विपक्ष ने दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव उपराष्ट्रपति को सौंपा




प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा
यह प्रस्ताव लोया मामले पर फैसले से प्रेरित नहीं है। महाभियोग केवल किसी दुर्व्यवहार के कुछ आधार पर लगाया जा सकता है, न कि प्रधान न्यायाधीश के किसी निर्णय के आधार पर, चाहे वह सही हो या गलत। महाभियोग संवैधानिक आधार पर है: कपिल सिब्बल

नई दिल्ली, 20 अप्रैल,2018 (टीएमसी हिंदी डेस्क)| कांग्रेस की अगुवाई में सात विपक्षी दलों के 64 सदस्यों ने प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा को पद हटाने के लिए शुक्रवार को ‘दुर्व्यवहार’ के पांच आधार पेश करते हुए उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू को सौंपा। राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा, “हमने राज्यसभा के सभापति नायडू से उनके आवास पर मुलाकात की। हमने पांच सूचीबद्ध आधारों के तहत प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा को हटाने के लिए एक महाभियोग प्रस्ताव सौंपा है। हमने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(4) के अनुच्छेद 217 के अंतर्गत उन्हें पद से हटाने की मांग की है।”



विपक्षी पार्टियों ने यह कदम सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गुरुवार को दिए उस फैसले के एक दिन बाद उठाया है, जिसमें न्यायालय ने सीबीआई के विशेष न्यायाधीश बी.एच.लोया की मौत की जांच एसआईटी से करवाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। लोया सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले की सुनवाई कर रहे थे, जिसके एक आरोपी अमित शाह थे। विपक्ष का कहना है कि जब जांच होगी, तभी पता चलेगा कि लोया की मौत किन परिस्थितियों में हुई। जांच की मांग ही खारिज कर दिया जाना और संदेह उत्पन्न करता है।

प्रस्ताव पेश किए जाने के समय के बावत पूछे जाने पर आजाद ने कहा, “हमने एक सप्ताह पहले ही नायडू से मुलाकात करने का समय मांगा था, लेकिन हमें बताया गया था कि वह पूर्वोत्तर की यात्रा पर हैं। अगर वह उस समय उपलब्ध होते, तो हम उन्हें तभी ही यह प्रस्ताव सौंप देते।”

उन्होंने गुरुवार के फैसले से इस प्रस्ताव का किसी भी प्रकार का संबंध होने से इनकार करते हुए कहा, “यह कदम एक महीना पहले उठाया गया था और इसके लिए ज्यादातर सांसदों ने 20 दिन पहले ही हस्ताक्षर किए थे।”

आजाद ने कहा, “इस प्रस्ताव पर सात विभिन्न पार्टियों के 71 सांसदों ने हस्ताक्षर किए थे। हमने सभापति को बता दिया है कि इनमें से सात सांसदों का कार्यकाल पूरा हो चुका है, इसलिए उनके हस्ताक्षर मान्य नहीं होने चाहिए।

प्रस्ताव पर कांग्रेस के अलावा समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और आईयूएमएल के सांसदों व मनोनीत सदस्य के.टी.एस. तुलसी ने भी हस्ताक्षर किए हैं।

देश के प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ संसद में महाभियोग चलाने का यह पहला मामला है।

इस प्रस्ताव में दुर्व्यवहार के पांच मामलों को सूचीबद्ध किया गया है। पहला, एक शैक्षणिक ट्रस्ट को फायदा पहुंचाने के लिए कथित रूप से रिश्वत लिए जाने का मामला है। प्रधान न्यायाधीश ने सीबीआई द्वारा संदिग्ध जानकारी साझा किए जाने के बाद इलाहाबाद के एक न्यायाधीश के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की इजाजत देने से इनकार कर दिया था।

दूसरा मामला प्रधान न्यायाधीश द्वारा प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट के मामले में प्रशासनिक व न्यायिक प्रक्रिया को दरकिनार किए जाने का है और तीसरा मामला बैक डेटिंग से संबंधित है जो काफी गंभीर आरोप है।

दीपक मिश्रा पर चौथा आरोप ओड़िशा उच्च न्यायालय में वकील रहते कथित रूप से गलत शपथपत्र देकर जमीन अधिग्रहण करने का है। अतिरिक्त जिला दंडाधिकारी ने 1985 में जमीन का आवंटन रद्द कर दिया था। प्रधान न्यायाधीश ने सर्वोच्च न्यायालय के लिए चुने जाने के बाद वर्ष 2012 में जमीन पर मालिकाना हक छोड़ दिया था और वर्ष 2013 में सरेंडर कर दिया था।

प्रधान न्यायाधीश पर पांचवां आरोप अपने पद का दुरुपयोग कर संवेदनशील मामले चहेते जजों की खंडपीठ में भेजे जाने का है, जिसका मकसद परिणाम को प्रभावित करने का होता था।

पूर्व कानून मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा, “यह देश का एक गंभीर मसला है, इसका राजनीतिकरण न किया जाए। इसके पीछे कोई भी राजनीतिक मंशा नहीं है। कुछ लोगों के मामले अदालत में चल रहे हैं और हम उन्हें शर्मिदा नहीं करना चाहते।”

यह पूछे जाने पर कि इस पहल को लेकर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उत्साह नहीं दिखाया और महाभियोग पर हस्ताक्षर नहीं किए, सिब्बल ने कहा, “यह बिलकुल गलत है। यह सही नहीं है। यह कोई छोटा मुद्दा नहीं है। यह तुरंत बनने वाली कॉफी नहीं है। यह संविधान के बारे में है और एक संस्थान का मुद्दा है। हम उन्हें इसमें शामिल नहीं करना चाहते, क्योंकि वह पूर्व प्रधानमंत्री हैं।”

सिब्बल ने कहा, “यह प्रस्ताव लोया मामले पर फैसले से प्रेरित नहीं है। महाभियोग केवल किसी दुर्व्यवहार के कुछ आधार पर लगाया जा सकता है, न कि प्रधान न्यायाधीश के किसी निर्णय के आधार पर, चाहे वह सही हो या गलत। महाभियोग संवैधानिक आधार पर है।”

यह पूछे जाने पर कि क्या प्रस्ताव को खारिज किए जाने का प्रावधान है, सिब्बल ने कहा, “उन लोगों ने जो आरोप लगाए हैं, उसे दरकिनार नहीं किया जा सकता। हम समय आने पर निर्णय लेंगे। संविधान के पास कई रास्ते हैं।”

आजाद ने उम्मीद जताई कि सभापति इस प्रस्ताव पर सकारात्मक निर्णय लेंगे।

उन्होंने कहा, “एक सर्वोच्च संस्थान को बचाने के लिए हमारे पास महाभियोग लाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा था। हमने यह सब काफी भारी दिल से किया है।”

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