ये दुर्घटना नहीं, सत्ता की विफलता से आमजनों का क़त्ल है…




-नदीम अख्तर

अमृतसर ट्रेन हादसा भयावह है। ये दुर्घटना नहीं, सत्ता की विफलता से आमजनों का क़त्ल है। इस देश में सबकुछ भगवान भरोसे चल रहा है। एसबीआई की पूर्व मुखिया बहुत बेशर्मी से रिलायंस की डाइरेक्टर बन गयी हैं। सोचिए पद पे रहते हुए उन्होंने इन कंपनियों के लिए क्या-क्या किया होगा।

इस देश में ना आपको शुद्ध हवा मिल रही है, ना पानी और ना भोजन। सिर्फ राजधानी दिल्ली की सारी सब्जियां हरे रंग के केमिकल से रंगी होती हैं। ना सड़क है, ना बिजली ना पानी। गरीब भूखों मर रहा है। अस्पताल से लेकर स्कूल कॉलेज तक फटेहाल हैं। नौकरी है नहीं। ट्रेन और हवाई जहाज़ भगवान भरोसे चल रहे हैं। गंदगी का अम्बार अलग…

भारतवासी कीड़े-मकोड़े की ज़िंदगी जी रहे हैं। देश की दौलत चंद अरबपति उद्योगपतियों के खजाने में कैद है। देश के नेता ढीठ, कुटिल और भ्रष्ट हैं। वे सिर्फ सत्ता पे काबिज होने के लिए देश को कोई भी आग में झोंकने को तैयार बैठे हैं। मिडिल क्लास ऑनलाइन डिस्काउंट वाली शॉपिंग करके और ईएमआई से चंद ज़रूरियात पूरी करके मस्त है। जिसे जहां मौका मिल रहा है, लूट रहा है।

लोकतंत्र फेल, संविधान भीड़तंत्र के हवाले, पुलिस राजनेताओं की चाकरी कर रही और कोर्ट सिर्फ फैसला सुना के गदगद है। संसद मछली बाजार बन चुकी है, राजनेता दुकानदार और उद्योगपति खरीददार। जनता को बेचा जा रहा है। और जनता धर्म के नाम पर लड़ने में व्यस्त-मस्त।

इस देश का भविष्य अंधकारमय नहीं, गर्त में दिखता है। या तो यहां से लोकशाही हटा दी जाएगी और त्रस्त जनता को राहत देने के नाम पर कोई हिटलर आएगा जो उसको और ताड़पायेगा या फिर ये देश एक बार फिर गुलाम बना लिया जाएगा और जनता उफ़्फ़ तक नहीं करेगी।

उसे फ़र्क़ ही नहीं पड़ेगा क्योंकि आज़ादी आज तक उसने देखी ही नहीं। वो सिर्फ वोट देना जानती है जैसे वो अंग्रेजों को लगान देती थी। सच कहूँ तो आपके बच्चों का भविष्य इस देश में डराने वाला है। जो सयाने हैं, वो विदेश जाकर बस रहे हैं। कम से कम वहां उनको साफ हवा, पानी, भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाएं तो मिल रही हैं। रेसिज्म झेल लेंगे पर बेमौत तो नहीं मारे जाएंगे।



अमृतसर में लोग बेमौत मारे गए। दोषी आप खोजिए। कल आप भी सब भूलके किसी मल्टीप्लेक्स में मूवी देखने चले जाएंगे पर अगला नम्बर आपका भी हो सकता है।

ये देश एक खदबदाता नरक बन चुका है जहां आप प्रदूषण से जाने-अनजाने रोज़ मर रहे हैं। बीमारी का बहाना बनता है पर असल जड़ कहीं और है। इस लोकतंत्र ने आपका जीवन बर्बाद कर दिया और नेताओं ने आपके देश को तबाह कर दिया। एक अदद इलाज को आप दर-दर भटकते हैं। इसे आपने अपनी नियति मान ली है और इस सड़े-गले लोकतंत्र को ढोना आपकी मजबूरी है। शासक सरेआम झूठ बोलता है और मीडिया के दलाल उसका महिमामंडन करते हैं।

70 साल से यही हो रहा है। राज कोई भी करे, सब एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं। वो राजा हैं और आप प्रजा भी नहीं हैं। आप इस लोकतंत्र में वोट देने के एक प्यादे भर हैं। कभी इत्मीनान से पार्टी-विचारधारा-राजनेता भक्ति को परे रखकर सोचिएगा। आप हिल जाएंगे…!

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