फैज़ अहमद फैज़ की कविता “हम देखेंगे, हम भी देखेंगे” के कुछ शब्दों से है परहेज़ तो इस पैरोडी को अपने इंकलाबी सुरों में शामिल करें




फैज़ अहमद फैज़ की कविता ‘हम देखेंगे, हम भी देखेंगे’ इन दिनों सुर्ख़ियों में है. यह कविता 1979 में लिखी गयी थी और पहली बार 1981 में प्रकाशित हुई। फैज़ ने इस कविता को जनरल ज़िया उल हक़ के सैन्य शासन के विरोध में गरीब और मुहाजिर माने जाने वाले लोगों पर हो रहे अत्याचार और महिलाओं के साथ हो रहे भेदभाव के विरोध में लिखा था। तब पाकिस्तान की सरकार ने इस नज़्म को वामपन्थी नज़्म मानकर प्रतिबंधित कर दिया था। उसी समय पाकिस्तानी हुक्मरानों ने वहां की महिलाओं के साड़ी पहनने पर भी पाबंदी लगा दी थी। तब उस समय की मशहूर पाकिस्तानी गायिका इकबाल बानो ने लाहौर में 50 हजार लोगों की मौजूदगी में काली साड़ी और माथे पर बड़ी सी बिन्दी लगाकर यह कविता (जो की तब प्रतिबंधित थी) गाकर पाकिस्तानी सरकार का पुरजोर विरोध किया था।

फैज़ अहमद फैज़ का नाम उपमहाद्वीप के चंद प्रगतिशील शायरों में शुमार होता है। वो कम्युनिस्ट विचारधारा के थे और नास्तिक थे। यह उनकी पूरी कविता है।

हम देखेंगे

लाज़िम है कि हम भी देखेंगे

वो दिन कि जिस का वादा है

जो लौह-ए-अज़ल में लिख्खा है

जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिराँ

रूई की तरह उड़ जाएँगे

हम महकूमों के पाँव-तले

जब धरती धड़-धड़ धड़केगी

और अहल-ए-हकम के सर-ऊपर

जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी

जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से

सब बुत उठवाए जाएँगे

हम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरम

मसनद पे बिठाए जाएँगे

सब ताज उछाले जाएँगे

सब तख़्त गिराए जाएँगे

बस नाम रहेगा अल्लाह का

जो ग़ाएब भी है हाज़िर भी

जो मंज़र भी है नाज़िर भी

उट्ठेगा अनल-हक़ का नारा

जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

और राज करेगी ख़ल्क़-ए-ख़ुदा

जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

 

आज फिर से यह नज़्म सुर्ख़ियों में है. लेकिन अब इसमें शब्दों के चयन को लेकर विवाद चल रहा है. IIT कानपूर ने एक पैनल बनाई है जो यह तय करेगी कि यह नज़्म भारत विरोधी है या नहीं. हालाँकि इसमें भारत विरोधी कोई शब्द नहीं हैं अलबत्ता इसमें कुछ ऐसे शब्द हैं जिसे बहुत सारे लोगों को कहने में या सुनने में अच्छा न लगे. तो आइए इसी नज़्म पर तैयार पैरोडी को पढ़ें. उम्मीद है कि इस पर किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी।

हम देखेंगे

लाज़िम है कि हम भी देखेंगे

वो दिन कि जिस का वादा है

जो भारत के आइन में लिख्खा है

जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिराँ

रूई की तरह उड़ जाएँगे

हम महकूमों के पाँव-तले

जब धरती धड़-धड़ धड़केगी

और अहल-ए-हकम के सर-ऊपर

जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी

जब संसद के गलियारों में

इनका नामो निशाँ नहीं होगा

हम देश पर मिटने वालों को

फिर मसनद पे बिठाए जाएँगे

इनके ताज उछाले जाएँगे

इनके तख़्त गिराए जाएँगे

बस नाम रहेगा भारत का

जो कल भी था कल भी रहेगा

जो अंदर भी है बाहर भी

उट्ठेगा इंक़लाब का नारा

जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

और राज करेगे भारतवासी

जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

शब्दार्थ: कोह-ए-गिराँ: पहाड़

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