शहरों का विकास सड़क, फ्लाईओवर और भवन निर्माण नहीं बल्कि शहर वालों का शहर पर अधिकार शहरी विकास की असल परिभाषा: डॉ गौतम भान




डॉ गौतम भान चंद्रशेखर व्याख्यान में बात चीत करते हुए, साथ में प्रोफेसर अपूर्वानंद (बीच में) और अधिवक्ता विनोद कुमार (बायीं ओर)

“शहरों की भी कहानियाँ होती हैं और उनका सुनना और सुनाना ज़रूरी. अब समय आ गया है जब हमें शहरों की कहानियां सुननी और सुनानी चाहिए. देश स्वतंत्र तो 1947 में हुआ लेकिन शहरी विकास मंत्रालय का अस्तित्व ढाई दशक के बाद आया और वह भी आधा अधूरा. क्योंकि शहरी विकास मंत्रालय के साथ एक और मंत्रालय बना जिसका नाम था आवास और शहरी गरीबी उपशमन मंत्रालय – मानो आवास और गरीबी उन्मूलन शहर विकास का हिस्सा ही न हो. शहरी विकास मंत्रालय की यही खामी थी कि शहर के विकास में शहरी आवास और शहरी गरीबी उन्मूलन को दरकिनार रखा गया,” डॉ गौतम भान ने पटना में गुरुवार को बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के सभागार में यह कहा.

इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ ह्यूमन सेटलमेंट्स में अध्यापन कार्य से जुड़े डॉ गौतम भान गुरुवार को पूर्व जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष चंद्रशेखर की स्मृति में उनके जन्मदिन पर हर वर्ष मनाए जाने वाले व्याख्यान की 23वीं कड़ी में बोल रहे थे. छात्र नेता चंद्रशेखर की हत्या 1994 में दिन दहाडे सिवान में कर दी गयी थी जब वह राजद के तत्कालीन एमपी शहाबुद्दीन के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद कर रहे थे.

नीति, पैसा हक़ और प्यार की चार कहानियों के माध्यम से उनहोंने “शहर किसका और कौन शहर का” के विषय पर अपनी बातें कही. उनहोंने एशियन गेम्स के दौरान दिल्ली में हुए विस्थापन की अपनी कहानी को साझा करते हुए बताया कि किस तरह से कई हज़ार लोगों को बर्बरता के साथ विस्थापित कर दिया गया. उनहोंने कहा कि हम शिद्दत के साथ लड़ने के बावजूद सड़क पर और न्यायालय दोनों जगह हार गए. उनहोंने कहा कि आज विस्थापन एक बड़ी समस्या है. सड़कों, फ्लाईओवरों, भवन निर्माण का नाम विकास रह गया है. शहर बनाने वाले लोग शहर विकास का हिस्सा नहीं बन पाते. उनहोंने कहा कि यही हमारी सरकारी नीति है.



नेहरु ने सबसे पहले शहर विकास का सपना देखा था और फिर उनहोंने एक शहर बनाई जिसे हम चंडीगढ़ के नाम से जानते हैं. उनके लिए भी शहर का विकास यही था. शहरों में बसी बस्तियां नागरिक सुविधाओं से जूझती रहती है. वहां उन्हें बुनियादी सुविधाएं नसीब नहीं होती. ग़रीब अपना हक जब मांगने सड़क पर आते हैं तो उन्हें मीडिया का भी सहयोग नहीं मिलता. उनहोंने कहा कि उसी दिल्ली में जहाँ मैं रहता हूँ कई बार विरोध हुए लेकिन ग़रीब जब अपने हक़ को लेकर सडक पर उतरे तो उन्हें न्याय नहीं मिला जबकि व्यापारी अपने हक को लेकर जब उतरे तो उनकी मांग पूरी की गयी.

