दिल्ली दंगे: इस ‘बहादुर पुलिस ऑफिसर’ ने दंगाई भीड़ का डट कर सामना किया और पुलिस बल में लिए गए क़सम की लाज रखी




श्री नीरज जादौन ने प्रोटोकॉल तोड़ कर दंगाइयों को रोका (चित्र साभार: BBC)

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जब भी दिल्ली दंगे 2020 पर चर्चा की जाएगी, अच्छे लोग और देशभक्त भारतीय कम से कम भारतीय पुलिस बल की वर्दी पहने इस एक अधिकारी का नाम ज़रूर याद रखेंगे जिन्होंने अपने पुलिस बल के प्रोटोकॉल को तोड़ कर लोगों की जान बचाने के लिए सशस्त्र उपद्रवी भीड़ से लोहा किया और उन्हें हिंसा से पीछे हटने के लिए मजबूर किया. इस बहादुर ऑफिसर का नाम ऐसे ही शान और इज्ज़त से लिया जाएगा जिस तरह हम अभी भी हर्ष मंदर और संजीव भट्ट का नाम गुजरात दंगे 2002 में उनकी बहादुरी के लिए लेते हैं। यह नाम कोई और नहीं बल्कि श्री नीरज जादौन का है जिन्होंने विनम्रतापूर्वक अपने इस काम को वीर गाथा के रूप में ब्यान करने से अस्वीकार कर दिया और कहा कि उन्होंने वही किया जो उन्होंने भारत पुलिस बल में शामिल होने के लिए किया था। उन्होंने कहा कि उन्होंने वह किया जिसकी क़सम वह पुलिस बल में शामिल होते समय लेते हैं।

पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश के पुलिस अधीक्षक श्री नीरज जादौन ने बीबीसी के विकास पांडे को बताया कि वह 25 फ़रवरी को सीमा चौकी पर गश्त कर रहे थे, जब उन्होंने दिल्ली के करावल नगर से गोलियां चलने की आवाज़ सुनी जो उनसे सिर्फ 200 मीटर (650 फीट) की दूरी पर था।

बीबीसी के अनुसार, “उन्होंने 40-50 लोगों की भीड़ को वाहनों में आग लगाते देखा और जब उनमें से ही एक पेट्रोल बम के साथ एक घर में कूदा तो उस समय, श्री जादौन ने पारंपरिक पुलिस प्रोटोकॉल को तोड़ने का फैसला किया और राज्य की सीमा को पार कर दिल्ली में दाख़िल होने का अंतिम निर्णय लिया।

भारत में, पुलिस अधिकारियों को राज्य की सीमाओं को पार करने के लिए स्पष्ट अनुमति की आवश्यकता होती है।

“मैंने सीमा लांघना चुना। मुझे खतरे के बारे में पूरी तरह पता था इसके बावजूद अकेले जाने को तैयार हुआ और इस सच्चाई के साथ कि यह मेरे अधिकार क्षेत्र में नहीं था। वे मेरे जीवन के सबसे भयानक 15 सेकंड थे। शुक्र है कि टीम ने मेरा साथ दिया, और मेरे सीनियर ने भी मेरा समर्थन किया जब मैंने उन्हें बाद में सूचित किया,” ब्रिटिश समाचार पत्र को उनहोंने बताया।

“यह खतरनाक था क्योंकि हम उनसे संख्या में बहुत कम थे और दंगाई हथियारों से लैस थे। हमने पहले उनके साथ बातचीत करने की कोशिश की और जब हम असफल हो गए, तो हमने उन्हें बताया कि पुलिस गोली चला देगी अगर वह पीछे नहीं हटे। वे पीछे हटे लेकिन कुछ सेकंड बाद उन्होंने हम पर पत्थर फेंके और हमने भी गोलियों की भी आवाज़ सुनी,” उन्होंने कहा।

हालांकि, श्री जादौन और उनकी टीम अपनी जगह पर बने रहे और दंगाइयों को अंत तक पीछे हटाते रहे।

हिंदी दैनिक अमर उजाला के एक रिपोर्टर रिची कुमार ने श्री जादौन के फैसले को “बहुत ही बहादुरी वाला कृत्य” बताया।

“स्थिति बहुत खतरनाक थी। दंगाई पूरी तरह से सशस्त्र थे और वे किसी की बात सुनने के लिए तैयार नहीं थे। मैं उन्हें खून का प्यासा कह सकता हूं। वे पुलिस पर पत्थर फेंक रहे थे, लेकिन श्री जादौन टस से मस नहीं हो रहे थे। पुलिसकर्मियों को सचमुच खतरा था क्योंकि दंगाई उन पर गोलियां चला रहे थे, “उन्होंने बीबीसी को बताया।

विवादास्पद नागरिकता कानून के खिलाफ प्रदर्शनकारियों और क़ानून के समर्थकों के बीच उत्तरी-पूर्वी दिल्ली में पहली बार हिंसा भड़की।

लेकिन तब से यह सांप्रदायिक रूप ले चुका है।

श्री जादौन ने कहा कि उनहोंने देखा कि दंगाई आगजनी के लिए पूरी तरह से तैयार हो कर आए थे।

“इस इलाके की कई दुकानों में बांसों का भंडार था। आग लगने से पूरा इलाका दहल जाता और ऐसा होने दिया जाता तो, दिल्ली में मरने वालों की तादाद और ज्यादा होती।”

उनके इस कृत्य को नायकवाद कहने पर वह बड़ी शालीनता से नकारते हैं. वह कहते हैं “मैं हीरो या नायक नहीं हूँ. मैं हर भारतीय की रक्षा करने की शपथ ली है. मैं बस अपना काम कर रहा था कयोंकि मैं अपनी नजरों के सामने लोगों को मरता हुआ नहीं देख सकता था. हम इस स्थिति में थे कि दखल दे सकें और हमने वही किया.

इस पूरे कृत्य में न केवल श्री जादौन बल्कि वह सब पुलिसकर्मी सराहना के पात्र हैं जिन्होंने पुलिस बल की तब साख बचा ली जब दिल्ली पुलिस ख़ास कर तत्कालीन पुलिस कमीशनर अमूल्य पटनायक की की चौतरफा आलोचना हो रही है.

 

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