अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस विशेष: ये औरतें जो फ़ौलाद की तरह सिस्टम और सत्ता से लड़ रही हैं




नजीब की माँ फातिमा नफ़ीस को घसीटते हुए ले जाती दिल्ली पुलिस

आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के दिन जहाँ मीडिया कामयाबी का पैमाना ऊँचे ओहदे और अधिक सम्मान पाने पर तय कर रहा है वहीँ उन महिलाओं पर विरले ही लोग बात कर रहे हैं जिन्होंने आम इंसानों की ज़िंदगी की लड़ाई लड़ी. जिन्होंने अपने हक की लड़ाई बड़ी तन्मयता और निडर हो कर लड़ी. द मॉर्निंग क्रॉनिकल कुछ चुनिन्दा औरतों की संक्षिप्त कहानी आप को बता रहा है ताकि आप में इनके बारे में और ज्यादा जानने की तत्परता बढ़े.

ऐसा नहीं है कि जिन चंद औरतो का उल्लेख यहाँ हो रहा है बस वही हैं. इस भारत में सैकड़ों ऐसी महिलाएं हैं जो अनुसरण करने लायक हैं. हम प्रयास करेंगे कि अगली बार अपनी सूची लंबी करें. हम यहाँ वर्णमाला के क्रम में उनकी चर्चा करेंगे.

इरोम चानू शर्मिला

इरोम शर्मीला को कौन नहीं जातना? इरोम लगभग 16 वर्षों तक पूर्वोत्तर राज्यों में लागू Armed Forces (Special Powers) Act, 1958 को हटाने के लिए भूख हड़ताल पर रहीं।

इरोम मणिपुर की नागरिक अधिकार और राजनैतिक कार्यकर्त्ता हैं जिन्हें लौह महिला के नाम से पुकारा जाता है. इनको सत्ता से लड़ने का खामियाजा कई बार भुगतना पड़ा. इन्हें कई बार जेल में डाला गया फिर भी वह अडिग रही.

शर्मीला को कई पुरस्कार मिले. उनहोंने अक्टूबर 2016 में अपनी पार्टी लांच की और चुनाव भी लड़ा लेकिन उन्हें जनता ने एक राजनेता के रूप में नकार दिया.

इरोम शर्मीला इन सब के बावजूद आज भी बहादुरी से अपना काम कर रही हैं.

तीस्ता सीतलवाड़

तीस्ता सीतलवाड़ मानवाधिकार कार्यकर्ता, सामजिक कार्यकर्ता और पत्रकार हैं। वह Citizens for Justice and Peace (CJP) नामक संगठन की सचिव हैं, यह संगठन 2002 में गुजरात में सांप्रदायिक दंगे के पीड़ितों के लिए न्याय लड़ने के लिए स्थापित किया गया था। सीजेपी एक सह-याचिकाकर्ता है जो नरेंद्र मोदी और 62 अन्य सरकारी अधिकारियों के 2002 के गुजरात दंगों में उनकी आरोपित सहभागिता के लिए आपराधिक मुकदमा की मांग कर रही है.

तब से उन 62 में से चार आरोपियों के नाम चार्जशीट में दाख़िल हुए है, जिनमें से सभी को अदालत द्वारा बरी किया जा चुका है।

कल इसी मामले की कड़ी में सुप्रीम कोर्ट ने बाबू बजरंगी को भी जमानत दे दिया.

सीतलवाड़ का जन्म 1962 में एक गुजराती हिन्दू परिवार में हुआ था। उनके पिता मुंबई के प्रसिद्ध वकील अतुल सीतलवाड़ हैं और उनके दादा एम सी सीतलवाड़, भारत के सबसे पहले अटर्नी जनरल थे।

तीस्ता पर गुजरात सरकार और फिर केंद्र सरकार ने कई शिकंजे कसे. उन्हें जान की धमकियाँ मिली. उनकी गतिविधियों को रोकने के लिए उनके एनजीओ पर आर्थिक पाबंदी लगाई गयी.

फिर भी अब तक वह उसी बहादुरी से लड़ रही हैं.

