पुरखों की शहादत याद करने का भी दिन है पहली जनवरी




कोरेगांव, पुणे का भीमा कोरेगांव विजय स्तंभ

-मनीष शांडिल्य

तथ्यात्मक रूप से महारों और पेशवा फौजों के बीच हुए इस युद्ध को विदेशी आक्रांता अंग्रेजों के खिलाफ भारतीय शासकों के युद्ध के तौर पर भी देखा जाता है. कुछ इस घटना को देशद्रोह के नजरिये से भी देखते हैं. पर बड़ा सवाल यह भी कि आखिर महार अंग्रेजों के साथ मिलकर ब्राह्मण पेशवाओं के खिलाफ क्यों लड़े?

आज से फिर एक नया साल शुरु हो रहा है. इक्कीसवीं सदी बालिग होने वाले साल में कदम रख रही है. दुनिया भर में आज के दिन का उत्सव कई तरीकों से मनाया जाता है. भारतीयों के लिए आज उन पुरखों को याद करने का भी दिन है जो आज के ही दिन एक बेहतर कल के लिए शहीद हुए थे. आज की तारीख पर इतिहास में कम-से-कम दो ऐसी बड़ी और अहम घटनाएं दर्ज हैं जिन्हें भारतीयों को नए साल के स्वागत के साथ जरुर स्मरण करना चाहिए और अपने पुरखों के लिए यादों के दिए जलाने चाहिए.



पहली घटना आज से ठीक दो सौ साल पहले की है. तब ईस्ट इंडिया कम्पनी की सेना ने वर्तमान भारत के पश्चिमी हिस्से को अपने कब्जे में लेने के लिए 1818 में मराठा शासकों से पुणे के पास कोरेगांव में जंग लड़ी और जीती भी. तब भारत के उस हिस्से में कहने को तो शिवाजी के वंश मराठों का शासन था पर दरअसल हुकूमत पेशवाओं (चितपावन ब्राम्हणों) की चलती थी.

जब मुक्ति के लिए भारतीयों ने अंग्रेज़ों का साथ दिया

दिलचस्प यह कि अंग्रेज़ों की सेना में भारतीय लड़ाके भी शामिल थे. ऐसे में सवाल यह है कि वे भारतीय कौन थे, जिन्होंने ईस्ट इंडिया कम्पनी की सेना में शामिल होकर भारत को जीतने में अंग्रेजों की मदद की. ये भारत के अछूत थे. वे महार थे, और महार भी अछूत जाति है.

तथ्यात्मक रूप से महारों और पेशवा फौजों के बीच हुए इस युद्ध को विदेशी आक्रांता अंग्रेजों के खिलाफ भारतीय शासकों के युद्ध के तौर पर भी देखा जाता है. कुछ इस घटना को देशद्रोह के नजरिये से भी देखते हैं. पर बड़ा सवाल यह भी कि आखिर महार अंग्रेजों के साथ मिलकर ब्राह्मण पेशवाओं के खिलाफ क्यों लड़े?

दरअसल महारों के लिए ये अँग्रेजों की नहीं बल्कि अपनी गरिमा की लड़ाई थी. ये उनके लिए वर्ण-व्यवस्था से प्रतिशोध लेने का एक मौका था क्योंकि पेशवा शासकों ने महारों को जानवरों से भी निचले दर्जे में रखा था. बड़ी ही जिल्लत भरी जिन्दगी थी उस वक्त महारों की. दूसरी ओर अंग्रेज उन्हें एक इन्सान का दर्जा दे रहे थे और उन्हें सैनिक के रूप में स्वीकार कर रहे थे.

इतिहास में यह दर्ज है तब नगर में प्रवेश करते समय महारों को अपनी कमर में एक झाड़ू बाँध कर चलना होता था ताकि उनके ‘प्रदूषित और अपवित्र’ पैरों के निशान उनके पीछे घिसटते झाड़ू से मिटते चले जाएं. उन्हें अपने गले में एक बरतन भी लटकाना होता था ताकि वो उसमें थूक सकें और उनके थूक से कोई सवर्ण ‘प्रदूषित और अपवित्र’ न हो जाए. वो सवर्णों के कुएं या पोखर से पानी निकालने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे. चलते हुए एक खास प्रकार का आवाज भी उन्हें निकालनी पड़ती थी ताकि सवर्ण यह समझ जाएं की कोई अछूत आ रहा है और वे उनकी परछाई से दूर हो जाएं.

