का समाज में उसका स्तर। यह लोगो को त्याग, संयम व सादगी से जीवन जीने का सन्देश देता है। आज के इस भागा दौड़ी वाले समय में इन बातो को अपनाने का सोचना भी नामुमकिन सा हो रहा है। जाने अनजाने में बिहार की यह संस्कृति आज विलुप्त होती नज़र आ रही है। शहर का माहौल ग्रामीण तौर तरीको पर अपनी छाप छोड़ता दिख रहा है। जहां एक ओर इस बार बच्चों की भागीदारी ज्यादा दिखी तो वही युवा पीढ़ी की मौजूदगी ज़रा कम सी थी। आज की युवा पीढ़ी पश्चिम सभ्यताओं में इतनी तीव्रता से बदल रही है की डर है कही सबसे आगे निकलने की होड़ में व अपने परम्पराओं को काफी पीछे न छोड़ दें। आवश्यकता है की अपने जड़ो की मजबूती को बनाये रखने के लिए युवा अपनी परम्पराओं से दिलचस्पी न गवाएं तभी हमारी हिन्दुस्तानी सभ्यता अपना मूल भाव दर्शाने में सक्षम हो पाएगी।

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