नंदिनी सुंदर

छत्तीसगढ़ के बस्तर का नाम जब आता है तो नंदिनी सुंदर का नाम अनायास ही आ जाता है. एक ऐसा नाम, जिनके शोध और लेखन के कारण आधुनिक बस्तर के समाज और इतिहास की कई तस्वीरें पहली बार सामने आई हैं.

जिस छत्तीसगढ़ में उन्होंने अपने जीवन का अच्छा ख़ासा समय दिया उसी छत्तीसगढ़ पुलिस के दस्तावेज़ में नंदिनी सुंदर का नाम हत्या के मामले में दर्ज है जो अब तक सत्यापित नहीं किया जा सका. नंदिनी को बस्तर में पुलिस के शीर्ष अफ़सर सार्वजनिक तौर पर माओवादियों का समर्थक घोषित करते रहे हैं. उनके बारे में पिछले कुछ सालों में लगातार यह प्रचारित किया गया है कि वे भारत के माओवादियों का शहरी चेहरा हैं.

नंदिनी सुंदर डेल्ही स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में समाजशास्त्र की प्रोफेसर हैं. उन्हें आदिवासियों के उत्थान के लिए कई बड़े काम किए हैं और सत्ता से उनके हक की ज़ोरदार लड़ाई लड़ी हैं. आदिवासियों के खिलाफ बनी सेना सलवा जूडम को उनहोंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका डालकर प्रतिबंधित करवाया. सलवा जूडम बिहार के रणवीर सेना की ही तरह है. सलवा जूडम का नाम उस जमाने में आदिवासियों के लिए दहशत का पर्याय था.

जिस तरह से उनपर हत्या का आरोप लगाकर, उन्हें अर्बन नक्सल कह कर मानसिक यातनाएं दी गईं इनसे वह नहीं घबडाई और अपना काम आज भी कर रही हैं.

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फातिमा नफ़ीस

फातिमा नफीस इन दो सालों में चर्चित नाम रहा. फातिमा नफीस नजीब की माँ हैं. उनहोंने अपने बेटे की गुमशुदगी को लेकर सड़क पर विरोध किया. नजीब जेएनयू के छात्र थे जो दो साल से अधिक से लापता हैं. गायब होने से पहले उनका भाजपा के छात्र विंग एबीवीपी के कुछ कार्यकर्ताओं के साथ झगड़ा हुआ था.

नजीब का आज तक पता नहीं चल पाया. नफ़ीस आज भी अपने बेटे की तलाश में इधर से उधर भटक रही हैं और एबीवीपी और भाजपा के खिलाफ झंडा गाड़े हुए हैं.
उन्हें दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार भी किया था लेकिन बाद में विरोध के चलते छोड़ दिया. पुलिस द्वारा उन्हें सड़कों पर घसीटते हुए ले जाने की तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी.

मेधा पाटेकर

मेधा पटकर भारतीय सामाजिक कार्यकर्ता तथा सामाज सुधारक है। वे भारतीय राजनीतिज्ञ भी है। मेधा पाटकर नर्मदा बचाओ आंदोलन की संस्थापक के नाम से भी जानी जाती है|

मेधा पाटकर पर्यावरण सक्रियता के लिए मानी जाती हैं। नर्मदा बचाओ आंदोलन में उनका गहरा हाथ हैं। नर्मदा नदी महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश तथा गुजरात से बहकर अरेबिअन सागर तक पहुँचती हैं। इस नदी पर काफ़ी सारे छोटे बांध एवं सरदार सरोवर बांध को बनाने की अनुमती सरकार ने दी थी। इस से हज़ारो आदीवासियों का नुकसान होता। साथ ही साथ किसानों का भी नुकसान हो रहा था। उन से उनकी रहने की जगह छीन लिया जा रहा था। आदीवासियों का विस्थापन हो रहा था और उस के लिये उन्हें मुआवजा भी नहीं दिया जा रहा था। पाटेकर उन लोगों में से एक थी जो इस अन्याय से लड़ रही थी। अपना पूरा समय नर्मदा नदी पर लगाने के लिए उन्होनें अपनी पी.एच.डी की पढ़ाई छोड़ दी।

मेधा पर कई बात पुलिसिया कारवाई की गयी लेकिन उनहोंने हिम्मत नहीं हारी. वह पूरे भारत में आदिवासी, दलित, पिछड़ों की आवाज़ बनी हुई हैं.

