इफ़्तार की सियासत अच्छी सियासत है




-समीर भारती

गोदी मीडिया की पहचान दुनिया के सभी अच्छे कामों में मीन मेख निकालने तक ही रह गयी है. सब में इन्हें गंदी सियासत नज़र आती है ख़ास कर जब सौहाद्र अल्पसंख्यकों की गतिविधि से जुड़ा हो. मैं यह नहीं कहता कि ऐसे आयोजनों में सियासत नहीं होती लेकिन किसी इंसान को सरेआम मार कर जो सियासत होती है, रमज़ान में नमाजियों को नमाज़ पढने से रोकने के लिए डंडों और तलवारों की भीड़ द्वारा डराए जाने की सियासत जो होती है, झारखंड में भाजपा की महिला नेता के अज़ान को बंद कराने की सियासत जो होती है उससे यह बेहतर सियासत है.



इस सियासत में लोगों की भूख मिटती है, लोगों की प्यास बुझती है, लोगों में प्रेम बढ़ता है, लोगों के दिल से देशवासियों के लिए दुआ निकलती है, समाजी समीकरण मज़बूत होता है. उदाहरण के लिए, अभी हाल ही में हरियाणा के गुडगाँव में इफ़्तार पार्टी का आयोजन किया गया. यह आयोजन अपने आप में ऐतिहासिक है क्योंकि दो संप्रदायों के बीच ऐसे इफ़्तार का आयोजन शायद पहली बार हुआ था. जब से भाजपा की खट्टर सरकार आई है यहाँ कभी देग की बिरयानी उठाई जा रही थी, कभी किसी को गाय के मांस के नाम पर मारा जा रहा था, याद रहे जुनैद को भी हरियाणा में ही मार दिया गया था जब वह कमसीन छोरा ईद की दुकानदारी करके लौट रहा था. हाल ही में वहां जुमा के कुछ नमाजियों को भगवा जैसे सुंदर रंग में बदसूरत लोगों की भीड़ ने डराया धमकाया और नमाज़ पढने नहीं दिया. जुमा की उस नमाज़ में पढने वालों की संख्या ज़्यादातर उनकी थी जो मजदूर तबके से संबंध रखते थे और केवल जुमा के नमाज़ी थे. अभी कुछ दिनों पहले हरियाणा की एक मस्जिद के अंदर घुस कर भी भगवाधारी असामाजिक तत्वों ने उत्पात मचाई. इन परिस्थितियों में गुडगाँव में इफ़्तार का आयोजन इन्सानों को खुश करने वाला है. इसमें सियासत की तरफ से ज्यादा भीड़ भाड़ न होकर समाज से जुड़े आम और कुछ ख़ास लोग थे जिन्हें मोदी का खोखला न्यू इंडिया नहीं गांधी के सपनों का मज़बूत भारत चाहिए. इस आयोजन की ख़ास बात यह रही कि इस इफ़्तार में अंकित सक्सेना के पिता यशपाल सक्सेना भी मौजूद थे जिन्हें वहां इफ़्तार में मौजूद हर किसी ने खड़े होकर तालियों से इज़्ज़त बख्शी. अंकित सक्सेना की याद में अभी यशपाल सक्सेना ने अपने मुस्लिम पड़ोसियों के साथ इफ़्तार का आयोजन किया था. अंकित सक्सेना कथित तौर पर एक मुस्लिम लड़की से प्यार करते थे और जिसकी वजह से उनकी हत्या कर दी गयी. इसको भी लव जिहाद के नाम पर ही एक मौत में शामिल कर लेना चाहिए.

अंकित सक्सेना के पिता द्वारा आयोजित इफ़्तार

जहाँ इस महंगाई में मुंह से रोटियां छिनी जा रही है वहां अगर इफ़्तार में आम लोगों को महीने में कई बार छप्पन भोग परोस कर किसी तरह की सियासत की भी जा रही है तो वह किसी भी सियासत से बेहतर है और ऐसी सियासत होली, दिवाली, दशहरा, बक़रीद, ईद, गुरुपर्व और क्रिसमस पर भी होनी चाहिए ताकि भूखों का पेट भी भरे और दिल भी मिले.

आज तक द्वारा एक प्रोग्राम की तस्वीर

मैं ऐसा इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि अब गोदी मीडिया में इसे सयासी रंग दिया जा रहा है. आज तक की अंजना द्वारा संचालित इस प्रोग्राम की तस्वीर ही देख लीजिए. यह तस्वीर अपने आप में एक सियासत कर रही है. चित्र में कैप्शन “फिर इफ्तार की सियासत याद आई” के ठीक ऊपर राहुल गांधी की ही तस्वीर क्यों? इसमें आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की तस्वीर भी हो सकती थी, इसमें सैकड़ों भाजपा ने नेताओं में से किसी की तस्वीर हो सकती थी जिन्होंने कहीं न कहीं इफ़्तार का आयोजन किया. यह एक पार्टी के ख़िलाफ़ गंदी सियासत है.

मेरे एक दोस्त ने कभी कहा था कि मीडिया में जितना सियासत है उतनी सियासत खुद सियासत में भी नहीं है. ऐसा उनहोंने मीडिया के अंदर की सियासत को देख कर कहा था. आम जनता को मीडिया की सियासत समझनी चाहिए और उन्हें हर अच्छी सियासत का हिस्सा बनने के लिए तैयार रहनी चाहिए.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं. ये इनके अपने विचार हैं.)

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