बिहारः नेताओं की गिरफ्तारी की बजाय सरेंडर क्यों?




बिहार की पूर्व मंत्री मंजू वर्मा चेहरा छिपाए आत्म समर्पण के दौरान कोर्ट में जाते हुए (फ़ोटो: ट्विटर)

-मनीष शांडिल्य

सुर्खियों में लगातार बने हुए एक और ऐसे मामले में बिहार पुलिस आरोपी को गिरफ्तार नहीं कर पाई जिसमें अभियुक्त किसी दल के नेता थे. ताजा मामला बिहार की पूर्व मंत्री मंजू वर्मा का है जिन्होंने आर्म्स एक्ट में करीब तीन महीने तक फरार रहने के बाद मंगलवार को अदालत में सरेंडर किया. उनका गिरफ्तार नहीं होना लगातार चर्चा में बना हुआ था क्यूंकि इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने बीते दिनों बिहार सरकार और पुलिस को दो बार फटकार लगाई थी.



17 अगस्त को बिहार की पूर्व समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा के बेगुसराय जिले के चेरिया-बरियारपुर स्थित घर पर सीबीआई को छापेमारी में अवैध कारतूस मिले थे जिसके बाद मंजू और उनके पति चंद्रशेखर वर्मा पर आर्म्स एक्ट का मामला दर्ज हुआ था. इसी मामले मंन मंजू वर्मा ने मंगलवार की सुबह बेगूसराय जिले के मंझौल कोर्ट में सरेंडर किया. इससे पहले चंद्रशेखर वर्मा ने 29 अक्टूबर को अदालत में आत्मसमर्पण किया था.

आत्मसमर्पण के बाद मंजू वर्मा ने अपनी तबियत नासाज होने की शिकायत की और फिर अदालत में ही डॉक्टरों ने उनकी जांच की. स्वस्थ पाने के बाद उन्हें न्यायिक हिरासत में बेगूसराय जेल भेज दिया गया. इधर पटना में पुलिस मुख्यालय में प्रेस कांफ्रेंस कर एडीजी मुख्यालय एस के सिंघल ने दावा किया कि पुलिस की मेहनत और पेशेवर काम ने मंजू वर्मा को सरेंडर करने पर मजबूर किया. प्रेस कांफ्रेंस में एडीजी मुख्यालय ने यह भी साफ किया कि इस सरेंडर से सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन हो चुका है और अब बिहार के डीजीपी के एस द्विवेदी को खुद कोर्ट में पेश होने की जरुरत नहीं है. गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने बीते दिनों ये आदेश दिया था कि यदि मंजू वर्मा 27 नवंबर के पहले गिरफ्तार नहीं होती हैं तो बिहार के डीजीपी खुद कोर्ट में पेश होकर इसकी सफाई दें.

गौरतलब है कि चर्चित मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड जब सामने आया था तब तत्कालीन समाज कल्याण मंत्री होने के नाते मंजू वर्मा अचानक देश भर में चर्चा में आई थीं. वहीं इस मामले के मुख्य अभियुक्त ब्रजेश ठाकुर से कथित रूप से नजदीकियां रखने के कारण उनके पति चंद्रशेखर वर्मा पर गंभीर आरोप लगाए गए थे.

नीतीश सरकार में पहले भी हुए हैं आत्मसमर्पण

2015 के विधानसभा चुनावों के बाद नीतीश कुमार ने महागठबंधन और एनडीए दोनों ही गठबंधनों की सरकार की अगुवाई की और दिलचस्प यह कि दोनों ही सरकारों के दौरान सत्तारूढ़ गठबंधन के नेताओं पर जब-जब संगीन आरोप लगे तब उन्होंने ओरोपित होने के कई दिनों, हफ्तों या महीनों के बाद आत्मसमर्पण किया. यह स्थिति वर्तमान सरकार को कठघरे में खड़ी करती है. ऐसे में बिहार सरकार पर यह आरोप लगता रहा है कि वह रसूखदार आरोपियों को अदालत से राहत लेने का पूरा मौका देती है और इसमें नाकाम रहने पर आरोपी सरेंडर करते हैं. यह स्थिति सुशासन के दावे पर गंभीर सवाल है.



महागठबंधन के माननीय

नीतीश कुमार के नवंबर, 2015 के बाद के कार्यकाल में ऐसे सरेंडर की शुरुआत 2016 के पहले महीने से हुई. इनमें से पहला मामला छेड़खानी के अभियुक्त तत्कालीन जदयू विधायक और वर्तमान में राजद सांसद सरफराज आलम और दूसरा बलात्कार के अभियुक्त राजद विधायक राजबल्लभ यादव का था. तब बाद में इन दोनों को ही इनकी पार्टियों ने निलंबित कर दिया था.

साथ ही 2016 के मई में हुए चर्चित गया रोडरेज मामले में भी दो बार अभियुक्तों ने समर्पण किया था. इस मामले में रॉकी यादव की गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने जब उनकी मां और विधान पार्षद मनोरमा देवी के घर पर छापा मारा था तो उनके घर से विदेशी शराब की बोतलें बरामद हुई थीं. इसके बाद पुलिस ने उन पर गैर कानूनी रूप से शराब रखने के आरोप में मामला दर्ज किया था. इसके बाद वो फरार हो गईं और फिर अग्रिम जमानत की याचिका खारिज होने के बाद उन्होंने सरेंडर किया था.

वहीं सुनवाई के दौरान एक बार रॉकी यादव को पटना हाईकोर्ट से जमानत मिल गई थी. जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया. लेकिन जमानत रद्द किए जाने के बाद पुलिस रॉकी को गिरफ्तार नहीं कर पाई थी बल्कि उन्होंने गया सिविल कोर्ट में सरेंडर किया था. रोडरेज मामले में अब रॉकी यादव दोषी करार दिए गए हैं.

एनडीए दौर के सरेंडर

मुजफ्फरपुर जिले के धर्मपुर में इस साल फरवरी के अंत में हुए सड़क हादसे के अभियुक्त और निलंबित भाजपा नेता मनोज बैठा ने 28 फरवरी की आधी रात मुजफ्फरपुर पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया था. मुजफ्फरपुर के धर्मपुर में हुए इस सड़क हादसे में बोलेरो गाड़ी के चपेट में आने से नौ बच्चों की मौत हो गई थी, इस गाड़ी को कथित तौर पर मनोज बैठा चला रहे थे. दुर्घटना में दस बच्चे घायल भी हुए थे.



इस साल मार्च में हुए भागलपुर के नाथनगर सांप्रदायिक उपद्रव मामले में मुख्य आरोपी केंद्रीय मंत्री अश्विनी चैबे के बेटे अर्जित शाश्वत को बनाया गया था. अर्जित शाश्वत सहित नौ लोगों पर बिना अनुमति लिए भारतीय नववर्ष का जुलूस निकालने और धार्मिक भावनाएं भड़काने वाले नारे लगाने के आरोप लगाए गए थे. उन्हें भी बिहार पुलिस पकड़ नहीं पाई थी. हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने के बाद उन्होंने पटना के मशहूर महावीर मंदिर के पास 31 मार्च की रात को सरेंडर किया था. अर्जित के मामले में एक और दिलचस्प बात यह हुई थी कि फरार रहने के दौरान अर्जित रामनवमी के एक जुलूस में सार्वजनिक रूप से पटना में भी दिखे मगर फिर भी पुलिस उन्हें गिरफ्तार नहीं कर पाई.

(लेखक युवा पत्रकार हैं.)

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