प्रधानमंत्री कार्यालय के हस्तक्षेप से राफेल सौदा कमज़ोर हुआ, रक्षा मंत्रालय ने किया था विरोध

फ़्रांसिसी पक्ष ने प्रधानमंत्री कार्यालय के हस्तक्षेप का लाभ उठाया और भारतीय टीम जो सौदे में मोल तोल कर रहा था उसका पक्ष कमज़ोर हुआ




नई दिल्ली के हैदराबाद हाउस में जनवरी 25, 2016 को तत्कालीन रक्षा मंत्री दिवंगत मनोहर पर्रिकर और फ़्रांसिसी रक्षा मंत्री Jean-Yves Le Drian के साथ 36 राफ़ेल फाइटर एयरक्राफ्ट की खरीदारी के समझौते पर दस्तखत करने के बाद दस्तावेजों का आदान-प्रदान करते हुए. इस समय फ़्रांसिसी राष्ट्रपति Francois Holaande और प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी मौजूद थे. (फोटो क्रेडिट: के.वी.मूर्ति/द हिन्दू)

-एन. राम

ये आलेख द हिन्दू समाचार-पत्र में अंग्रेजी में प्रकाशित किए गए थे. इन आलेखों के बारे में अटॉर्नी जनरल वेणु गोपाल ने कहा था कि ये आलेख राफ़ेल के गोपनीय दस्तावेज़ के आधार पर लिखे गए हैं जो रक्षा मंत्रालय से चोरी हो गए थे. इसके बाद रक्षा मंत्रालय की सुरक्षा बंदोबस्त पर सवाल उठाए गए. मोदी सरकार को और अधिक फजीहत से बचाने के लिए बाद में वेणु गोपाल ने कहा कि दस्तावेज़ चोरी नहीं हुए बल्कि उनके फोटो कॉपी लिए गए थे. इससे स्पष्ट है कि इन आलेख में जो भी लिखे गए हैं वे अक्षरशः सही हैं. हिंदी पाठकों के लिए पहली बार हिंदी में हम एन राम के राफेल से जुड़े सभी आलेखों को यहाँ हू-बहू प्रकाशित कर रहे हैं. इन आलेखों को द मॉर्निंग क्रॉनिकल की टीम ने सरल भाषा में अनुवाद किया है. इन आलेखों का मौलिक अधिकार द हिन्दू के पास सुरक्षित है और इस पर हमारा कोई अधिकार नहीं. हम इसकी सत्यता को भी प्रमाणित नहीं करते.

भारत और फ्रांस के बीच €7.87 यानी 670 अरब रुपए के राफेल सौदे में प्रधानमंत्री कार्यालय के हस्तक्षेप से भारत की ओर से जो टीम फ्रांसिसी टीम से मोल जोल कर रही थी उसका पक्ष कमज़ोर हुआ. इसका विरोध खुद रक्षा मंत्रालय ने किया था. रक्षा मंत्रालय के 24 नवम्बर, 2015 की टिप्पणी से यह स्पष्ट है कि सौदे पर रक्षा मंत्रालय के साथ पीएमओ की समानान्तर बात-चीत से रक्षा मंत्रालय और भारतीय सौदेबाज़ी वाली टीम की पोजीशन कमज़ोर हुई और यह बात तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर के संज्ञान में लाया गया था.



इसमें यह लिखा गया है कि “हमारी पीएमओ को यह सलाह है कि कोई भी अधिकारी जो भारतीय सौदेबाजी दल का हिस्सा नहीं है को फ़्रांसिसी सरकार के अधिकारियों से अलग से बात करने से बचना चाहिए.” इसमें आगे कहा गया है कि यदि पीएमओ रक्षा मंत्रालय द्वारा किए जा रहे बात-चीत के परिणाम से संतुष्ट नहीं है तो सही स्तर पर पीएमओ को सौदे के संशोधित तौर-तरीके को अपनाना चाहिए.”

