शराबबंदी फेल होने की बात अफवाह है या हकीकत?




बिहार में 1 अप्रैल 2016 से शराब पर प्रतिबंध है लेकिन आंकड़े बताते हैं कि इसकी आपूर्ति में कमी नहीं आई (फ़ोटो साभार: सोशल मीडिया)

-मनीष शांडिल्य

2015 के विधानसभा चुनाव में जीत के बाद मुख्यमंत्री के रुप में नीतीश कुमार का सबसे महत्वाकांक्षी फैसला शराबबंदी का है जिसकी चर्चा वह शायद ही किसी भी उपयुक्त मंच से करने से चूकते हों. 26 नवंबर को आयोजित होने वाले नशा मुक्ति दिवस के मौके पर भी उन्होंने शराबबंदी के अपने फैसले के फायदे गिनाए. मगर इस मौके पर उन्होंने एक अहम बात यह भी कही कि शराबबंदी को फेल (असफल) होने की अफवाह उड़ाने वाले शराब माफिया और धंधेबाजों के एजेंट हैं.

नीतीश कुमार का यह बयान पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के उस बयान जैसा है जिसके आधार पर उन्होंने दुनिया को सीधे-सीधे दो खेमों में बांट दिया था. 2001 में अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमलों के बाद तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने आतंकवाद विरोधी अभियान की शुरुआत करते हुए कहा था, ‘‘हर देश में, हर क्षेत्र में, अब निर्णय लेने का समय आ गया है. या तो आप हमारे साथ हैं, या आतंकवादियों के साथ हैं.’’ यानी की आतंकवाद के खिलाफ अमरीकी लड़ाई के तौर-तरीकों से अगर आप सहमत नहीं है, अगर आपके पास इस गंभीर समस्या के निपटने के लिए कोई दूसरी सोच और तैयारी है तो आप न केवल अमरीका के विरोधी हुए बल्कि आतंकवाद के समर्थक भी.



जॉर्ज डब्ल्यू बुश की तरह ही नीतीश कुमार के बयान का साफ-साफ मतलब यह है कि शराबबंदी को असफल बताना, इसे सही तरीके से लागू किए जाने के लिए इसकी समालोचना करना न केवल शराबबंदी का विरोध करना है बल्कि यह इसके काले कारोबार में शामिल होना भी है.

जमीनी हकीकत

शराबंबदी लागू होने के ढाई बर्ष से ज्यादा समय बीतने के बाद इसकी सबसे बड़ी आलोचना यह सामने आ रही है कि गरीबों के नाम पर लिया गया यह फैसला दरअसल गरीब-विरोधी साबित हो रहा है. एक तरफ सरकारी आंकड़ों पर आधारित मीडिया रिपोर्ट्स से यह बात सामने आ रही है कि शराबबंदी के तहत गिरफ्तार हुए लोगों में गरीबों की असमान संख्या है तो दूसरी ओर विपक्ष भी ऐसे ही आरोप बार-बार लगा रहा है. बिहार में शराबबंदी कानून के तहत जिन्हें सबसे पहले सजा सुनाई गई वे जहानाबाद जिले में सूबे के सबसे कमजोर तबके मुसहर समाज से आने वाले दो गरीब थे.

इस ज़मीनी हालत के कारण ही इस साल 23 जुलाई को नीतीश कुमार द्वारा बिहार में पूर्ण शराबबंदी के लिए लागू कानून में संशोधन संबंधी विधेयक लाया गया. इस विधेयक को सदन में रखते हुए नीतीश कुमार ने यह माना था कि इस कानून का दुरुपयोग हो रहा है. सदन में उन्होंने कहा, ‘‘लोगों की प्रवृत्ति होती है कि अगर अधिकार मिलता है तो हम उसका दुरुपयोग करें. इसका इस्तेमाल धन कमाने में करते हैं. ऐसी स्थिति में सरकारी तंत्र में भी ऐसे लोग हो सकते हैं. और ऐसे लोग भी हो सकते हैं जो लोगों को परेशान करें.”

