आईपीएस अधिकारी अमिताभ कुमार दास की जबरन सेवानिवृत्ति, जनहित में निर्णय या जनहित का मज़ाक़




(अमिताभ कुमार दास ग़रीब बच्चों के एक कार्यक्रम में पुरस्कार वितरित करते हुए)

1994 बैच के भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी अमिताभ कुमार दास को समय से पहले सेवानिवृत्त करा दिया गया. 18 जुलाई को भारत सरकार के गृह मंत्रालय से निर्गत आदेश में यह कहा गया है कि अखिल भारतीय सेवाएँ (मृत्यु सह सेवानिर्वित्ति लाभ) नियमावली, 1958 के अंतर्गत बिहार सरकार की सहमती के बाद बिहार कैडर और बैच 94 के आईपीएस अधिकारी श्री अमिताभ कुमार दास को जनहित में तत्काल प्रभाव के साथ सेवानिर्वित्त किया जाता है. इसमें यह भी कहा गया कि नोटिस के बदले उन्हें तीन महीने का वेतन और भत्ता दिया जाएगा. इस  आदेश के अनुसार इन्हें भारतीय सेवाएं नियमावली 1958 के तहत सेवांत लाभ भी दिया जाएगा.

कौन हैं अमिताभ कुमार दास?

अमिताभ कुमार दास मूलतः दरभंगा से हैं और 1994 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं. अभी वह पुलिस अधीक्षक सह सहायक नागरिक सुरक्षा आयुक्त के पद पर तैनात थे. अमिताभ दास कई बार अपनी ईमानदारी और कठोर प्रशासनिक निर्णय को लेकर सुर्ख़ियों में रहे हैं. पहली बार वह तब सुर्ख़ियों में आए थे जब उनहोंने भाजपा के वर्तमान (और तत्कालीन भी) मंत्री गिरिराज सिंह के खिलाफ कारवाई की मांग की थी. अमिताभ दास नीतीश कुमार के अनंत सिंह से रिश्ते को लेकर भी मुखर रहे हैं.

क्या है उनका क़सूर?

उनका क़सूर बस इतना है कि वह सिस्टम में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलते रहे हैं. नरेंद्र मोदी और भाजपा की नफ़रत की नीति के खिलाफ बोलते रहे हैं. वह उन आईपीएस ऑफिसर में हैं जो समाज से जुडी हर समस्या से अपना सरोकार रखते हैं और आम लोगों से भी सहजता के साथ खुद को कनेक्ट कर लेते हैं. टेलीग्राफ में प्रकाशित एक रिपोर्ट  के अनुसार, अमिताभ दास ने रेल एसपी रहते हुए तत्कालीन रेल मंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ रेल के ठेके को लेकर राजनेता-अपराधी गठजोड़ पर विस्तृत रिपोर्ट केंद्र को भेजी थी जिसके चलते कई सालों तक उनके प्रोन्नति को रोक दिया गया था. दास ने न्यायालय में अपनी सफाई पेश करते हुए इसे नीतीश कुमार का बदला की कारवाई बताया था. तब न्यायलय ने दास के खिलाफ कारवाही समाप्त करते हुए उन्हें प्रोन्नति देने का आदेश दिया था.

अमिताभ दास ने मानव अधिकार के एसपी रहते हुए वर्तमान मंत्री गिरिराज सिंह पर रणवीर सेना के संरक्षक होने का भी आरोप लगाया था जिस के बाद भी उन पर विभागीय कारवाई चली थी. तब उनके समर्थन में 92 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर ने खुलकर समर्थन किया था और तत्कालीन बिहार राज्य के मानव अधिकार आयुक्त को पत्र में निवेदन किया था कि दास ने जो मामला उठाया है उसकी जांच की जाए न की उन पर ही विभागीय कार्यवाई शुरू की जाए.

सार्वजनिक प्रतिक्रिया

चर्चित सामाजिक कार्यकर्त्ता शबनम हाशमी ने इसकी निंदा की है. उनहोंने कहा कि खालिद और कन्हैया जैसा विद्यार्थी हो या फिर अमिताभ दास जैसे आईपीएस अधिकारी जो भी आरएसएस के विचारधारा से तालमेल नहीं बिठाएंगे उन्हें नरेंद्र मोदी की सरकार निशाना बनाएगी और यह सिलसिला अभी आगे और चलेगा. लोगों पर इस तरह के प्रहार और भी बढ़ेंगे.

पटना स्थित प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्त्ता सत्यनारायण मदन ने इस निर्णय की आलोचना करते हुए कहा है कि नौकरशाही तो जनहित के लिए होती है. यह आश्चर्य की बात है कि किसी आईपीएस अधिकारी जिसकी नियुक्ति ही जनहित के लिए की गयी थी उसे जनहित के आधार पर हटा दिया गया. इसका एकमात्र उद्देश्य है कि नौकरशाही में बैठे लोग जो सरकार की नीतियों के खिलाफ हैं उनका मुंह बंद किया जाए और उनकी जन अहित नीतियों की बात सार्वजनिक न हो.

द मॉर्निंग क्रॉनिकल ने राजद प्रवक्ता शिवानन्द तिवारी से जब बात की तो उनहोंने इस पर अधिक टिप्पणी करने से इनकार किया. अमिताभ ठाकुर ने भी यह कह कर टिप्पणी करने से मना कर दिया कि यह स्टेट पॉलिसी का मामला है.

हालांकि, अमिताभ दास के समर्थन में कई वकील सामने आए हैं. सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता शम्स ख्वाजा ने कहा कि वह इनका केस बिना कोई शर्त और बिना फीस लड़ने को तैयार हैं. अमिताभ दास ने द मॉर्निंग क्रॉनिकल को बताया कि वह इस मामले में कोर्ट की शरण में फिर से जाएंगे और उन्हें उम्मीद है कि फिर एक बार उन्हें न्याय मिलेगा.

एक बड़े पुलिस अधिकारी ने दास का समर्थन किया है और कहा कि यह गलत हुआ है. उनहोंने अपना नाम गोपनीय रखने की शर्त पर बस फैज़ अहमद फैज़ का यह शेर पढ़ दिया.

निसार मैं तेरी गलियों के ऐ वतन,

कि जहां चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले

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