बिहार के विकास का सच। तेज़ विकास दर के लिए सत्ता की भागीदारी नहीं सत्ता की ईमानदारी ज़रूरी




बिहार विधान सभा में विश्वास प्रस्ताव के दौरान नीतीश और मोदी साथ साथ

मुख्य मंत्री और उप-मुख्य मंत्री बनने के बाद नीतीश कुमार और सुशील कुमार मोदी ने बारी बारी से यह दावा किया कि बिहार तेज़ी से विकास की ओर अग्रसर होगा और उन्होंने बताया कि ऐसा इसलिए होगा क्योंकि पहली बार 1990 के बाद 27 सालों में ऐसी परिस्थिति बनी है जब एक ही पार्टी या गठबंधन की सरकार केंद्र और राज्य दोनों में है।

लेकिन ऐसा नहीं है। 15 साल के लालू-राबड़ी राज में लगभग चार वर्षों (ठीक ठीक 46 महीने) तक,  पांच प्रधान मंत्री हुए जो लगभग राज्य सरकार की पार्टी या गठबंधन से ही थे। ये प्रधान मन्त्री वी पी सिंह, चंद्रशेखर (चंद्रशेखर को तब कांग्रेस का साथ हासिल था), एच. डी. देवेगोड़ा, आई के गुजराल और मनमोहन सिंह थे। 1999 और 2005 तक 10 महीना राज्य में राष्ट्रपति शासन भी रहा।

असल में, गुजराल तो बिहार से ही राज्य सभा के सदस्य भी थे। जो यहाँ अधिक महत्वपूर्ण है और ध्यान देने के लायक़ है वह यह कि अगर विकास का पैमाना केवल राज्य और केंद्र दोनों में एक ही दल का सत्ता का होना ही मान लिया जाए तो – वित्तीय वर्ष 2004-2005 और 2013-2014 के बीच में बिहार का उस समय का जीडीपी विकास दर सबसे तेज़ था। औसत रूप से, इस दौर में प्रति वर्ष 11 प्रतिशत जीडीपी विकास की दर दर्ज की गयी थी। एक समय में तो, यह आंकड़ा 16 प्रतिशत तक गया।

मीडिया अक्सर इस बात को नज़र अंदाज़ करती है कि यह सब तेज़ विकास दर नवम्बर 24, 2005 को नीतीश के सरकार बनाने से 20 महीने पहले ही शुरू हो गया था।

10 साल में से साढ़े आठ वर्ष में, केंद्र और राज्य में अलग अलग पार्टियों की सरकारें रहीं. लेकिन बिहार ने इससे बेहतर प्रदर्शन कभी नहीं किया था. लेकिन किसी भी क्षेत्र या राज्य के विकास दर का क्रेडिट राज्य सरकार को अकेले नहीं दिया जा सकता, जैसा नीतीश और मीडिया हमेशा दावा करते हैं. मनमोहन सिंह सरकार की दरिया दिली, बैकवर्ड रीजन ग्रांट फण्ड (बी जी आर एफ़) से बिहार को प्राप्त राशि, और रेलवे और ग्रामीण विकास में लालू प्रसाद यादव की वजह से लाए गए बड़े पैमाने पर प्रोजेक्ट और रघुवंश प्रसाद सिंह जिनके जिम्मे ग्रामीण विकास मंत्रालय था के कारण बिहार में विकास की रफ़्तार बढ़ी। इसमें कोई शक नहीं कि नीतीश कुमार और राम विलास पासवान ने भी रेलवे, पॉवर और टेलीकम्यूनिकेशन सेक्टर में कई प्रोजेक्ट लाया जब वे पिछली सरकारों में मंत्री थे.

इसके विपरीत, 1960 के दशक के अंत में कुछ साल को छोड़ कर बिहार का 1964 से 1990 तक 26 साल बहुत खराब प्रदर्शन रहा जबकि इस दौर में केंद्र और बिहार की सरकारें एक ही दल की थीं.

इस में कोई शक नहीं कि यदि राज्य की सरकार और केंद्र की सरकार या गठबन्धन अलग अलग हो तो केंद्र का राज्य के साथ सौतेला व्यवहार होता है. उदाहरण के तौर पर, 2000 में, झारखण्ड जब बना तब बिहार विधान मंडल ने पूर्ण सहमती के साथ एक प्रस्ताव पारित किया था जिसमें मुआवज़ा के तौर पर 1.79 लाख करोड़ की मांग की गयी थी. हालंकि, भाजपा और जद (यू) दोनों के विधायकों ने इस रेज़ोलुशन का समर्थन किया था, फिर भी वाजपेयी सरकार ने उस पैकेज की मांग को कभी भी पूरा नहीं किया जबकि वाजपेयी सरकार में नीतीश और दुसरे मंत्री भी शामिल थे.

