आपात स्थिति में पटना में एनडीए रैली का आयोजन कितना न्यायोचित?




-समीर भारती

पुलवामा आतंकी हमले के बाद देश में युद्ध जैसी स्थिति बन रही है. तीनों सेनाओं को तैयार (ready) मोड में रखा गया है. सेना की तरफ से एयर स्ट्राइक करने के बाद पाकिस्तान बौखलाया हुआ है. अभी वह कोई भी नापाक हरकत कर सकता है. पूरा विपक्ष सेना और सत्ता दोनों के साथ खड़ा है. ऐसे में पटना के गांधी मैदान में 3 मार्च की रैली का आयोजन न्यायोचित नहीं लगता. अभी जब प्रधान मंत्री की जरूरत किसी भी समय दिल्ली में पड़ सकती है उनका कई घंटे रैली में देना सूझ बूझ वाला कदम नहीं माना जा सकता है.

पुलवामा की घटना होने के बाद प्रधानमंत्री का जिम कॉर्बेट पार्क में शूटिंग करते रहना पहले ही उनकी कर्मठता को दागदार बना रहा है. हालंकि लोगों ने कहा कि जिम कॉर्बेट पार्क में नेटवर्क की कमी थी और प्रधान मंत्री को इसकी खबर देर से मिली, यह बात हजम नहीं होती. नरेंद्र मोदी कोई अफ्रीकी देश या नेपाल या पाकिस्तान के प्रधानमंत्री तो हैं नहीं. वह भारत जैसे प्रौद्योगिकी संम्पन्न देश के प्रधान मंत्री हैं. प्रधान मंत्री जहाँ जाते होंगे वहां इतना तो सुनिश्चित किया जाता होगा कि प्रधान मंत्री चाहे जहाँ हों उन्हें दिल्ली की आपात स्थिति की खबर मिलने की व्यवस्था रहे.

खैर, मेरा मानना यह है कि ऐसी स्थिति में पटना की रैली युद्ध को वोट में बदलने से अधिक कुछ नहीं. इससे भाजपा और एनडीए को वोट का लाभ मिलने के बजाए नुकसान ही हो सकता है. ऐसा हुआ भी है जब दिल्ली में पुलवामा के आतंकी हमले के बाद भाजपा के झंडे लगाए जा रहे थे तो एक सामान्य से युवक ने झंडा लगाने वाले को बहुत बुरा भला कहा. उस युवाल ने बड़े गुस्से से कहा कि बॉर्डर पर जवान शहीद हो रहे हैं और तुम भाजपा के झंडे लगा रहे हो. ऐसा उसने दुःख में कहा होगा लेकिन उसने सही कहा. मैं भी मानता हूँ कि अभी तो समय यह कि लोगों में देशभक्ति लाने के लिए पूरे देश में एक ही झंडा लगाना चाहिए और वह है हमारा प्यारा तिरंगा झंडा. रैलियां खासकर जिनमें प्रधान मंत्री और केन्द्रीय मंत्री हों बिलकुल नहीं करनी चाहिए.

मेरा अधिकार नहीं है कि मैं भाजपा और भाजपा की सहयोगी पार्टियों को कुछ कहूं. लेकिन देश का एक चिंतित नागरिक होने के नाते मुझे यह कहना ही पड़ेगा कि देश किसी भी सत्ता से बड़ा होता है. देश किसी भी प्रधानमंत्री से बड़ा होता है. इंदिरा गांधी जिसके आगे अटल बिहारी जैसे दिग्गज नेता भी नतमस्तक होते थे से जब जनता रूठ गयी तब उनके ही साथी जय प्रकाश नारायण ने सड़कों पर खुल कर विरोध किया और इंदिरा जैसी लौह महिला को कुर्सी त्यागनी पड़ी. यह वह इंदिरा थीं जिनकी अगुवाई में पाकिस्तान के दो टुकड़े हुए. सामरिक तौर पर पाकिस्तान को कमज़ोर करने का इससे अच्छा कोई काम न किया गया होगा और न ही अब किया जा सकता है.

मुझे लगता है कि इस स्थिति में पटना की रैली करना वोटों की राजनीति के अलावा कुछ नहीं है. देश की इस आपात स्थिति में नरेन्द्र मोदी को भारत के राष्ट्रपति के संपर्क में रहना ज़रूरी है जो भारत के तीनो सेनाओं के अध्यक्ष हैं. प्रधानमंत्री को रक्षा मंत्रालय के संपर्क में रहना ज़रूरी है और विपक्षी पार्टियों के साथ समन्वय भी ज़रूरी है. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का काम इस घड़ी में अधिक महत्वपूर्ण है जो वह भली-भांति कर रही हैं. इस समय हमें सशक्त कूटनीति अपना कर पाकिस्तान को दुनिया की नज़र में नापाकिस्तान बनाना पड़ेगा. भारत इसमें कामयाब भी लगता है.

यह तर्क किया जा सकता है कि रैली का कार्यक्रम पहले से तय है और इस पर करोड़ो रुपए खर्च किया जा चुका है. लेकिन इस तर्क को मैं नहीं मानूंगा क्योंकि देश से ऊपर कुछ नहीं है. ऐसी स्थिति में यह रैली केवल चुनाव की राजनीति करने का साधन मात्र है जिसे जनता को समझने में देर नहीं लगेगी.

ज्ञात रहे कि मार्च 3, 2019 को पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में एनडीए ‘संकल्प रैली’ का आयोजन कर रही है. बिहार में एनडीए सरकार में है और इसमें रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा, नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल (यू) भाजपा के मुख्य सहयोगी हैं. नीतीश कुमार ने राजद से अलग होकर भाजपा के समर्थन से सरकार बनाई थी. भाजपा से नीतीश कुमार बहुत बेरुखी के साथ अलग हुए थे जब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री का चेहरा बनाया गया था. अब साथ साथ राजनीति कर रहे हैं.

(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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