अक्टूबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट को दिए गए सरकारी हलफनामे के अनुसार, एयर स्टाफ उप प्रमुख के नेतृत्व में सात-सदस्यी टीम द्वारा राफेल सौदे के ऊपर बात-चीत की गयी थी. इन सौदों में पीएमओ की किसी भी भूमिका का कोई ज़िक्र नहीं है.

द हिन्दू को प्राप्त आधिकारिक दस्तावेजों से यह स्पष्ट है कि रक्षा मंत्रालय ने इसका विरोध किया था कि पीएमओ द्वारा उठाए गए क़दम “रक्षा मंत्रालय और सौदेबाज़ी की टीम द्वारा उठाए गए क़दम के “विपरीत” था. तत्कालीन रक्षा सचिव, जी. मोहन कुमार ने यह आधिकारिक नोट खुद अपने हाथों से लिखा है: “रक्षा मंत्री कृपया इसे देखें. यह आवश्यक है कि पीएमओ ऐसे बात-चीत से बचे जिससे हमारी सौदेबाजी वाली टीम की साख गंभीर तौर पर गिरती है.”

रक्षा मंत्रालय का नवम्बर 24, 2015 का आंतरिक नोट

सख्त विरोध

उनका सख्त विरोध नवम्बर 4, 2015 को एस. के. शर्मा, उप सचिव (Air-II) द्वारा तैयार टिप्पणी में दर्ज किया गया था और मंत्रालय के संयुक्त सचिव और एक्वीजीशन मैनेजर (Air) और डायरेक्टर जनरल (एक्वीजीशन) ने इसका समर्थन किया था.

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अप्रैल 2015 में पेरिस में घोषित नया राफेल सौदा उस सौदे से बिलकुल मेल नहीं खाता जो लंबे समय से यानी कांग्रेस के जमाने से चल रहा था. इसके बाद जब 2016 में गणतंत्र दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति Francois Hollande का भारत में आगमन हुआ तब भारत और फ्रांस के मध्य समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किया गया. 36 राफेल फाइटर जेट के इंटर-गवर्नमेंटल समझौते पर परिणामस्वरूप सितम्बर 23, 2016 को हस्ताक्षर किए गए.

रक्षा मंत्रालय के नोट के अनुसार, पीएमओ द्वारा संचालित समानांतर सौदे का विवरण मंत्रालय के संज्ञान में तब आया जब फ़्रांसिसी सौदेबाजी की टीम के मुखिया जनरल स्टेफेन रेब (General Stephen Reb) का पत्र मंत्रालय को मिला. इससे साफ़ स्पष्ट है कि रक्षा मंत्रालय की ओर से सौदा करने वाली टीम को धोखे में रख कर पीएमओ ने सौदा कर लिया. ज्ञात रहे कि द हिन्दू के दावे के अनुसार यह दस्तावेज़ भी इसके पास उपलब्ध है. इस पत्र में प्राइम मिनिस्टर ऑफिस के संयुक्त सचिव श्री जावेद अशरफ और फ़्रांसिसी रक्षा मंत्रालय के रणनीतिक सलाहकार श्री लुईस वस्सी (Luis Vassy) के फ़ोन से बात-चीत का भी ज़िक्र है जो 20.10.2015 को हुआ था.



जनरल रेब के पत्र का संज्ञान रक्षा मंतालय ने पीएमओ को कराया था. भारतीय सौदेबाज़ी टीम के मुखिया, एयर मार्शल एस.बी.पी. सिन्हा, AVSM VM, एयर स्टाफ के उप मुखिया ने भी श्री अशरफ को पत्र लिखा था.

नवम्बर 11, 2015 के एयर मार्शल के जवाब में श्री अशरफ ने इसकी पुष्टि की कि फ़्रांसिसी रक्षा मंत्रालय के रणनीतिक सलाहकार श्री Luis Vassy के साथ उनकी बात-चीत हुई है. उनहोंने कहा कि Vassy ने फ़्रांसिसी राष्ट्रपति की सलाह पर और जनरल रेब के पत्र से जुड़े मुद्दों पर उनसे बात की थी.

