हेमंत कुमार शाह: आरएसएस का दुलारा क्यों बना मोदी का घोर आलोचक




हेमंत कुमार शाह (फ़ोटो साभार: इंडियन एक्सप्रेस)

हेमंतकुमार शाह (60) जो अहमदाबाद के एचके आर्ट्स कॉलेज के इन-चार्ज प्राध्यापक हैं ने जिग्नेश मेवानी को कॉलेज प्रशासन द्वारा के कार्यक्रम के लिए अपनी जगह न देने के विरोध में इस्तीफ़ा दे दिया. गुजरात विधान सभा के स्वतंत्र विधायक और दलित नेता यहाँ होने वाले एक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि थे. हेमंतकुमार शाह मात्र दस साल पहले आरएसएस की एक सहयोगी संगठन स्वदेशी जागरण मंच (Swadeshi Jagran Manch) के राष्ट्रीय कार्यकारी सदस्य थे.

हेमंतकुमार शाह का परिचय

शाह राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर हैं और जय प्रकाश नारायण के छात्रालय संघर्ष वाहिनी से जुड़े हुए थे. उनहोंने बतौर पत्रकार भी काम किया था. दस साल पहले वह आरएसएस की एक सहयोगी संगठन स्वदेशी जागरण मंच (Swadeshi Jagran Manch) के राष्ट्रीय कार्यकारी सदस्य थे. इस्तीफ़ा देने से पहले वह अहमदाबाद के एचके आर्ट्स कॉलेज के इन-चार्ज प्राध्यापक थे.

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, उनहोंने एसजेएम की बैठकों में 2008 से ही जाना बंद कर दिया था. शाह कहते हैं कि वह मुख्य समूह के सदस्य थे और आरएसएस के दुलारे थे. उनका कहना है कि आरएसएस का दुलार उनके लिए इसलिए था क्योंकि वह उदारीकरण, वैश्वीकरण और निजीकरण का विरोध कर रहे थे.

आरएसएस से विमुख होने का कारण

आरएसएस से विमुख होने का कारण बताते हुए वह कहते हैं कि आरएसएस पक्षपाती थी और केवल यूपीए के प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह और उनकी नीतियों की ही आलोचना करती थी लेकिन वसुंधरा राजे सिंधिया, नरेंद्र मोदी और शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ चुप रहती थी. जब मैंने 2002-2003 में मोदी के तानाशाही के खिलाफ खुल कर बोलना शुरू किया तो मेरी सोच उनके लिए समस्या बन गयी.

शाह 2001 की उस घटना को याद करते हैं जब उनहोंने अहमदाबाद के एक स्थानीय गुजराती अखबार में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली गुजरात सरकार के पंचायत के लिए समरस योजना की आलोचना की थी.

वह कहते हैं कि जिस सुबह वह आलेख मेरा प्रकाशित हुआ उसी दिन संपादक का फ़ोन आया और मुझे मोदी विरोधी आलेख लिखने से मना कर दिया.

उनके करीबी दोस्तों का कहना है कि 2002 के गुजरात दंगे ने इस शिक्षाविद का मन बदल दिया. शाह के एक सहयोगी कहते हैं, “एक शुद्ध गांधीवादी होने के नाते, 2002 के दंगों से निपटने के तरीके से वह आहत थे।”

शाह के पास इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स ऑफ़ इंडिया में पत्रकारिता करने के साथ ही 14 वर्ष का अनुभव है और इसी दौरान उनहोंने 55 किताबें लिखा. उनकी किताब ‘सच्चाई गुजरात की’ तत्कालीन मुख्य मंत्री नरेंद्र मोदी वाले गुजरात के विकास मॉडल की आलोचना में लिखा गया था जिसका विमोचन 2014 के लोक सभा चुनावों से पहले किया गया था जोकि उनकी सबसे अधिक बिकने वाली पुस्तकों में से है.

उनके गुजरात सरकार के किसानों के नहर परियोजना सुजलम सुफलाम योजना पर विचार आलोचना वाले रहे और आदिवासियों और किसानों के भूमि अधिकारों पर वे मुखर रहे।

अतीत में, वह उपभोक्ता संरक्षण को मजबूत करने के उद्देश्य से कई आंदोलनों से जुड़े रहे। 35 वर्षों तक, वह उपभोक्ता संरक्षण परिषद, अहमदाबाद के सदस्य थे।

शाह गुजरात विद्यापीठ के कुलपति पद के लिए तीन प्रत्याशियों में प्रबल दावेदार माना गया था, जिसके लिए अंततः प्रो अनामिक शाह को नियुक्त किया गया।

चार महीने पहले एच के आर्ट्स कॉलेज के प्रभारी प्राचार्य के रूप में उनके चयन ने सरकार के बारे में आलोचक विचारों के बावजूद कई लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया। शाह कहते हैं कि उन्हें कॉलेज के “तटस्थ” ट्रस्टियों के कारण जिम्मेदारी दी गई थी।

आरोपों पर कि उनका इस्तीफा एक पब्लिसिटी स्टंट था क्योंकि वह केवल एक प्रिंसिपल इंचार्ज थे और उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं था, शाह कहते हैं, “मैं पहले से ही एक सार्वजनिक हस्ती हूं। एक चैनल, स्थानीय, राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय का नाम बता दें जहां मैंने एक विशेषज्ञ और पैनलिस्ट के रूप में बात नहीं की हो। मैं कोई राजनीतिक शक्ति नहीं मांग रहा हूं। तो यह कैसे कोई प्रचार या राजनीतिक नौटंकी है?”

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