बिहार चुनाव 2020: धर्म पर भूख भारी




लॉक डाउन के दौरान बेचारगी की वह प्रतिनिधि तस्वीर जो पूरे विश्व में अनोखा था (सोशल मीडिया से साभार केवल प्रतीक के लिए)

-मोहम्मद मनसूर आलम

 

मुझे याद है जब अफ़गानिस्तान तालिबान से मुक्त हुआ तो अफ़गान के सैलून रात भर अपना कारोबार कर रहे थे. नौजवान अपनी दाढ़ियाँ कटाने के लिए लाइन से लगे थे. तालिबान ने जहाँ कुछ अच्छे काम किए थे वहीँ उसका सबसे ख़राब काम बामियान की बुद्ध मूर्ति का ढाहा जाना था. तालिबान ने अफीम के नशे में जकड़े अफगानिस्तान को अफीम मुक्त किया था जिसकी रिपोर्टिंग बहुत बाद में बीबीसी लन्दन ने की थी लेकिन उसने नाज़ी प्रथा को ही वहां स्थापित किया था. अफ़गानिस्तान में तालिबान की हुकूमत के कारण मलाला मिलीं. अफ़गानिस्तान अपने देश में 20वीं सदी में कोई नोबेल विजेता की कल्पना नहीं कर सकता था.

मोदी सरकार की तुलना मैं अफ़गानिस्तान की तालिबानी हुकूमत से नहीं कर सकता. ऐसा इसलिए भी नहीं कर सकता क्योंकि मोदी सरकार तमाम ख़राबियों के बावजूद लोकतान्त्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार है. मोदी हुकूमत की तुलना पेशवाई राज से करना मुझे सटीक लगता है. पेशवाओं की हुकूमत के खिलाफ ही महाराष्ट्र के दलितों ने अंग्रेजों से मिलकर पेशवाई शासन को अपने पैरों तले कुचला था. उसी लड़ाई को हम कोरेगांव की लड़ाई कहते है. बाबासाहेब आंबेडकर को भी उस लड़ाई पर गर्व था और पूरे देश के दलित उस लड़ाई को दलितों का शौर्य दिवस के रूप में मनाते हैं.

मोदी सरकार की तुलना पेशवाई राज से इस संदर्भ में भी सटीक बैठता है क्योंकि वहां शौर्य दिवस हमेशा से शान्तिपूर्वक मनता रहा लेकिन मोदी सरकार के 4 साल बाद ही पहली बार वह हिंसक हो गया. आज भी उस हिंसा के नाम पर किसी को भी बिना कहे एनआईए उठा लेती है. झारखंड के फ़ादर स्टेन स्वामी उस हिंसा के ताज़ा पीड़ीत हैं.

मोदी सरकार में दलित और असहमत समूह का दमन चरम पर रहा. इस कारण, जिग्नेश मेवानी, चन्द्रशेखर, कन्हैया, उमर ख़ालिद, शरजील इमाम, शरजील उस्मानी, देवांगना कलीता, नताशा नरवाल, लदिका जैसे युवा नेता भारत को मिले. नोबेल समिति को इनको संयुक्त रूप से नोबेल पुरस्कार देने के बारे में सोचना चाहिए.

2014 के बाद मोदी सरकार ने पूरे देश की प्राथमिकताएं ही बदल दी. जो लोग कांग्रेस से भ्रष्टाचार, महंगाई, पेट्रोल की बढ़ती कीमत, रुपए के अवमूल्यन आदि पर बात कर रहे थे वह अचनाक से मुसलमान, दलित, राम, अल्लाह करने लगे.

बोफोर्स पर राजीव गांधी को कोसने वाले राफ़ेल डील के घोटाले से खुद को अपरिचित दिखे. कोई शोर नही. नोटबंदी को मोदी ने विपक्ष के लाख हंगामे के बावजूद शुरूआती दिनों में राष्ट्रीय उत्सव बना दिया. सब लोग सीना तान कर कर्मठ भारतीय फौजी की तरह 2 हजार बैंक से निकालने में लगे रहे. 100 से ज़्यादा मौतों के बाद उफ़ तक नहीं हुआ. लोगों में यह बात बैठा दी गयी कि इससे नुकसान देश का नहीं बल्कि देश के बेईमानों का है. लेकिन जब इसका असर गरीब औरतों के गुल्लक पर हुआ तो लोगों को पता चला कि बैंक में न डाला गया सब धन काला नहीं होता. कुछ उससे भी अधिक सफ़ेद होता है क्योंकि वह गाढ़ी कमाई से पाई पाई की जमा पूँजी होती है. इसका असर गाँव में खूब हुआ अलबत्ता मीडिया ने इस पर चुप्पी साधी रखा. मीडिया का शहरीकरण यहाँ घातक दिखा.

इसके बाद जीएसटी के गलत कार्यान्वयन ने पूरे देश के व्यापारियों को जंजाल में डाल दिया. व्यापार ठप हो गया. सूरत के कारोबारियों का लगातार आक्रोश सडकों पर दिखा. कुछ को छोड़कर मीडिया इससे अनजान बनी रही.

