इंसानियत के लिए सबक है दिल्ली के इस एम्बुलेंस ड्राईवर की मौत




-समीर भारती

आरिफ़ खान दिल्ली दंगे के सबसे प्रभावित इलाके सीलमपुर में रहते थे और निशुल्क एंबुलेंस सेवा (Free Ambulance Service) देने वाले शहीद भगत सिंह सेवा दल के साथ काम करते थे. यह दल कोरोना मरीज़ को अस्पताल ले जाने का काम करता है और कोरोना मरीज़ की मौत हो जाने पर उसका अंतिम संस्कार भी करता है. ग़रीब होने के बावजूद आरिफ़ राजा की तरह पीड़ीत परिवार के अंतिम संस्कार में मदद करते थे.

दिल्ली में आरिफ़ खान (Arif Khan) नाम के एक एम्बुलेंस ड्राईवर की मौत हो गयी. कोरोना से अब तक देश में एक लाख से अधिक मौत हुई है. इस मौत की चर्चा का सबब है इनका नाम और इनका वह इलाका जहाँ वह अपने परिवार के साथ रहते थे.

आरिफ़ खान सीलमपुर में अपने परिवार के साथ रहते थे जो दिल्ली दंगे का सबसे प्रभावित इलाका है. सैकड़ों घरों, दुकानों, कईयों मस्जिदों और दरगाहों को इसी इलाके में जलाया गया था. इसी इलाके में आकर भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने लोगों को उकसाया था और अल्प संख्यक समुदाय के लोगों को डराया था. आज भी दिल्ली का यह इलाका दंगे के कारण जलने की गंध और खून के छींटों को भूल नहीं पाया है. और फिर तुरंत बाद कोरोना ने पूरे देश को अपनी बाहों में जकड लिया. दिल्ली दंगे की आग बुझी भी नहीं थी कि कोरोना और फिर लॉकडाउन ने इस पूरे इलाके को मानो तबाह ही कर दिया.

दिल्ली दंगे के बाद लॉक डाउन की हालत में ही इस अकेले इलाके से सैकड़ों लोगों को पुलिस उठा ले गयी. इन सबके बावजूद आरिफ़ खान की इंसानियत मरी नहीं और वह बिना किसी भेद भाव के लोगों की सेवा करते रहे. कोरोना मरीजों को जब परिवार त्याग देता वैसी स्थिति में वह न केवल उन मरीजों को अस्पताल पहुंचाते बल्कि उनकी मौत के बाद उनके शवों का अंतिम संस्कार भी करते.

ऐसा करते करते खुद आरिफ़ खान कोरोना की चपेट में आ गए और शनिवार की सुबह को हिंदू राव अस्पताल में कोरोना संक्रमण (Corona Infection) से उनकी मौत हो गई.

सीलमपुर के रहने वाले आरिफ़ खान का सेवा में समर्पण ऐसा कि वह पिछले छह महीने से अपने घर तक नहीं गए थे. सूत्रों के अनुसार, वह छह महीने से घर से दूर पार्किंग एरिया में ही सो रहे थे. फ़ोन के जरिए ही अपनी पत्नी और बच्चों के संपर्क में थे.

आरिफ़ खान जिस फ्री एंबुलेंस सेवा (Free Ambulance Service) के लिए काम करते थे वह नाम भी उस शहीद के नाम पर है जिसने हँसते हँसते देश के लिए अपनी जान दे दी थी. वह शहीद भगत सिंह (Shaheed Bhagat Singh Seva Dal) सेवा दल के साथ काम करते थे. यह सेवा दल दिल्ली एनसीआर में फ्री आपातकालीन सेवाएं देता है.

जब किसी कोरोना मरीज की मौत हो जाती थी, और उसके परिवार के पास अंतिम संस्कार के लिए पैसे नहीं होते थे, तो आरिफ खान पैसे देकर भी उनकी मदद करते थे. आरिफ के सहयोगियों ने कहा कि जब उनकी मौत हुई, तो उनका परिवार उनके पास नहीं था, उनके शव को परिवार ने काफी दूर से ही कुछ मिनट के लिए देखा.

आरिफ़ के साथ काम करने वाले जितेंद्र कुमार ने कहा कि आरिफ़ ने सुनिश्चित किया था कि सभी को अंतिम विदाई मिले, लेकिन भाग्य का खेल कि उनका अपना परिवार उनके लिए यह नहीं कर सका. आरिफ़ का परिवार सिर्फ कुछ मिनट के लिए ही उन्हें दूर से देख सका. उन्होंने कहा कि खान मार्च से अब तक 200 कोरोना संक्रमित शवों के संपर्क में आए थे.

आरिफ़ खान 3 अक्टूबर को काफी बीमार हो गए थे, जिसके बाद उनका टेस्ट किया गया तो वह कोरोना पॉजिटिव निकले. अस्पताल में भर्ती होने के एक दिन बाद ही उनकी मौत हो गई. आरिफ खान के 22 साल के बेटे आदिल ने कहा कि उन्होंने अपने पिता को 21 मार्च को अंतिम बार देखा था, जब वह घर पर कुछ कपड़े लेने गए थे. परिवार को हमेशा उनकी चिंता होती थी, वह अपना काम अच्छी तरह से कर रहे थे, वह कभी भी कोरोना संक्रमण से नहीं डरे.

आरिफ के कई सहयोगियों ने बताया कि आरिफ बहुत ही दयालु थे. उनकी आय बहुत कम थी फिर भी वह लोगों की मदद राजा की तरह करते थे. दिल्ली की गंगा-जमनी तहज़ीब की मिसाल आरिफ़ मुस्लिम होते हुए भी हिंदुओं के अंतिम संस्कार के लिए पीड़ित परिवार की मदद करते थे, वह अपने काम में पूरी तरह समर्पित थे और हर दिन 12 से 14 घंटे तक काम करते थे, कभी-कभी वह सुबह के तीन बजे तक भी काम करते थे.

भारत के उप-राष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने आरिफ खान की तारीफ़ में ट्वीट किया है. उनहोंने लिखा “कोविड महामारी के विरुद्ध अभियान के समर्पित योद्धा दिल्ली के श्री आरिफ खान की मृत्यु के समाचार से दुखी हूं। महामारी के दिनों में अपनी एम्बुलेंस से आपने मृतकों की सम्मानपूर्वक अंत्येष्टि में सहायता की। ऐसे समर्पित नागरिक की मृत्यु समाज के लिए क्षति है। मेरी विनम्र श्रद्धांजलि। ईश्वर पुण्यात्मा को आशीर्वाद दें और परिजनों को धैर्य प्रदान करें।”

आरिफ़ खान के परिवार को दिल्ली सरकार से और केंद्र की सरकार से मदद की उम्मीद है. ऐसा करना किसी भी सरकार द्वारा समाज में मददगार को प्रोत्साहित करने के लिए आवश्यक क़दम होगा.

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