प्रधान मंत्री के नाम खुला पत्र: अचानक लॉक डाउन के पीछे आखिर आपकी क्या मंशा थी?




-समीर भारती

 

माननीय प्रधानमंत्री,

उम्मीद है कि आप आलिशान से कमरे में बैठ कर अपने देश की अर्थ व्यवस्था, सुरक्षा इत्यादि इत्यादि की ख़बर ले रहे होंगे. वायरस को भगाने के नए नए तरकीब सोच रहे होंगे. जनता में जोश जगाने के लिए नए नए इवेंट्स के बारे में भी सोच रहे होंगे. आप से मिलने वालों के लिए सामान्य सुरक्षा घेरे के अलावा वायरस को लेकर सुरक्षा पर एक और परत चढ़ा दी गयी होगी. आप का यह समय स्वास्थ्य लाभ का है. जिस तरह से आपने देश को 5 ट्रिलियन डॉलर्स की इकॉनमी बनाने के लिए विदेश यात्राएं की उससे आप थके तो नहीं थे क्योंकि अब तक आप कई और देश घूम ही आते. लेकिन प्रकृति ने हमारी अर्थ व्यवस्था और आप के स्वास्थ्य दोनों पर एक साथ कृपा कर डाली. जनता की गाढ़ी कमाई के कुछ सौ करोड़ बच गए और आप को थोडा स्वास्थ्य लाभ मिला. आप चिरंजीवी रहे यह मेरी कामना है. अभी मैं आपकी अच्छी कामना ही कर सकता हूँ क्योंकि सुना है कि जिन जिन लोगो ने ऐसी कामना नहीं की वह UAPA और अन्य धाराओं के तहत सज़ा भुगत रहे हैं.

माननीय प्रधानमंत्री जी, मेरे मन में एक प्रश्न था कि आप अचानक फैसला क्यों करते हैं. मैं हमेशा सोचता रहता था कि इतना बड़ा देश का प्रधान मंत्री 8 बजे वाला निर्णय 8 ही बजे कैसे ले लेता है. लेकिन लॉक डाउन की घोषणा के बाद मुझे लगा कि यह मेरा भ्रम था. वाकई भ्रम था. वह टूट गया. माननीय आपका कोई निर्णय अचानक नहीं होता है. आप दिनों, सप्ताहों और महीनों तक मंथन करते हैं उसके बाद निर्णय करते हैं. नोटबंदी का निर्णय भी आपका ऐसा ही था. वह अचानक नहीं था. आपके हर सांसद को संभवतः पता था. आपके पूंजीपति साथियों को पता था तभी तो रिपोर्ट्स के मुताबिक गुजरात के कई बैंकों में ठीक नोटबंदी से पहले और उसके बाद बड़े बड़े लेन देन हुए. यह तो संयोग नहीं हो सकता न कि अमित शाह जी जिस कंपनी के डायरेक्टर हों उस बैंक में नोटबंदी से पहले कई बड़े लेन देन हों. कर्णाटक में नए नोटों की खेप भी पकड़ी गयी. क्या आपके दोस्तों के लिए टकसाल खुले थे जो उनहोंने बेकरी से जैसे बिस्कुट निकलते हैं वैसे ही ताज़ा ताज़ा नोट उन्हें परोसे जा रहे थे? जबकि आम आदमी तब भी 2 हजार के लिए तरस रहा था. आपको पता है न कि 80 लोगों की मृत्यु हुई थी.

हाँ, तब आपने एक वाक्य कहा था कि अगर इसके अच्छे परिणाम न आए तो 100 दिन में किसी भी चौराहे पर मुझे लटका देना. 15 लाख, बिहार को सवा लाख करोड़ का विशेष पैकेज इत्यादि इत्यादि की तरह यह भी जुमला ही होगा, नहीं? ट्विटरवासी आपके उस जुमले की हर वर्षगाँठ पर आपसे पूछते हैं कि आप किस चौराहे पर कब आ रहे हैं. उन्हें कहाँ पता कि वह आपका जुमला था. अमित शाह जी ने पुष्टि भी नहीं की कि वह आपका जुमला था. अमित शाह जी को 15 लाख की तरह ही इसकी पुष्टि कर देनी चाहिए कि यह भी जुमला ही था. स्पष्टीकरण से क्या होता न कि झंझट ख़त्म हो जाता वर्षगाँठ नहीं मनाते बेचारे खान्ग्रेसी. खान्ग्रेसी आप समझते हैं न. नेहरु की पार्टी वाले लोग. देश का 77 साल में भट्टा बैठाने वाली पार्टी. 77 कह कर हमने 2024 तक के लिए यानी आपके अगले लोक सभा चुनाव तक का सारा दोष उन पर ही मढ़ दिया है. आप बस अपना काम बिंदास 24 तक जारी रखिए. 2024 तक का पूरा दोष नेहरु पर. नेहरु के पैसे को बदलना इसमें शामिल हैं. नोटबंदी भी आपने इसलिए की ताकि नेहरु के नोट का नामो निशाँ खत्म हो जाए. एक दम चकाचक भारत. गांधी के चश्मे से गोडसे का झांकता हुआ भारत, नहीं?