ऐसी व्यवस्था में रहने वाले महार ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की फौज में शामिल होकर लड़े तो वो वास्तव में चितपावन ब्राह्मण शासकों की क्रूर व्यवस्था के खिलाफ प्रतिशोध के लिए लड़ रहे थे. इस प्रतिशोध का जज्बा ऐसा कि हजार से भी कम महार लड़ाकों ने करीब पच्चीस हजार की पेशवा सेना को हरा दिया.



साल 1927 के 1 जनवरी को बाबासाहेब डा. आंबेडकर ने कोरेगांव जाकर युद्ध में शहीद महार सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित की थी. इसके बाद ये जगह दलितों के लिए एक तीर्थ बन चुका है. बाद में यहां पर एक स्मारक बनाया गया जिसमें महार रेजिमेंट के सैनिकों के नाम लिखे हैं. आज इस युद्ध के दो सौ साल मनाने के लिए जब 2018 के पहले दिन सैकड़ों दलित संगठनों से जुड़े हजारों-हजार लोग कोरेगांव में इकट्ठा हुए हैं तो वो ईस्ट इंडिया कंपनी की नहीं बल्कि भेदभाव पर आधारित ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ अछूतों की विजय का जश्न मना रहे हैं. वर्ण-व्यवस्था को आदर्श मानने वाले हिंदुत्ववादी विमर्श का प्रतिकार कर रहे हैं.

जब आजाद भारत में हुआ ‘जलियांवाला बाग कांड’

अलग झारखंड की मांग बहुत पुरानी है. भारत जब आजाद हआ तब आज का झारखंड बिहार का ही हिस्सा था लेकिन अलग झारखंड राज्य बनाने का आंदोलन तब भी चल रहा था. 25 दिसम्बर, 1947 को कोल्हान इलाके के चंद्रपुर जोजोडीह में नदी किनारे एक सभा आयोजित की गयी थी, जिसमें तय किया गया कि सिंहभूम को उड़ीसा राज्य में न रखा जाय बल्कि यह अलग झारखण्ड राज्य के रूप में ही रहे. दूसरी ओर सरायकेला-खरसावां के राजाओं ने उड़ीसा राज्य में शामिल करने की सहमति दे दी थी. जबकि झारखंड की अवाम स्वतंत्र राज्य के रूप में अपनी पहचान कायम करने के लिए गोलबंद हो रही थी. ऐसे में तय किया गया कि एक जनवरी को खरसवां के बाजार-ताड़ में सभा का आयोजन किया जाएगा.

एक जनवरी 1948 की सुबह इलाके के मुख्य सड़कों से जुलूस निकाला गया था. इसके बाद दोपहर दो से चार बजे तक सभा आयोजित हुई. सभा के बाद आदिवासी महासभा के नेताओं ने सभी को अपने-अपने घर जाने को कहा. सभी अपने-अपने घर की ओर चल दिये. उसी के आधे घंटे बाद बिना किसी चेतावनी के शुरू हुआ नृशंस गोलीकांड. बताया जाता है उड़ीसा पुलिस की ओर से आधे घंटे तक गोली चलती रही और गोली चलाने के लिए आधुनिक हथियारों का प्रयोग किया गया. इस गोलीकांड में दर्जनों आदिवासियों की जान चली गयी.

एक ओर जहां देश और दुनिया में नए साल के मौके पर जश्न मनाया जाता है तो दूसरी ओर खरसावां और कोल्हान के लोग आज भी अपने पूर्वजों की याद में एक जनवरी को काला दिवस और शोक दिवस के रूप में मनाते हैं. खरसांवा में बने शहीद पार्क में अपने पूर्वजों के स्मारक पर फूल चढ़ाते हैं.

क्यो जरूरी है इन्हें याद रखना

ये दोनों घटनाएं मानव गरिमा, अस्मिता और पहचान के संघर्ष से जुड़ी हैं. इन संघर्षों को याद रखा जाना इसलिए जरूरी है क्योंकि ये याद दिलाती हैं कि आज देश का वंचित तबका जिस मुकाम पर है, उन्हें जो सुविधाएं और सम्मान हासिल है उसे पाने के लिए उनके पुरखों ने अपना जीवन बलिदान किया है. देश में आज भी जिस तरह का भेदभाव और वंचितीकरण मौजूद है उसमें इन संघर्षों को याद करना वंचित तबके को अपनी राजनीति तय करने में निश्चित ही मदद करेगा.

(मनीष शांडिल्य युवा पत्रकार हैं.)

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