एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में भारत में मानवाधिकारों के हनन के मामले रौंगटे खड़े करने वाले




पिछले एक साल में महिलाओं के खिलाफ हिंसा की 338,000 से अधिक और बच्चों के ख़िलाफ़ 106,000 से अधिक हिंसा के मामलों की रिपोर्ट की गयी है। 2016 में अनुसूचित जातियों के खिलाफ 40,000 से अधिक अपराध दर्ज किए गए। 90 मैनुअल स्कैवेंजर्स की सफ़ाई के दौरान मौत हुई जो दलित थे। 40,000 रोहिंगिया बड़े पैमाने पर निष्कासन के खतरे में।

-समीर भारती

नई दिल्ली, 22 फरवरी, 2018 (टीएमसी हिंदी डेस्क) भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से मुसलमानों को “शैतानी” का सामना करना पड़ रहा है। ऐसा वैश्विक अधिकार के समूह एमनेस्टी इंटरनेशनल ने गुरुवार को अपनी रिपोर्ट में कहा है। रिपोर्ट में भारतीय अधिकारियों पर आरोप लगाया गया है कि देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाने के लिए कानूनों का उपयोग किया जा रहा है।



यहां जारी अपनी नवीनतम वार्षिक रिपोर्ट में, समूह ने दक्षिण एशिया में मानवाधिकारों की स्थिति का एक उदासीन चित्र पेश किया है। भारत के संदर्भ में, यह कहा गया है कि पिछले साल से भारत में गोमांस खाने के नाम पर कथित गौ रक्षकों और पीट कर हत्या की घटनाएं पूरे देश में फैली है, जिसमें सरकार पर आरोप है कि इसने कुछ भी नहीं किया।

“भारत में, हिंदू राष्ट्रवादी सरकार के तहत इस्लामोफोबिया की लहर दिखाकर मुसलमानों के खिलाफ दर्जनों घृणा संबधी अपराध पूरे देश में हुए।

इसमें कहा गया है कि, “कम से कम 10 मुस्लिम पुरूषों की हत्या की गयी और बहुत से लोग घायल किए गए, इनमें से कई सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार के समर्थन में हुआ।

“कुछ गिरफ्तारियां हुईं, लेकिन किसी को अब तक दोषी नहीं ठहराया गया। कुछ बीजेपी अधिकारियों ने इन अपराधों को अपने बयान में इन हमलों को सही भी ठहराया।



रिपोर्ट में पत्रकारों के लिए खतरा और गौरी लंकेश की हत्या का भी उल्लेख किया गया है. गौरी लंकेश की हत्या पिछले साल बेंगलुरू में उनके घर के बाहर गोली मारकर कर हिन्दू संगठन के कार्यकर्ताओं द्वारा की गई थी।

“कई पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने अपना जीवन गंवा दिया. विश्वविद्यालयों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी खतरे में रही। सितंबर में अज्ञात बंदूकधारियों ने बेंगलुरु में हिंदू राष्ट्रवाद और जाति व्यवस्था के एक मुखर आलोचक गौरी लंकेश को उन के घर के बाहर गोली मार दी थी। कई पत्रकारों के खिलाफ आपराधिक मानहानि के मामले भी सामने आए।”

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि, “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाने के लिए दमनकारी कानूनों का इस्तेमाल किया गया … राज्य सरकारों ने पुस्तकों पर प्रतिबंध लगा दिया, और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने अस्पष्ट और अति व्यापक आधार पर कुछ फिल्मों को सिनेमा घरों में रिलीज नहीं होने दिया।”

मिनार पिंपल, निदेशक संचालन, एमनेस्टी, ने कहा कि लोकलुभावन और शैतानियत की राजनीति दुनिया में फैल रही है, लेकिन अमेरिका और भारत में ‘नॉट इन माय नेम’ अभियान के साथ इसका प्रतिरोध भी किया जा रहा है।

दक्षिण एशिया के क्षेत्रीय निदेशक बीरज पटनायक ने कहा कि, पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र में नागरिक समाज के लिए जगह सिकुड़ रही है और बांग्लादेश, श्रीलंका, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में “विदेशी योगदान (विनियमन) अधिनियम, साइबर सिक्योरिटी एक्ट, की शुरुआत की जा रही है,  जो “भारत के पड़ोसियों ने सभी बुरी चीजें सीख रही हैं”