माननीय, तो मैं यह कह रहा था कि लॉक डाउन वाला निर्णय भी आपने जल्दबाजी में नहीं लिया. एक दम सोच समझ कर, ठहर कर अपना असली काम निपटा कर आपने यह सब किया. पहले जनता कर्फ्यू लगवाया. जनता कर्फ्यू के दिन आपने ताली बजवाई थी न. आपके योद्धा 5 बजे ढोल बाजा ले कर एक दम तैमूर लंग की फ़ौज की तरह जीत का जश्न मनाने के लिए निकल पड़े थे. कोरोना एक दम से सिसक रहा था गटर में आपके योद्धाओं के डर से.

सोनू निगम, अशोक पंडित, अनुपम खेर और बड़े बड़े स्टार ने आपके जनता कर्फ्यू के फ़ॉर्मूले को इस तरह से पेश किया जैसे आपने गुरुत्वाकर्षण का नया नियम फिर से ढूंढ लिया हो और अब पूरा ब्रह्माण्ड ही आप बदल देंगे. आपने थाली बजवाई, हमने बजाई. और मैं तो जब थाली बजा रहा था तो कोरोना एकदम से कान के दर्द से छटपटा रहा था. मैं ने और ज़ोर से थाली बजाई. बाद में पता चला कि यह भी आपकी सोची समझी चाल थी. और हर इवेंट की तरह यह भी आपने पश्चिम से चुराया था. इटली में लोग सरकार के खिलाफ थाली पीट रहे थे आपने अपनी जनता से अपने समर्थन में ही थाली पिटवा दिया. मान गए सर!

हमारे बिहार के मुख्यमंत्री ने बड़ी चालाकी से आपके जनता कर्फ्यू का लाभ उठाया और उसी शाम को अगले दिन से पूर्ण लॉक डाउन की घोषणा कर दी. बिहार के मुख्य मंत्री नीतीश कुमार का यह चालाकी भरा चाल था. उन्हें डर था कि कहीं अप्रवासी मजदूर बिहार में न आने लगें. उनकी मंशा साफ़ झलकी जब उनहोंने कोटा से विद्यार्थियों के लाने पर भी पाबंदी लगा दी. अप्रवासी मजदूरों को बेसहारा कर दिया गया. मजदूरों को मजबूरी में पैदल ही हजारो किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ी. कई मजदूर रास्ते में ही चल बसे.

माननीय प्रधानमंत्री जी, जो नीतीश जी की मंशा थी वही आपकी मंशा भी थी. अचानक लॉक डाउन का आपका उद्देश्य भी यही था. आप नहीं चाहते थे कि मजदूरों के पलायन से आपके सहयोगी कॉर्पोरेट घरानों का नुकसान हो. कल कारखाने बंद हों. आपको पता है कि दुनिया में सबसे सस्ता श्रम बिहारियों का ही है. दो जून की रोटी के लिए वह गुजरात से लेकर दिल्ली के कल कारखानों में अपना पसीना बहाते हैं. पंजाब के खेतों में भी बिहारी चंद किलो अनाज के बदले आपको काम करते मिल जाएंगे. 73 साल हो गए अब तक बिहार की दुर्दशा नहीं सुधरी. आपकी सरकार यहाँ लगभग 2 दशक से है. लोगो के जीवन का स्तर वही है.

माननीय, अगर इन दिनों आपकी सरकार केंद्र में न होती तो आपका कत्थक देखते बनता. आपके पास बताने को कुछ भी नहीं कि आपने कहीं भी मज़दूरी की मदद की हो. रेल भी चलाई तो बहुत देर से जब मजदूरों ने अपना जमा पूँजी बैठ कर खाने में उड़ा दिया. आपने इस आपात स्थिति में भी मजदूरों को नहीं बख्शा. किराया वसूल कर आपने जता दिया कि आप जिस गरीब परिवार से खुद आते हैं उन परिवारों की चिंता कतई नहीं.