शराब की पहले जितनी ही खपत

लगभग हर दिन सूबे के कई हिस्सों से अवैध शराब पकडे जाने की खबर आती है. पडोसी राज्यों के साथ-साथ हरियाणा और पड़ोसी देश नेपाल से बिहार में शराब की भारी तस्करी हो रही है. शराब की भारी तस्करी का मतलब यह भी माना जा रहा है कि शराबबंदी से न केवल बिहार को बड़े राजस्व की हानि हुई है, बल्कि सूबे में शराब की खपत बदस्तूर जारी है.

राज्य सरकार इस तर्क के साथ शराबबंदी के फैसले को सही ठहराने की कोशिश करती रहती है कि इस बड़े राजस्व हानि के कारण होने वाला सामाजिक फायदा कहीं बड़ा है. शराब की खपत पर खर्च होने वाले पैसे को लोग अब खान-पान, इलाज, रहन-सहन जैसे जीवन को बेहतर बनाने वाले अन्य उद्देश्यों पर खर्च कर रहे हैं. ऐसे में तस्करी के जरिए शराब की भारी खपत से न केवल राजस्व का नुकसान ही हुआ है बल्कि प्रकारांतर से जीवन स्तर सुधारने वाले खर्च के सरकारी दावों पर भी सवाल खड़े होते हैं.

सरकार ने विकल्प नहीं दिया

वहीं ताड़ी और देसी शराब से ज्यादातर गरीब और पिछड़े वर्ग के लोग जुड़े हुए थे, जिनकी आमदनी और रोजगार का यही एकमात्र जरिया था. शहर से लेकर ग्रामीण स्तर तक हजारों लोग प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से देशी-विदेशी शराब के रोजगार से जुड़े हुए थे. लेकिन शराबबंदी को लागू करते समय सरकार शराब के पेशे से जुड़ी बड़ी आबादी के रोजगार और पुनर्वास से संबंधित पहलुओं पर पर्याप्त ध्यान देने में नाकाम रही. सरकार ने उन्हें रोजगार का बेहतर विकल्प दिए बिना ही उनकी आजीविका को नष्ट कर दिया. इस नजरिए से भी शराबबंदी का फैसला गरीब विरोधी लगता है और इस कारण भी इस पेशे से जुड़ी आबादी का एक हिस्सा, युवा और अन्य लोग आजीविका के लिए शराब के अवैध व्यापार में शामिल हो गए हैं.

बिहार सरकार ने ताड़ी से नीरा उत्पादन की अच्छी पहल की थी लेकिन उसका ताड़ी व्यवसायी को लाभ हुआ हो ऐसा कहना मुश्किल है

जरुरत बहुआयामी हस्तक्षेप की

बिहार में शराबबंदी की विफलता का सबसे बड़ा कारण है कि यह एक सरलीकृत नजरिए पर आधारित है जिसमें सभी पीनेवालों को अपराधी मान लिया गया. पियक्कड़ और पीनेवालों में फर्क नहीं किया गया और अपराध, हिंसा समेत सभी बुराइयों के लिए शराब सेवन को जिम्मेवार मान लिया गया. लेकिन यह समझने की जरूरत है कि शराबबंदी का एक मुख्य तरीका शराब की उपलब्धता कम करना रहा है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, शराब सेवन की बुराईयों से बचने के लिए आपूर्ति कम करने पर ध्यान केंद्रित किया जाता है. शराब पीने वालों को दंडित करना आम तौर पर पहली प्राथमिकता नहीं होती है. लेकिन सरकार ने न तो पहले ऐसा कुछ किया और न ही निकट भविष्य में उसका ऐसा कोई इरादा ही लगता है.