रिपोर्ट में मानव अधिकारों की दुर्दशा का एक भयावह चित्र पेश किया गया है,  जिसमें जाति आधारित भेदभाव, सांप्रदायिक हिंसा, महिलाओं और बच्चों के प्रति अपराध के कई उदाहरण दिए गए हैं।



इसमें जोर दिया गया कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट ने कई प्रगतिशील निर्णय दिए लेकिन कुछ फैसलों में मानव अधिकारों को कम महत्व दिया गया। भारत संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के सामने किए गए मानवाधिकार प्रतिबद्धताओं का सम्मान देने में “असफल” रहा।

पिछले एक साल में महिलाओं के खिलाफ हिंसा की 338,000 से अधिक और बच्चों के ख़िलाफ़ 106,000 से अधिक हिंसा के मामलों की रिपोर्ट की गयी है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि “कार्यकर्ताओं ने बाल श्रम कानूनों में संशोधन की भी आलोचना की है जिसमें बच्चों को पारिवारिक उद्यमों में काम करने की इजाजत मिलती है।”

जम्मू और कश्मीर में,  सुरक्षा बलों ने विरोध प्रदर्शनों के दौरान गलत तरीके से गोली-दागने वाले शॉटगनों का इस्तेमाल करना जारी रखा, जिसने कई लोगों को अंधा और घायल कर दिया।

इस रिपोर्ट में मानवाधिकारों के दुरुपयोगों में लोगों को बरी करने का भी ज़िक्र है।

जून में, अर्धसैनिक बॉर्डर सुरक्षा बल के तहत स्थापित एक सैन्य अदालत ने 2010 में 16 वर्षीय ज़ाहिद फारूक शेख की हत्या के आरोपी दो सैनिकों को बरी कर दिया।



इस रिपोर्ट में जुलाई में, सुप्रीम कोर्ट द्वारा 215 ऐसे मामलों को फिर से खोलने से इनकार करने का भी उल्लेख है जिनका कारण मामले का पुराना होना बताया गया था. ये मामले जम्मू और कश्मीर में 700 से अधिक कश्मीरी पंडितों की हत्या के हैं।

“इसी महीने, एक अपीलीय सैन्य अदालत द्वारा 2010 में माचिल में तीन लोगों की एक्स्ट्रजूडिशल  हत्या के आरोपी को कोर्ट-मार्शल द्वारा दोषी पांच सेना कर्मियों के आजीवन कारवास की सजा को निलंबित कर दिया था,” इसमें तर्क दिया गया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि नवंबर में जारी आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक दलितों के खिलाफ नफरत वाले अपराधों की व्यापकता बनी हुई है। 2016 में अनुसूचित जातियों के खिलाफ 40,000 से अधिक अपराध दर्ज किए गए थे।



रिपोर्ट में कहा गया है, “अधिकारियों ने मानव अधिकार रक्षकों और संगठनों की खुलेआम आलोचना की थी, उनके खिलाफ शत्रुतापूर्ण माहौल तैयार किया गया।” इसमें उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में झगड़े के बाद दो दलितों की मौत का हवाला दिया गया है।

“कार्यकर्ताओं ने कहा कि मैनुअल स्कैवेंजर्स निषिद्ध होने के बावजूद मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में दलितों को नियुक्त किया गया जिसमें कम से कम 90 दलितों की सफ़ाई के दौरान मौत हुई।” इसमें यह भी कहा गया कि मारे गए कई लोगों को सरकारी एजेंसियों द्वारा अवैध तरीके से नियुक्त किया गया था।

रिपोर्ट में यह भी लिखित है कि भारत में अनुमानित 40,000 रोहिंगिया लोग बड़े पैमाने पर निष्कासन के खतरे में थे। उन्होंने कहा कि इनमें 16,000 से अधिक लोगों की पहचान यूएनएचसीआर, संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी ने शरणार्थियों के रूप में किया था।

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