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आपके कर्मठ योद्धा जनता को भ्रमित करने के लिए तरह तरह से हिन्दू-मुस्लिम करते रहे. तबलीगी जमात को आपने और आपके छिपे सहयोगी केजरीवाल ने खूब विलन बनाया. वह आपकी और केजरीवाल की साझा नाकामी थी. आपके अचानक लॉक डाउन ने मरकज़ के मुसलामानों को पहले मरकज़ में बंधक बनाया और फिर उन्हें पूरी दुनिया के सामने बेईज्ज़त किया. यह बात अलग है कि इन्होंने अपने स्वभाव के अनुकूल प्लाज्मा और खून डोनेट करके आपके नफरती एजेंडे को एक बार फिर से धूमिल कर दिया. कई जगह ऐसा देखा गया कि मुसलामानों ने हिन्दुओं की अर्थी को श्मसान पहुँचाया और हिन्दुओं ने मुसलमानों को अपने यहाँ आश्रय दिया. दिल्ली में एक कश्मीरी पंडित का परिवार आज तक एक मुस्लिम बच्ची का इफ्तार बनाती है.

अभी अभी औरंगाबाद मे 10 से ज़्यादा मजदूर सपरिवार रेल की पटरी के नीचे आकर लॉक डाउन की बली चढ़ गए. आपने उनके लिए कोई घोषणा नहीं की. उनके परिवारों में से जो जिंदा रह गए थे उन्हें आपको कम से कम 10 लाख देना चाहिए था. कम से कम अपने परिवार के अधिकतर सदस्यों की मौत का कुछ तो सदमा कम होता. लेकिन आपसे ऐसा नहीं हो पाया. ट्विटर आज की सबसे बड़ी चीज़ है. संवेदना ज़ाहिर कर दीजिए और अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त हो जाइए.

आपको पता है एक न्यूज़. आंध्र के एक विश्व विद्यालय कैंपस में एक होनहार प्रोफेसर अपनी कुर्सी पर बैठा बैठा मार गया. उस केन्द्रीय विश्वविद्यालय ने उस प्रोफेसर की मौत की खबर दबाने के लिए को श्रद्धांजली अर्पित नहीं की. एक जांबाज़ पत्रकार ने जब उस न्यूज़ को कवर किया तो उस विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार ने इसे खबर बनाने से मना किया. वह भी लॉक डाउन की ही बली चढ़ गया.

महोदय, आपतो इतना निर्दयी निकले कि जो CAA विरोधी मजदूरों और गरीबों की सेवा में लगे थे उन्हें जेल भेजने लगे. आपको तो चाहिए था कि कुछ लोगों को पेरोल पर छोड़ते. डॉ कफील अभी इस विकट स्थिति में कितना उपयोगी होते लेकिन उन्हें भी आपने नहीं छोड़ा. गर्भवती महिला पर भी आपको दया नहीं आई. आपकी पार्टी का एक नाकारा नेता कपिल मिश्रा उस औरत पर भद्दा टिप्पणी करता है और आपकी गैरत को ठेस नहीं पहुंची.

महोदय, आप याद रखें कि आप अमर नहीं है. आपको भी मरना है. क्या आप नहीं चाहते कि आप के मरने के बाद आपको लोग एक अच्छे शासक के तौर पर याद करें? अब भी समय है. आप अब भी अपनी भूल सुधार सकते हैं. बेसहारा मज़दूरों पर लाठी बरस रही है. वह घर आना चाहते हैं. उन्हें उनके घर पहुंचा दीजिए. जो नहीं आना चाहते हैं उन्हें भारत के पास नेहरु के बनाए एफ़सीआई गोदामों में पूरे देश को कई साल तक बिठा कर खिलाने लायक अनाज जो हैं उनसे उनके खाने का और ठहरने का समुचित व्यवस्था कीजिए. आपके पीएम केयर्स फण्ड में जनता द्वारा जनता के लिए सैकड़ो करोड़ जमा हैं. थोड़ी दरिया दिली दिखाइए और मजदूरों को बचा लीजिए. मजदूर और किसान कहीं बिदक गए न तो 2024 आपके लिए बहुत महंगा साबित होगा.

अगर आप तक मेरा यह पत्र पहुंचे तो एक बार ज़रूर पढिएगा.

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