इसी तरह, प्रधान मंत्री मोदी ने 2015 के विधान सभा के चुनावी मुहीम के दौरान 1.25 लाख करोड़ का पैकेज बिहार को देने का पूरी चुनावी सभा के सामने वादा किया था. 20 महीने बाद तक, एक पैसा भी नहीं आया.

अब अगर वह स्पेशल पैकेज आता है तो इससे यह पक्का हो जाएगा कि इस तरह के काम के पीछे राजनैतिक चाल होती है.

स्पेशल इकॉनोमिक पैकेज के लिए कोई भी संवैधानिक संशोधन ज़रूरी नहीं होता जैसा कि नीतीश कुमार बार बार स्पेशल केटेगरी स्टेटस की मांग को लेकर कह रहे थे.

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि आज़ादी के बाद खनिज समृद्ध पूर्वी भारत में औद्योगीकरण की धीमी रफ़्तार की वजह केंद्र की माल भाड़ा को बराबर करने की नीति थी.

चूँकि जिन राज्यों में खनिज नहीं थे उनको खनिज की सब्सिडी दी गयी, इसलिए उद्योग उन्हीं पश्चिमी, दक्षिणी और उत्तरी भारत में पनपा जहाँ या तो खनिज नहीं था या जो बन्दरगाह के क़रीब थे.

1990 के दशक के शुरू में लालू प्रसाद और पूर्वी राज्यों के अन्य गैर कांग्रेसी नेताओं पर छोड़ दिया गया कि वह केंद्र की माल भाड़ा की बराबरी की नीति को समाप्त करने के लिए लड़ें.

केंद्र और पूर्वी राज्यों में एक ही दल की अगर सरकार कुछ और वर्षों तक रहती तो स्थिति अब तक नहीं बदलती. यह बदलाव केवल इसलिए आया क्योंकि केंद्र और राज्य की सरकारें दो अलग अलग दलों के हाथ में थी.

अगर नीतीश कुमार और सुशिल मोदी की बातों पर यक़ीन कर लिया जाए तो गुजरात को बिलकुल विकास नहीं करना चाहिए था क्योंकि गुजरात में नरेंद्र मोदी के अधिकतम कार्यकाल में केंद्र की सत्ता पर कांग्रेस काबिज़ थी. हकीकत यह है कि, गुजरात अब केवल गलत कारणों से खबर में है – विकास की तो अब चर्चा ही नहीं है – जब राज्य और केंद्र दोनों की ही सत्ता एक ही पार्टी के पास है. पिछले वर्षों की केंद्र सरकार पर सौतेला व्यवहार का तमगा लगाया जा सकता है लेकिन यह तमगा मनमोहन सिंह की सरकार पर न बिहार और न ही गुजरात लगा सकता है. लेकिन, यह दावा कि बिहार अब तेज़ी से विकास करेगा इसलिए कि भाजपा केंद्र और राज्य दोनों में सत्ता में है नीतीश कुमार का महज़ जुमला है और कुछ भी नहीं है.

नीतीश कुमार को एक बात याद यहाँ दिलाना ज़रूरी है कि मुख्य मंत्री के तौर पर उनके कार्यकाल के शुरूआती साल में बिहार का विकास दर औसत 11 प्रतिशत था जबकि पड़ोसी राज्य झारखण्ड जहाँ सरकारें हर वर्ष लगभग बदलती रही और जहाँ भाजपा सत्ता में थी का विकास दर भी 8 से 10 प्रतिशत था.

यही हाल उत्तर प्रदेश का भी था.

राष्ट्रीय स्तर पर भी उस समय विकास दर बहुत अधिक था. अब, नोट बंदी के बाद के महीनों में जब विकास दर में काफी गिरावट देखा गया है 16 प्रतिशत विकास दर का पिछला आंकड़ा पार करना बहुत ही चुनौती भरा है.

यहाँ यह भी ध्यान देने का है कि नीतीश के पहले कार्यकाल के अच्छे दिनों में भी, औद्योगिक और कृषि क्षेत्र में कोई बड़ी उछाल नहीं देखा गयी थी और शराबबंदी से पहले के बिहार में एक्साइज ड्यूटी ही राजस्व का मुख्य स्रोत था.
 

सुरूर अहमद ने यह आलेख मूलतः अंग्रेज़ी में nationalheraldindia.com के लिए लिखा था जिसका अनुवाद द मॉर्निंग क्रॉनिकल हिंदी टीम ने किया है.

 

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