‘लोकतंत्र संकट में, हमें उनकी बात सुनने की जरूरत जो हमें नापसंद हैं’




अरुण माइरा

साकेत सुमन (आईएएनएस)

नई दिल्ली, 4 सितम्बर | योजना आयोग के पूर्व सदस्य अरुण माइरा का कहना है कि हम जिन लोगों को पसंद नहीं करते हैं, उनके खिलाफ वास्तविक दुनिया में ‘शारीरिक हिंसा’ और सोशल मीडिया पर ‘शाब्दिक हिंसा’ आज बढ़ रही है। ऐसे चलन के बढ़ने के कारण लोकतंत्र की मूल भावना ही संकट में पड़ गई है।

इस समस्या के समाधान के बारे में पूछे जाने पर प्रबंधन सलाहकार ने आईएएनएस से एक साक्षात्कार में कहा, “हमें ऐसे लोगों की बातें और गहराई से सुननी चाहिए जो हमारे जैसे नहीं हैं।”

उन्होंने अपनी किताब ‘लिसनिंग ऑफ वेल-बीइंग’ के बारे में बात करते हुए कई मुद्दों पर अपने विचार साझा किए।

माइरा ने कहा, “कारण चाहे जो भी हो, लोग उनके खिलाफ अधिक हिंसा की घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं, जिन्हें वे नापसंद करते हैं। सोशल मीडिया पर किसी मुद्दे पर व्यक्तिगत विचार पोस्ट करना खतरनाक हो चुका है। जवाब गाली में बदल गया है। किसी दूसरे की मर्यादा का कोई सम्मान नहीं किया जाता। लोगों को शारीरिक हिंसा के नाम पर बार-बार धमकाया जाता है।”

उन्होंने कहा कि ट्रोल करने वाले क्रूरतापूर्वक अपने शिकार के पीछे जाते हैं।

माइरा ने कहा, “सोशल मीडिया एक बेहद हिंसक स्थान बन चुका है। किसी खराब शहर की रात की तरह..जहां घूमना सुरक्षित नहीं है।”

माइरा ने साथ ही कहा कि वास्तविक दुनिया में भी सड़कें बेहद असुरक्षित हो चुकी हैं।

उन्होंने कहा, “लंदन, बर्लिन या बार्सिलोना – किसी भी सभ्य देश में अचानक ही सड़क पर कोई कार या ट्रक भारी विध्वंस का हथियार बन सकता है।”

उन्होंने कहा कि नस्लीय और आव्रजन विरोधी दक्षिणपंथी दलों के उत्थान के साथ पश्चिमी लोकतांत्रिक दुनिया में लोकतंत्र के संकट में होने की चिंता बढ़ गई है।

उन्होंने कहा कि उदाहरण के तौर पर अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के समर्थक केवल ट्रंप की बात पर ही भरोसा करते हैं और केवल उनकी विचारधारा वाले समाचार चैनल ही देखते हैं। दूसरी ओर बड़ी संख्या में अमेरिकी नागरिक हैं जो ट्रंप की विचारधारा से सहमत नहीं हैं, लेकिन उनके भी अपने पसंदीदा समाचार स्रोत हैं।

उन्होंने कहा, “उन्हें एक दूसरे की बात सुननी चाहिए और एक दूसरे की चिंताएं समझनी चाहिए। केवल इसी तरह देश समावेशी और साथ ही हकीकत में लोकतांत्रिक हो सकता है, जिसका अर्थ है हर किसी को समान अवसर मिलना।”

‘लिसनिंग ऑफ वेल-बीइंग’ में माइरा ने लोगों को सुनने की ताकत का इस्तेमाल करने के तरीके सिखाए हैं।

उन्होंने अपने अनुभवों के आधार पर जोर देकर कहा है कि गहराई से सुनने से, खासतौर पर उन लोगों को जो हमारे जैसे नहीं हैं, हम सभी के लिए समावेशी, न्यायपूर्ण, मैत्रीपूर्ण और सतत दुनिया बना सकते हैं।

उन्होंने कहा कि यह कहना गलत होगा कि न सुनने की प्रवृत्ति केवल पश्चिमी दुनिया तक ही सीमित है।

माइरा ने कहा, “भारत में भी यही मुद्दे हैं। हमारे देश में विविध लोग रहते हैं। हमें अपनी विविधता पर गर्व है। हालांकि, सही मायने में एक लोकतांत्रिक देश होने के लिए सभी लोगों को यह महसूस होना चाहिए कि वे समान हैं।”

उन्होंने कहा, “नागरिकों के लिए एक दूसरे की बात सुनने की जरूरत किसी भी अन्य देश से भारत में है क्योंकि हमारा देश सबसे अधिक विविधताओं वाला है। इसलिए हमें अपने देश में ऐसे लोगों की बात और ज्यादा गहराई से सुनने की कोशिश करनी चाहिए जो अपने इतिहास, अपनी संस्कृति, अपने धर्म या अपनी नस्ल के लिहाज से हमारे जैसे नहीं हैं।”

माइरा ने कहा, “इसलिए हमें इस बारे में बहुत तीखी परिभाषा नहीं गढ़नी चाहिए कौन लोग ‘भारतीय’ हैं, उनकी भाषा क्या होनी चाहिए, उन्हें कौन सा धर्म अपनाना चाहिए या किस रिवाज को अपनाना चाहिए। इसकी कोई एक परिभाषा नहीं रच सकते क्योंकि ऐसा करने पर कई लोग इस परिभाषा के दायरे से अलग रह जाएंगे। इस प्रकार हम देश को खतरनाक ढंग से ‘सच्चे भारतीयों’ और उन लोगों में विभाजित कर देंगे जो कथित तौर पर गैर भारतीय हैं। निश्चित तौर पर भारत में ऐसी ताकतें बढ़ रही हैं।”

माइरा (74) ने उम्मीद जताई कि उनके सभी पाठक इस बात को समझेंगे कि दुनिया को हर किसी के लिए एक बेहतर स्थान बनाने के लिए सुनना बेहद जरूरी है। उन्होंने साथ ही कहा यह दुनिया की जटिल समस्याओं का पूरा समाधान नहीं है, लेकिन अन्य लोगों की विचारधारा को सुनकर हम संघर्ष से बच सकते हैं और बेहतर समाधान तलाश सकते हैं।

लाहौर में जन्मे और दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफेंस कालेज से पढ़े माइरा इससे पहले भी दो प्रसिद्ध किताबों ‘ऐरोप्लेन व्हाइल फ्लाइंग : रिफॉर्मिग इंस्टीट्यूशन्स’ और ‘अपस्टार्ट इन गवर्नमेंट: जरनीज आफ चेंज एंड लर्निग’ का लेखन कर चुके हैं।

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