कैसे मनती है हज़रत निजामुद्दीन दरगाह की दिवाली?




मोहम्मद मनसूर आलम

पौराणिक कथाओं के अनुसार दिवाली श्री राम के 14 बरस के बाद वनवास से अयोध्या लौटने पर जश्न की रात है. इस रात पूरे देश में दीप जलाकर अधिकतर हिन्दू अपने अराध्य श्री राम को वन से घर तक दीप जला कर उनका मार्ग रौशन करते हैं. यह रात हिन्दू धर्म के अनुसार धन की देवी माँ लक्ष्मी की पूजा अर्चना की भी रात है.

लेकिन क्या आपको पता है कि इस रात केवल ऐसा देश के हिन्दू नहीं करते बल्कि दिवाली मनाना इस देश को गंगा-जमनी तहज़ीब देने वाले मुग़ल की भी परंपरा रही है. जी हाँ. और इस परंपरा का प्रमाण दिल्ली के सूफी संत हज़रत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर हर वर्ष दिवाली की रात दीप का रौशन किया जाना है.

इस रात हज़रत निज़ामुदीन औलिया की दरगाह पर श्रद्धालु आकर दीप जलाने का ख़ास इंतजाम करते हैं. पूरा दरगाह रौशन रहता है.

हज़रत निज़ामुद्दीन चिश्ती घराने के चौथे संत थे। इनका जन्म 1238 में उत्तरप्रदेश के बदायूँ जिले में हुआ था। हज़रत निज़ामुद्दीन पाँच वर्ष की उम्र में अपने पिता, अहमद बदायनी, की मॄत्यु के बाद अपनी अम्मी बीबी ज़ुलेखा के साथ दिल्ली आ गए। इनकी जीवनी का उल्लेख अबुल फज़ल के आइन-ए-अकबरी में मौजूद है. जो कि मुगल सम्राट अकबर के नवरत्न मंत्रियों में से थे.

गंगा जमनी तहज़ीब के प्रणेता अमीर खुसरो, हज़रत निजामुद्दीन के सबसे प्रसिद्ध शिष्य थे. अमीर खुसरो को प्रथम उर्दू शायर तथा उत्तर भारत में प्रचलित शास्त्रीय संगीत की एक विधा ख्याल के जनक के रूप में जाना जाता है। खुसरो का लाल पत्थर से बना मकबरा उनके हजरत निजामुद्दीन के मकबरे के पास ही स्थित है।

बसंत और खुसरो दरिया प्रेम का जैसे भारत की गंगा-जमनी तहजीब पर फिल्म बनाने वाले फिल्म मेकर और लेखक युसूफ सईद कहते हैं कि चिरागां सूफी मजारों पर सदियों से आ रही परंपरा है. और चिश्ती सिलसिले की सभी दरगाहों में यह प्रचलित है.

उनहोंने कहा कि न सिर्फ दिवाली बल्कि बसंत पंचमी का भी भव्य आयोजन चिश्ती सिलसिले की दरगाहों पर प्रचलित परम्परा है. सईद की हज़रत निजामुद्दीन की दरगाह पर मनाई जाने वाली बसंत पर बसंत नाम से ही एक डाक्यूमेंट्री है जिसे आप यहाँ देख सकते हैं.

कई मुस्लिम शायरों ने भी अपनी शायरी में दिवाली का ज़िक्र किया है. जैसे शायर अज़म शाकरी का यह शेर

आज की रात दिवाली है दिए रौशन हैं

आज की रात ये लगता है मैं सो सकता हूँ

इसी तरह नजीर अकबराबादी की कविता दिवाली का यह शेर

हर इक मकाँ में जला फिर दिया दिवाली का

हर इक तरफ़ को उजाला हुआ दिवाली का

तो दिवाली के दीए देखकर हफ़ीज़ बनारसी का यह शेर पढ़िए और मज़े लीजिए और फ़ख्र कीजिए कि आप हिन्दुस्तानी हैं:

सभी के दीप सुंदर हैं हमारे क्या तुम्हारे क्या

उजाला हर तरफ़ है इस किनारे उस किनारे क्या

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