दूसरी तरफ बिहार सरकार ने ताड़ी से नीरा उत्पादन की अच्छी पहल की थी लेकिन ताड़ी के व्यवसाय से जुड़े पारंपरिक लोगों को शायद ही अब तक इससे कोई फायदा हुआ है. लेकिन सरकार ने अब रोजगार के विकल्प देने की दिशा में एक और पहल की है. ऐसी ही एक महत्वपूर्ण योजना है सतत जीविकोपार्जन योजना. सतत जीविकोपार्जन योजना राज्य सरकार द्वारा मुख्यतः देशी शराब एवं ताड़ी के उत्पादन एवं बिक्री में प्रारंभिक रूप से जुड़े अत्यंत निर्धन परिवार एवं अन्य अनुसूचित जाति, जनजाति तथा अन्य समुदाय के लक्षित अत्यंत निर्धन परिवार के लिए शुरू की गयी है. इस योजना के अंतर्गत जीविका समूह द्वारा चिन्हित प्रत्येक परिवार को जीविकोपार्जन के लिए परिसंपति खरीदने के लिए औसतन 60 हजार से 1 लाख तक सहयोग राशि उपलब्ध करायी जाएगी. इस राशि से दुधारू पशुओं के क्रय, बकरी एवं मुर्गी पालन, मधुमक्खी पालन, नीरा अथवा अगरबत्ती व्यवसाय एवं कृषि संबंधी अथवा अन्य गतिविधियां की जा सकती हैं. इस योजना को ईमानदारी से जमीन पर उतारे जाने की जरूरत है.

साथ ही समाज को शराबबंदी के लिए पूरी तरह तैयार करना और इसके लिए सतत अभियान चलाना सबसे बेहतर तरीका दिखाई देता है क्यूंकि बिहार ही नहीं दुनिया के किसी भी हिस्से में शराबबंदी इस कारण भी पूरी तरह सफल नहीं है क्यूंकि लोग और समाज तैयार नहीं है. साथ ही यह भी समझने की जरुरत है कि शराबबंदी एक समाज सुधार अभियान है कोई प्रशासनिक फैसला या राजनीतिक एजेंडा नहीं और सामाजिक सुधार केवल जागरूकता बढ़ाने के द्वारा किया जा सकता है, कानून के दवाब से नहीं.

बिहार सरकार ने शराबबंदी लागू करने के पहले जागरुकता बढ़ाने के लिए कई तरह की कोशिशें की थीं. बड़े पैमाने पर दीवार लेखन किया गया, नुक्कड़ नाटक, गीतों के जरिए संदेश दिया गया. एक करोड़ से ज्यादा लोगों से उनके घर में, अपने बच्चों के सामने शराब नहीं पीने के पक्ष में हस्ताक्षर करवाए गए. यहां तक कि पुलिस थाने से लेकर विधानमंडल तक में सदस्यों ने शराबबंदी के लिए शपथ ली. नशा मुक्ति दिवस पर भी नीतीश कुमार ने कहा कि आम लोगों को शराबबंदी की अच्छाई समझाने के लिए अभियान भी चलाएं. जरुरत इस बात की है कि नीतीश कुमार ने बीते दिनों जो कहा है उनकी सरकार शराबबंदी के लिए फिर से वैसा ही सामाजिक अभियान चलाने के लिए अपनी उर्जा और संसाधन लगाए.

इसके अलावा, सरकार को चाहिए कि सभी प्रखंडों में नशा विमुक्ति केंद्र की स्थापना करे ताकि शराब सेवन के आदी लोगों का पुनर्वास किया जाए. साथ ही यह भी जरूरी है कि सरकार इमानदारी से पुलिस-प्रशासन और शराब माफिया के नेटवर्क को ध्वस्त करे. उल्लेखनीय है कि बिहार में अक्सर ऐसे ही नेटवर्क राजनीतिक सत्ता की ताकत हुआ करते हैं. 26 नवंबर को नीतीश कुमार ने पूछा भी कि अवैध शराब की धर-पकड़ में केवल ड्राईवर या खलासी ही पकडे जा रहे हैं या कारोबारी और उनकी मदद करने वाले सरकारी अफसर भी?

(लेखक युवा पत्रकार हैं.)

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