राधिका वेमुला

राधिका वेमुला लगभग तीन साल पहले भेदभाव से तंग आकर आत्महत्या करने वाले हैदराबाद विश्वविद्यालय के शोध छात्र रोहित वेमुला की माँ हैं. राधिका वेमुला अपने बेटे की मौत के पीछे ज़िम्मेदार लोगों को सज़ा दिलाने के लिए लगातार लड़ रही हैं.

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रोहित चक्रवर्ती वेमुला हैदराबाद विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहे थे. उनहोंने Caste is Not A Rumour नाम की किताब लिखा था. रोहित को 17 जनवरी 2016 में एबीवीपी की शिकायत पर विश्वविद्यालय से बर्खास्त कर दिया गया था. जिसके बाद वेमुला ने आत्म हत्या कर लिया था. रोहित ने आत्म हत्या करने से पहले एक पत्र लिखा था जो मीडिया में बहुत चर्चित हुआ था. रोहित ने अपने पत्र में लिखा था “मेरा जन्म एक भयंकर दुर्घटना थी. मैं अपने बचपन के अकेलेपन से कभी उबर नहीं पाया. बचपन में मुझे किसी का प्यार नहीं मिला.”

वेमुला भारत में दलित अधिकार को लेकर लगातार यात्राएं कर रही हैं और दलित अधिकारों को लेकर लड़ाई लड़ रही हैं.

सुधा भारद्वाज

सुधा भारद्वाज एक मानवाधिकारों की कानूनी लड़ने वाली एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं। सुधा करीब तीन दशक से छत्तीसगढ़ में काम कर रही हैं। वह छत्तीसगढ़ में पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिब्रेशन (पीयूसीएल) की महासचिव भी हैं। इन्होंने भूमि अधिग्रहण के खिलाफ बड़े पैमाने पर काम किया है।

सुधा ने मजदूरों के अधिकार के लिए भी काम किया है। वह जनजातियों और दलितों के अधिकार की वकालत करती रही हैं और इन समुदायों के बीच उनकी अच्छी-खासी पहचान है। वह वर्ष 2000 में वकील बनीं। तब से वह किसानों, आदिवासियों और श्रम के क्षेत्र में गरीब लोगों, भूमि अधिग्रहण, वन अधिकार एवं पर्यावरण अधिकार के लिए काम करती आयी हैं। वह 2007 से छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में वकालत करती हैं।

सुधा नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली में गेस्ट प्रोफेसर भी हैं। यहां वह भूमि अधिग्रहण, जनजातियों के अधिकार पर सेमिकार कोर्स और कानून एवं गरीबी विषयों पर पढ़ाती हैं। पुणे पुलिस ने उन्हें धारा 153ए, 505, 117 और 120 के तहत गिरफ्तार किया था लेकिन फिर उन्हें छोड़ दिया गया.

सुधा का जन्म अमेरिका में हुआ लेकिन 11 साल की उम्र में वह भारत लौट आईं और 18 साल की अवस्था में पहुंचने पर उन्होंने अपनी अमेरिकी नागरिकता छोड़ दी। सुधा ने आईआईटी कानपुर से गणित की पढ़ाई की। उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और बिहार में मजदूरों की भयावह दशा देख उन्होंने श्रमिकों के लिए काम करने का मन बना लिया और वह 1986 में छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा से जुड़ गईं। सुधा ने रायपुर एक कॉलेज से कानून की पढ़ाई 2000 में पूरी की। तब से वह मजदूरों के अधिकारों की लड़ाई लड़ते आ रही हैं।

सोनी सोरी

सोनी शायद स्वतंत्र भारत की पहली महिला होंगी जिन्होंने अपने हक की लड़ाई अपने दम पर लड़ा और छत्तीसगढ़ के आदिवासियों में उनका नाम प्रेरणास्रोत है. सोनी छत्तीसगढ़ के दातेवाडा जिला के सामली गाँव की रहने वाली हैं.