राष्ट्रपति Hollande ने AFP को कहा था जिसकी रिपोर्टिंग Le Monde ने सितम्बर 2018 में किया था. इसमें शुक्रवार को मोंट्रियल में कांफ्रेंस के अवसर पर Agence France-Presse द्वारा पूछे जाने पर  उनहोंने कहा कि रिलायंस समूह का नाम राफेल सौदे में की गयी सौदेबाजी के ‘नए फार्मूला’ में आया और इसका निर्णय मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद आया था. इसका सन्दर्भ सीधे सीधे अनिल अंबानी के रिलायंस डिफेन्स से था.

रक्षा मंत्रालय के नोट में यह भी लिखा गया है कि “रक्षा मंत्रालय द्वारा बनाई गयी भारतीय सौदेबाज़ी की टीम के साथ फ़्रांसिसी पक्ष जब उस काम को कर रही थी उसी समय फ़्रांसिसी रक्षा मंत्रालय के सलाहकार के साथ प्रधानमंत्री के संयुक्त सचिव के बीच की रणनीतिक बात-चीत समानांतर सौदेबाजी के बराबर है.”

हित के लिए हानिकारक

इस टिप्पणी में यह भी कहा गया कि “ऐसे समानान्तर सौदेबाजी से तो हमारे हित को ही नुकसान होगा और फ़्रांसिसी पक्ष इसका अलग से कोई मतलाब निकाल कर फायदा उठा सकती है और भारतीय सौदेबाज़ी टीम द्वारा लिए गए रूख कमज़ोर होंगे. और इस मामले में यही हुआ है.”

“स्पष्ट उदाहरण” देते हुए रक्षा मंत्रालय की टिपण्णी में इस बात का ज़िक्र हुआ है कि जनरल रेब ने अपने पत्र में इसका उल्लेख किया है कि “फ़्रांसिसी रक्षा मंत्रालय के सलाहकार और प्रधानमंत्री का संयुक्त सचिव के बीच की चर्चाओं के नतीजे पर गौर करते हुए, सप्लाई प्रोटोकॉल में किसी बैंक गारंटी का प्रावधान नहीं है और लेटर ऑफ़ कम्फर्ट (Letter of Comfort) में इंडस्ट्रियल सप्लायर द्वारा सप्लाई प्रोटोकॉल के ठीक ठीक कार्यान्वयन के पर्याप्त आश्वासन हैं.”

टिप्पणी के अनुसार, यह रक्षा मंत्रालय की पोजीशन और भारतीय सौदेबाजी टीम की यह शर्त कि व्यापारिक प्रस्ताव सॉवरेन/सरकारी गारंटी द्वारा या फिर बैंक गारंटी द्वारा सपोर्टेड होना चाहिए.” टिप्पणी के अनुसार समानांतर सौदेबाजी में विवाचन (arbitration) व्यवस्था पर उठाया गया क़दम भी इसके विपरीत कदम का एक और उदाहरण है.

“समानांतर सौदेबाजी” का केवल यही उदाहरण नहीं है जिसमें भारतीय पक्ष ने विपरीत प्रयास किए. इसकी रिपोर्ट पहले ही कहीं और की गयी है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, अजित डोवाल ने पेरिस में जनवरी 2016 में फ़्रांसिसी पक्ष के साथ बात चीत की और द हिन्दू के पास ऐसे दस्तावेज़ हैं जो इस बात की पुष्टि भी करते हैं.

डोवाल ने पर्रिकर को सॉवरेन गारंटी (sovereign guarantee) या बैंक गारंटी हटाने की सलाह दी थी जो तत्कालीन रक्षा मंत्री ने अपनी फाइल नोट में इसे रिकॉर्ड किया था.

(इस आलेख को आप अंग्रेज़ी में द हिन्दू की साईट पर यहाँ पढ़ सकते हैं.)

 

 

Liked it? Take a second to support द मॉर्निंग क्रॉनिकल हिंदी टीम on Patreon!