कॉमन वेल्थ गेम के दौरान दिल्ली में हुए विस्थापन का ज़िक्र करते हुए गौतम ने कहा कि यह मेरी जिंदगी का पहला विस्थापन था जो मैंने देखा था. उस कॉमन वेल्थ गेम के लिए सरकार को स्टेडियम बनानी थी और उसके लिए रास्ता छोड़ना था जिसके लिए उन्हें बस्तियां उजाडनी थी. उनहोंने कहा कि सरकार ने उन बस्तियों में रहने वाले लोगों से ज़्यादा ज़रूरी समझा कि स्टेडियम के लिए रास्ता छोड़ा जाए. क्योंकि उनतक विकास की परिभाषा की परछाई भी नहीं पहुंची थी. उनहोंने कहा कि उस पहले विस्थापन के बाद मैंने 1990 और 2007 के बीच 216 विस्थापन को रिकॉर्ड किया. उन्होंने कहा कि अगर भारत की आधी आबादी के साथ बैठ कर पूछूं तो कोई नहीं बता सकता कि वह बस्तियां कौन सी थीं.

उनहोंने कहा कि हक कौन मांगता है यह बदल जाता है. जब विस्थापितों ने अपना हक माँगा तब कुछ नहीं हुआ. लेकिन जब व्यापारी अपने हक को लेकर धरने पर बैठे तब तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने मीडिया से बात की, सोनिया गाँधी ने मीडिया को अपना ब्यान दिया. मीडिया में पहले पन्ने पर उनकी खबर छपी. दोनों ही अपने हक मांग रहे थे बस हक मांग मांगने वाले अलग थे और सरकार के रवैये बदल गए.

उनहोंने कहा प्यार अजनबियों से मिलता है और अजनबी शहर में ही मिलते हैं. प्यार शहर की कहानी है. यह गाँव की कहानी नहीं. उनहोंने कहा कि 62 प्रतिशत जीडीपी आज शहर से आता है. लेकिन हम शहर को बसाने वालों को ही शहर से दरकिनार करते जाते हैं और उसका नाम विकास दे देते हैं.

गौतम ने समलैंगिकता की बात पर कहा कि समलैंगिक केवल समलैंगिक नहीं बल्कि वे दलित भी हैं. उनहोंने कहा कि मैं सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर समलैंगिक लोगों के हक की लड़ाई नहीं लड़ी बल्कि मैं खुद समलैंगिक हूँ और मैं अपनी बात करता हूँ. यह मेरा अधिकार है. मैं अपने यौन के तरीकों को चुनने के लिए स्वतंत्र हूँ.

उनहोंने कहा कि हाल के दिनों में दो घटनाएं हुईं. उन दो घटनाओं में से एक में ससुर ने अपने दामाद की हत्या करवा दी. वह इसलिए नहीं मारे गए क्योंकि वह समलैंगिक थे वह इसलिए मार दिए गए क्योंकि उन दोनों की जाति अलग थी. यह भयावह है. उनहोंने कहा आज हमें अपने पसंद का प्यार चुनने पर मार दिया जाता है. यह केवल समलैंगिकता की समस्या नहीं. उनहोंने कहा कि उन्हें एक आदमी भी ऐसा नहीं पता जो यह कह दे कि वह यौनिकता के मामले में आज़ाद है.

उनहोंने कहा कि शहर शहर वालों का है और यह उनका अधिकार है. वह जो भी हैं उन्हें वैसा बने रहने की स्वतंत्रता है यही शहर चाहता है और यही विकास की सही परिभाषा है.

व्याख्यान का सञ्चालन चंद्रशेखर के मित्र दिल्ली विश्विद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद और पटना उच्च न्यायालय के अधिवक्ता विनोद कुमार ने किया. लगातार बारिश होने के बावजूद सभागार भरा रहा और लोगों ने अंत तक खामोशी के साथ गौतम को सुना.

इस व्याख्यान में शहर के बुद्धिजीवी, विद्यार्थी और महिलाओं की बराबर की उपस्थिति रही. श्रोता ने लेक्चर के बाद कई प्रश्न भी किए. व्याख्यान का आयोजन कोशिश, अल-खैर और पटना इप्टा की जानिब से किया गया था.

Liked it? Take a second to support द मॉर्निंग क्रॉनिकल हिंदी टीम on Patreon!