मोदी सरकार ने अपने बेतुके निर्णयों से हुई देश की बदहाली को हिंदुत्व के गमछे से ओढ़ने का प्रयास किया. उदाहरण के लिए, नोटबंदी के असर को कम करने के लिए तीन तलाक बिल का लाना, पुलवामा आतंकी हमले के बाद कश्मीर में 370 का लागू करना, विदेश नीति की विफलता को ढंकने के लिए सीएए का क़ानून बनाना और एनआरसी लागू करने की बात करना, कोरोना की ग़ैर ज़िम्मेदारी को बेअसर करने के लिए कोरोना काल में ही राम मन्दिर का शिलान्यास करना ऐसे कुछ ठोस प्रमाण हैं जो बताते हैं कि मोदी सरकार ने अपनी विफलता को छिपाने के लिए हिंदुत्वा के अंगोछे का भरसक उपयोग किया.

ऐसा लगता है कि सीएए और एनआरसी पूरे देश में आरएसएस द्वारा दंगे कराने का एक मास्टर प्लान था. लेकिन देश में पहली बार मुसलामानों ने अपने मुद्दे में पूरे देश को शामिल किया और पूरे देश ने मुसलमानों का बिना शर्त समर्थन किया. पूरे देश ने भारतीय संविधान में लिखे ‘हम भारत के लोग’ का अक्षरशः पालन किया. पूरे देश में दो जगह को छोड़कर (दिल्ली के भयावह दंगे जो मीडिया रिपोर्ट्स और फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट्स से प्रमाणित हो चुके हैं कि यह गुजरात दंगे का ही एक प्रतिबिंब था लेकिन इन दंगे की भयावहता को भी पिंजा तोड़, स्वराज इंडिया, अनहद जैसे संगठनों ने कम किया और कई जगह हिन्दू मुस्लिम एकता अटूट दिखी और दूसरा बिहार के फुलवारी शरीफ़ में एक मौत के अलावा लगभग 40 लोगों के घायल की खबर जिसमें 2 पुलिस वाले भी थे) कहीं कोई अप्रिय घटना नहीं हुई.

यह कहना मुश्किल है कि कोरोना ने देश को देशव्यापी दंगे से बचा लिया या मोदी सरकार को 14 प्रतिशत मुसलमानों के आगे झुकने से लेकिन यह तो पक्का है कि कोरोना ने एनडीए की जन विरोधी फितरत को उजागर कर दिया.

कोरोना ने धर्म पर भूख को जीत दिलाई. भूख की जीत हुई. रोटी के मसले ने आरएसएस और देश विरोधी ताकतों के सारे सपने चूर कर दिए. इस दर्द को खुद मोहन भागवत ने अपने विजयदशमी के भाषण में प्रकट किया है.

बिहार चुनाव इसका जीता जागता प्रमाण है. नीतीश कुमार ने जिस तरह से बिहारी मजदूरों को देश के विभिन्न राज्यों में अपमानित किया. उन्हें अपने ही घर पैदल चल कर आने और पुलिस की बर्बरता झेलने पर मजबूर किया. लोगों के आँखों में आंसू थे. आज भी हैं. पूरा कारोबार चौपट हो गया. असंगठित श्रमिक वर्ग खाने खाने को तरस रहा है. कोई आर्थिक सहायता नहीं. छोटे कारोबार को फिर से उठाने के लिए देश के पास कोई प्लान नहीं.

मुझे नहीं लगता कि जब तक छोटे कारोबारियों को फिर से बहाल किया जाएगा भारत की अर्थव्यवस्था पटरी पर आ सकती है. इनमें छोटे प्राइवेट स्कूल, कोचिंग संस्थान, होटल, लॉज, शादी विवाह से जुड़े उद्योग प्रमुख हैं.

इस पूरे वर्ग का बिहार चुनाव में आक्रोश साफ़ है. जो बिहार 2019 में पूरा हिंदुत्व के अफीम में धुत्त था आज नेताओं को मार मार कर भगा रहा है. नीतीश कुमार को पूरी पुलिसिया व्यवस्था के बीच मुर्दाबाद के नारे सुनने को मिल रहे हैं.

बिहार में तीन चुनावों में पहली बार यह हुआ कि गाय और पाकिस्तान नहीं हुआ. बिहार भाजपा पुल गिना रही है. मोहन भागवत चुप हैं. ओवैसी कह रहे हैं कि सीमांचल को बाढ़ से मुक्त कराएंगे. अकबर उद्दीन ओवैसी गायब हैं और योगी को जनता ने मुर्दाबाद के नारों के साथ बाय बाय कर दिया.

किसी ने ठीक ही कहा है कि भूखे पेट भजन नहीं होय गोपाला ले तेरी कंठी ले तेरी माला.

जनता को एक सलाह – जैसे अभी जागे दिख रहे हैं हमेशा जागे रहें.

(मोहम्मद मंसूर आलम शौकिया पत्रकार हैं. विचार निजी हैं.)

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