बिहार में आधी आबादी और हिंसा : एन.सी.आर.बी. के आंकड़े से




(फ़ाइल फ़ोटो)

रणविजय

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एन.सी.आर.बी.) ने वर्ष 2016 में हुए अपराध के आंकड़े जारी किया है. इस रिपोर्ट के आंकड़ों पर गौर करें तो बिहार दहेज़ हत्या के मामले में दूसरे स्थान पर है. पूरे देश में हुए 7621 मामलों में 987 मामले बिहार के हैं. इसी तरह वर्ष 2016 में भारत में घरेलू हिंसा के 437 केस दर्ज किये गए (ये सभी वे केस हैं जो घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005 के तहत दर्ज किये गए) जिनमें बिहार ने 171 केस के साथ प्रथम स्थान प्राप्त किया है.



एन.सी.आर.बी. द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक पति एवं रिश्तेदारों द्वारा अत्याचार के 3794 मामले दर हुए जबकि दहेज़ निषेध अधिनियम 1961 के अन्तर्गत 1058 केस दर्ज हुए. ये वे सभी मामले हैं जो घर के दहलीज पर या घर के आँगन में हुए और अपनों ने किये हैं. इस रिपोर्ट में और भी चिंतनीय तस्वीर है जो बिहार में सजग नागरिकों, बुद्धिजीवियों, सामाजिक परिस्थितियों से सरोकार रखने वाले राजनेताओं, समाजकर्मियों एवं नीति निर्माताओं के पेशानी पर बल डालने के लिए काफी है, ये अलग बात है कि ये सवाल मुख्यधारा के मीडिया ने नहीं उठाया.

सनद रहे कि वर्ष 2016 में महिलाओं के प्रति हिंसा के 13400 मामले दर्ज किये गए जिसमे अगवा करने एवं जबरदस्ती उठा ले जाने के 5496 मामले दर्ज हुए. सबसे चिंताजनक बात यह है कि  पूरे देश में अगवा करने के बाद महिलाओं के हत्या के 112 मामले आये जिसमे 50 मामले अकेले बिहार के हैं. मानव तस्करी के 9 मामले दर्ज हुए हैं जबकि इसे रोकने हेतु बने अनैतिक व्यापर अधिनियम 1961 के अन्तर्गत देश में 2214 मामले दर्ज हुए जिसमे 50 बिहार के हैं.

ये सभी आंकड़े सिर्फ दर्ज मामलों के हैं जबकि महिलाओं के प्रति होने वाले हिंसा के अधिकांश मामले दर्ज हीं नहीं होते. जिस समाज में पुरुषों की पगड़ी कपड़े की न होकर औरतों की चमड़ी का बना हो वहां इतने केसों का आना संवेदनशील लोगों के समक्ष इसकी भयावहता पेश करने के लिए काफी है. खैर जब महिलाओं के प्रति होने वाले हिंसा की बात हो रही है तो यह बिना बलात्कार पर चर्चा के पूरी नहीं हो सकती क्योंकि औरत को प्रदर्शन, भोग, गुलाम और बच्चा पैदा करने की मशीन समझने वाले समाज में कुंठित और बीमार मर्दों का सबसे बड़ा हथियार है यह.

एन.सी.आर.बी. द्वारा जारी वर्ष 2016 के आंकड़े के अनुसार बिहार में बलात्कार के 1008 मामले दर्ज हुए हैं जिसमे 8  मामले सामूहिक बलात्कार के हैं. बताते चलें कि ये वो मामले हैं जो पुलिस के समक्ष आये अन्यथा ज्यादातर मामले तो इज्जत के चादर के अन्दर दबा दिए जाते हैं. और क्यों न दबा दिए जाएँ खासकर तब जब पुलिस सामूहिक बलात्कार का मामला दर्ज होते ही बिना जाँच किये मीडिया में आकर बयान दे देती हो कि ये प्रेम प्रसंग का मामला है. मतलब बिहार की पुलिस यह कहती है कि जब कोई प्रेम करता है तो वह उस लड़की को लेकर कहीं जाता है और अपने दोस्तों को कहता है आओ इसका बलात्कार करो मै इससे प्रेम करता हूँ.

जब बात बलात्कार के आंकड़ों की हो रही है जो कि मर्दों का या ये कहें कि पशुमानवों का औरतों के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार है तो इसके अन्य पहलुओं पर बात करना आवश्यक है. एन.सी.आर.बी. द्वारा बलात्कार सम्बन्धी जारी आंकड़ों पर गौर करें तो 1008 में से 987 मामलों में पीडिता के जानने वालों ने ही दुष्कर्म किया. 380 मामलों में बलात्कारी पड़ोसी था अर्थात महिलाओं और लड़कियों के लिए न घर का आँगन सुरक्षित है और न ही दहलीज फिर सड़क की बात ही बेमानी है. बलात्कार के दर्ज 7 मामलों में पीड़िता की उम्र 6 से 12 वर्ष के बीच थी जबकि 41 की उम्र 12 से 16 वर्ष के बीच. एक वर्ष में 169 बलात्कार के मामले दर्ज हुए जिसमे पीड़िता की उम्र 18 वर्ष से कम थी.

पूरे देश में नियोक्ता या सहकर्मी द्वारा बलात्कार के 600 मामले दर्ज हुए उसमे 53 मामले अकेले बिहार के हैं. प्रश्न यह है कि क्या यह महिलाओं को वापस चहारदीवारी के अन्दर धकेलने की कोशिश है? एन.सी.आर.बी. द्वारा जारी किये गए आकड़े महिलाओं के प्रति हिंसा का राज्य में एक डरावनी तस्वीर पेश करता है. आधी आबादी, राज और समाज दोनो से प्रश्न करती है कि हम कहाँ जाये?

(रणविजय सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं)
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