विश्लेषण: बिहार में भी हो सकते हैं कांग्रेस के अलग राह, कारण ये




महागठबंधन के संभावित नेता

-समीर भारती

उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में यह तय होने के बाद कि कांग्रेस महागठबंधन में शामिल नहीं होगी अब बिहार में भी सुगबुगाहट शुरू हो गयी है. द मॉर्निंग क्रॉनिकल को कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि इस बात की प्रबल संभावना है कि कांग्रेस बिहार में अकेले ही लड़ने जा रही है और महागठबंधन में नहीं रहेगी.

बिहार में लोक सभा की 40 सीटें हैं. कांग्रेस इसमें 2014 में दो सीट पर जीती थी जबकि राजद 4 सीट पर जीती थी. रालोसपा के तीन सांसद हैं जिनमें अरुण कुमार अब अलग हैं. कुल मिलाकर महागठबंधन हारी हुई जमातों का जमावड़ा है.

तेजस्वी के ट्वीट से उपजा संशय

राजद नेता तेजस्वी यादव ने कुछ दिनों पहले ट्वीट किया जिससे इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं कि महागठबंधन में सब कुछ ठीक नहीं है. उनहोंने कहा कि “संविधान और देश पर अभूतपूर्व संकट है। अगर अबकी बार विपक्ष से कोई रणनीतिक चुक हुई तो फिर देश में आम चुनाव होंगे या नहीं, कोई नहीं जानता? अगर अपनी चंद सीटें बढ़ाने और सहयोगियों की घटाने के लिए अहंकार नहीं छोड़ा तो संविधान में आस्था रखने वाले न्यायप्रिय देशवासी माफ़ नहीं करेंगे।”

मुकेश सहनी, मांझी बन गए हैं बोझ तो उपेन्द्र के जलवे भी कम हुए

महागठबंधन के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि महागठबंधन बड़ा दस्तरखान बन गया है. यहाँ खाने को कम है और खाने वालों की संख्या अधिक है. मुकेश सहनी और मांझी की पार्टी का कोई भी उम्मीदवार अभी लोक सभा में नहीं है. मुकेश सहनी माल (पैसे) के बल बूते पर महागठबंधन में आ गए हैं और ऊपर से उन्हें भी मुर्गी की टांग ही चाहिए. मांझी की पार्टी ‘हम’ भी लंबा निवाला चाह रही है. वही हाल रालोसपा का है. रालोसपा एनडीए से भगाई गयी पार्टी है. नीतीश कुमार से रालोसपा प्रमुख उपेन्द्र कुशवाहा की अनबन की वजह से उन्हें एनडीए छोड़ना पड़ा.

इन तीन लोगों के लिए महागठबंधन ‘मजबूरी का नाम महात्मा गांधी वाला’ मामला है. तीनों भाजपा से नाराज़ होकर निकले हैं और भाजपा की विचारधारा से कहीं न कहीं प्रभावित भी हैं क्योंकि वे भाजपा गठबंधन में पहले लंबे अरसे तक रहे हैं. ज्यादा नहीं तो थोडा ही सही.

कांग्रेसी नेता ने कहा कि जिनकी औकात ही नहीं है वह महागठबंधन में पूरे दस्तरखान (dining space) को हड़पना चाहते हैं. ऐसे में कांग्रेस को क्या मिलेगा यह संशय है.

कुशवाहा और सहनी समाज भाजपा का वोटबैंक

कांग्रेसी नेता ने अपना नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा कि कुशवाहा और सहनी समाज कभी लालू यादव की पार्टी को बड़ी संख्या में वोट नहीं करेगी. वह भाजपा और एनडीए गठबंधन को ही वोट करेंगे.

कुशवाहा समाज का बड़ा वोट बैंक नीतीश कुमार के पास भी अपना है. मंजू वर्मा को जिस तरह से नीतीश ने बचाने की कोशिश की वह कुशवाहा समाज को खुश करने के लिए ही था. मंजू वर्मा कुशवाहा समाज से आती हैं और अब ज़मानत में बाहर हैं. नीतीश कुमार ने मंजू वर्मा को लेकर कोई स्पीडी ट्रायल के लिए कोशिश नहीं की यह इस बात का प्रमाण है कि नीतीश कुशवाहा समाज के वोट बैंक को लेकर बहुत ही सावधान हैं.

कांग्रेस के पास अभी दो लोक सभा की सीटें हैं.

भाजपा को हराने का क्या होगा?

इसका नेता ख्याल नहीं करते. यह जनता की ज़िम्मेदारी है कि वह यह तय करे कि किसको हराना है. इस बार जनता की अहम ज़िम्मेदारी होगी कि वह इस बात का ख्याल रखे कि एनडीए को हराने वाले विपक्ष के सबसे सबल उम्मीदवार को एकजुट होकर वोट करे.

उनहोंने कहा कि पार्टी की अपनी मजबूरी भी होती है. वह किस किसको तिक्त के लिए मना करेगी. जिसको पार्टी टिकट नहीं देगी वह पार्टी ही छोड़ देगा जिससे पार्टी को ही नुकसान होगा.

दूसरी ओर, भाजपा इस मामले में अधिक शातिर है. वह अपने लोगों को कुछ न कुछ दे कर मना ही लेगी. उसके पास अभी कई राज्यों में सत्ता है. भाजपा ने राम विलास पासवान को राज्य सभा भेजने का मन भी बना लिया है. दूसरी बात यह कि भाजपा में कई लोग ऐसे हैं जिनका भाजपा के बगैर अस्तित्व ही नहीं है. उदाहरण के लिए साक्षी महाराज और गिरिराज सिंह. इन्हें अगर भाजपा निकाल दे तो यह 50 हज़ार वोट भी हासिल नहीं कर सकते. इसलिए यह भाजपा का दामन छोड़ नहीं सकते. लेकिन भाजपा मुंह बाए खड़ी है कि कोई टूटे कि हम लोक लें. राम कृपाल इसके बेहतरीन उदाहरण हैं. गोवा में तो भाजपा ने पूरा कसर ही लगा दिया था कि दिगंबर कामत कांग्रेस छोड़ दें और भाजपा के मुख्यमंत्री बन जाएं. लेकिन किसी कारण ऐसा नहीं हो सका और कांग्रेस की लाज बच गयी.

प्रियंका को लेकर कांग्रेस में विश्वास बढ़ा

प्रियंका गांधी वाड्रा के आने से कांग्रेस में एक नया उत्साह आया है. इसके अलावा, सवर्ण भी अब कांग्रेस के नज़दीक आए हैं. मुस्लिम में कांग्रेस का कैडर वोट तो है ही इन दिनों सामान्य वोट में भी इसमें इज़ाफा हुआ है. इन सब कारणों से कांग्रेस नहीं चाहती कि वह अपनी मांग को लेकर महागठबंधन से कोई समझौता करे.

इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि कांग्रेस इस बार आश्वस्त है कि वह 2 से ज्यादा सीट तो किसी भी कीमत में ले ही आएगी.

(ये लेखक के अपने विचार हैं.)

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