वह जबेली में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा संचालित आदिवासी बच्चों के लिए एक आवासीय विद्यालय में पढ़ाती थीं। जब उनके भतीजे, लिंगाराम कोडोपी, 26, को सामेली गांव, जिला दंतेवाड़ा में उनके घर से जबरन उठाकर विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) बनने के लिए दबाव बनाने के लिए उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया तब से सोनी सोरी का जीवन आसान नहीं. तब से वह सिस्टम से लड़ रही हैं.

सोरी ने पुलिस की इस कार्रवाई को उच्च न्यायालय में चुनौती दी और अपने भतीजे को रिहा करवाया। अदालत द्वारा रिहा किए जाने के बाद भी पुलिस ने उसके भतीजे पर कई बार हमला किया। उनके बड़े भाई, मासाराम कोडोपी को पुलिस ने उठा लिया और एक दिन के लिए हिरासत में लिया. उनपर “नक्सली” की रिहाई का आरोप लगाया।

सोनी की हिम्मत देखकर पुलिस ने बर्बरता तेज कर दी और उन्हें न बयान करने वाली यातनाएं दी गईं. लेकिन सोनी अडिग रहीं. उनहोंने अपने भतीजे को दिल्ली भेजकर पत्रकारिता का कोर्स पूरा करवाया जिससे छत्तीसगढ़ पुलिस और अधिक आशंकित हो गयी.

पुलिस ने उन्हें कई आपराधिक मामलों में झूठा फंसाया। सितंबर 2011 के दूसरे सप्ताह में, वह अपनी जान के डर से छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा से भाग गई क्योंकि छत्तीसगढ़ पुलिस ने 11 सितंबर, 2011 को उसे खत्म करने की कोशिश की।

सोरी ने कानूनी सहारा लेने की कोशिश की और दिल्ली आ गईं। छत्तीसगढ़ पुलिस ने उनका यहाँ भी पीछा किया और उन्हें छत्तीसगढ़ वापस ले गई। पुलिस ने उन्हें बिजली के झटके दिए, उनके साथ छेड़छाड़ किया और उनके निजी अंगों में पत्थर डालकर पुलिस स्टेशन में प्रताड़ित किया। उन्हें हिरासत में बेरहमी से पीटा गया।
इन सबके बावजूद सोनी ने हिम्मत नहीं हारी.

शबनम हाशमी

शबनम हाशमी भारत की नामी सामाजिक और मानव अधिकार कार्यकर्त्ता हैं. सफ़दर हाशमी उनके भाई थे जिन्हें कांग्रेस के गुंडों ने कत्ल कर दिया था. सफ़दर भारत में स्ट्रीट थिएटर का एक बड़ा नाम था और जनता को जागरूक करने के लिए स्ट्रीट प्ले लिया करते थे. उन्हें भारत के राजनैतिक थिएटर की अब तक अहम आवाज़ माना जाता है.

शबनम ANHAD (Act Now for Harmony and Democracy) की कई संस्थापकों में से हैं. वह अभी इसकी संचालिका हैं. मोदी सरकार के आते ही उन पर कई शिकंजे कसे गए. उनके एनजीओ को बाहर से आने वाले पैसों पर रोक लगा दिया गया.

शबनम हाशमी को उनके काम केलिए कई अवार्ड मिले.

केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने उनके एनजीओ की विदेश से चंदा आने वाले लाइसेंस को रद्द किया ताकि उनकी गतिविधियों को आर्थिक तंगी के कारण रोका जा सके

लेकिन वह नहीं रुकीं और उनका काम उसी गति से चल रहा है.

अगर कोई और होता तो अपने भाई के क़त्ल के बाद ही सामाजिक कार्य छोड़ दिया होता लेकिन तमाम विषमताओं के बावजूद शबनम आज भी आम जनता की आवाज़ बनकर भारतीत लोकतंत्र को मज़बूत करने के लिए लड़ रही हैं.

 

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