गुजरात के नतीजे साफ हैं कि लोकतंत्र संभल रहा है




छवि कांग्रेस की ओर से ट्वीट की गयी

-मनीष शांडिल्य

कल इस वक्त तक बहुचर्चित गुजरात विधानसभा चुनावों के नतीजे संभवतः साफ हो जांएगे. लेकिन सीटों के आंकड़ों से इतर गुजरात चुनावों का एक नतीजा पहले से ही साफ है कि भारतीय लोकतंत्र फिलाहल संभल रहा है. और यहां से लोकतंत्र फिर उस मुकाम की ओर आगे बढ़ सकता है जिसका इंतजार 15 अगस्त, 1947 के बाद अब तक है.

लोकतंत्र की सफलता या यह कहें कि लोकतंत्र के लोकतंत्र बने रहने में सत्ता पक्ष की जितनी भूमिका है उतनी ही विपक्ष की भी है. लेकिन भारत की हकीकत कुछ महीनों पहले तक कुछ और थी. केंद्र की सत्ता तक पहुंचाने के लिहाज से देश के सबसे अहम राज्य उत्तर प्रदेश और उसके बाद विपक्ष के लिए एक माॅडल की तरह उभरे बिहार में इस साल प्रत्यक्ष-परोक्ष रुप से भाजपा के सत्ता पर काबिज होने के बाद ऐसा लग रहा था कि मानो भारत के बहुत बड़े हस्से में विपक्ष लगभग गायब हो चुका है. जिन वादों के दम पर 2014 के मई में भाजपा केंद्र की सत्ता में आई थी उन्हें पूरे करना तो दूर उस राह पर आगे बढ़ने के किसी भी साफ संकेत की गैरमौजूदगी के बावजूद भाजपा या कहें कि नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता खासकर चुनावी लोकप्रियता को कोई बड़ी चुनौती नहीं मिल रही थी. जबकि रह-रह कर कई वारदातों-फैसलों से इसके साफ संकेत मिल रहे थे कि भारत का लोकतांत्रिक स्वरुप खतरे में है.

लेकिन इस साल सितंबर के आस-पास से अचानक से तस्वीर बदलने लगी. कांग्रेस गुजरात चुनाव में मजबूत विपक्ष के तौर पर नजर आने लगी. हालांकि दरअसल यह अचानक नहीं हुआ था क्यूंकि इसके पीछे करीब दो दशकों में जमा हुआ असंतोष और खासकर बीते करीब एक साल के दौरान समाने आईं सामाजिक-राजनीतिक हलचलें थीं. कांग्रेस तो बस चुनावों के दौरान इन सबको एक मंच देने वाली पार्टी के रुप में सामने आ रही थी. और जब गुजरात चुनाव का प्रचार खत्म हुआ तो राहुल गांधी मोदी को टक्कर देने वाले नेता बन चुके थे. और खास यह भी अपने एक अलग अंदाज और तेवर के साथ.

अब से कुछ ही महीने पहले तक कोई ये मानने को तैयार नहीं था कि राहुल कभी मोदी को चुनौती देने लायक बन भी सकते हैं और वो भी गुजरात में.

नीतीश कुमार या केजरीवाल से उम्मीद की जाती थी कि वे एकीकृत विपक्ष की कमान संभाल सकते हैं जबकि राहुल को इस लायक नहीं माना जाता था लेकिन राहुल ने इस धारणा को बदल डाला है. राहुल और उनके जरिए विपक्ष अब मुकाबले में है. ये गुजरात चुनाव के बहाने भारतीय लोकतंत्र को मिली एक बड़ी सौगात है.

चुनाव में हार-जीत लगी रहती है मगर डेमोक्रेसी और खास कर भारत में जिस हाल में अभी डेमोक्रेसी है उसमें मजबूत विपक्ष जरूरी है. और ऐसा अभी के हालात में अखिल भारतीय स्तर पर कांग्रेस ही यह भूमिका निभा सकती है. कांग्रेस मजबूत होगी तभी उसके आस-पास मजबूत विपक्षी गोलबंदी की संभावना है.

गुजरात चुनाव से राहुल के मुकाबले का नेता बनने के कारण ही लोकतंत्र नहीं संभला है बल्कि इस कारण भी कि इस चुनाव में युवाओं, किसानों, आम लोगों के असली मुद्दे, सामाजिक न्याय का मुद्दा चुनाव प्रचार के केंद्र में आया. विपक्ष भाजपा के विकास के दावों को इस कदर संदेह के घेरे में लाने में कामयाब रहा कि विकास की राजनीति का दावा करने वाली भाजपा चुनावी के अंतिम दौर में खुलेआम सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने में उतरकर गई.

हालांकि इस दौरान कांग्रेस की भी कुछ कमियां नजर आईं. जैसे कि उसने मुस्लिमों के मुद्दों की बात तक करना जरुरी नहीं समझा, वह साॅफ्ट हिंदुत्व की ओर बढ़ती दिखी लेकिन इन कमियों के बावजूद गुजरात चुनावों के जरिए विपक्ष का अपने पैरों पर खड़ा होना लोकतंत्र के लिए बड़ी उपलब्धि है.

(मनीष शांडिल्य युवा पत्रकार हैं.)

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2 Comments

  1. ऐसा वाकई है कि भारत में लोकतंत्र संभल रहा है तो ईस से अच्छी दुसरी कोई बात हो ही नहीं सकती। हम सभी सभ्य देश वासियों के लिए खुशी और इत्मीनान का मौका है। मगर यह लेख एक अनुमान है असल तो परिणाम आने के बाद ही पता चलेगा कि ऊंट किस करवट बैठा और देश की दिशा क्या होगी।

  2. लेखक शब्दावली में उलझा कर एक बड़े मुद्दे को चतुराई से दरकिनार कर गया। वो मुद्दा जिसके लिये आंबेडकर ताउम्र संघर्ष करते रहे और उनके अनुयायी आज तक उस मुद्दे पर गांधी के साथ जबरन कराये गये समझौते को वंचितों के साथ किया गया सबसे बड़ा धोखा मानते हैं।
    संख्यानुपाती भागीदारी के बगैर कोई भी लोकतांत्रिक व्यवस्था छलावा मात्र है।
    49 % वोट पाने वाली पार्टी को 49% सीटें ही मिलनी चाहिए ।

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