क्या बलात्कार को रोकने का हल इस्लामी तालिमात में मौजूद है?




द मॉर्निंग क्रॉनिकल ने आए दिनों हो रही बलात्कार की घटनाओं के मद्देनज़र लोगों से राय मांगी। इसमें विभिन्न धर्मों के जानकार और नारीवादी सब की राय पर लेख तैयार किए गए। हमारा मानना यह है कि हमें इस कुकृत्य को रोकने के लिए गंभीर प्रयास करने होंगे।

इस श्रृंखला में हम हिन्दू धर्म के जानकार और सामाजिक मुद्दों से सरोकार रखने वाले मार्कंडेय साहब, इस्लाम धर्म के ज्ञाता और संस्कृत के विद्वान हाफ़िज़ शानुद्दीन साहब,  ईसाई धर्म के जानकार फ़ादर फ़िलिप मंथरा और नारीवादी नीलू रुपेश से बात की। उनके विचारों को हम यहाँ प्रत्येक शनिवार क्रमवार प्रस्तुत करेंगे।

इस श्रृंखला की पहली कड़ी में हाफ़िज़ शानुद्दीन साहब के विचार प्रस्तुत हैं। विचार बिलकुल व्यक्तिगत हैं और समाधान से समाज को अवगत कराना हमारा मात्र उद्देश्य है। 

-हाफ़िज़ शानुद्दीन

बलात्कार एक ऐसी प्रताड़ना है जो नारी की आत्मा पर अभिशाप का काँटा बन कर चुभ जाता है । जो समाचार पत्रिका,चैनल, रेडियो आदि पर कुछ समय बीत जाने पर अतीत बन जाता है परंतु उस नारी के लिए जिसके साथ बलात्कार जैसी घिनौनी घटना घटी है अतीत नहीं बनता।

इस संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न ये है कि बलात्कार जैसी घटनाएँ घटती ही क्यों है ? आखिर क्या कारण है जिससे पुरुष महिला पर आक्रामक हो जाता है ? बुद्धिजीवियों ने इसके कई कारण बताए हैं जिनमे मुख्य रूप से शादी का समय पर न होना, ब्लू फ़िल्म का आम होना, कुछ डिजाइनर द्वारामहिलाओं के लिए तैयार किये गयेअश्लील कपड़ेआदि ।



मुख्य रूप से ये तीन कारण ऐसे हैं जो समाज में बुराई के उत्पत्ति का स्रोत है जिस पर प्रायः हमारा ध्यान नहीं जाता । अगर कभी इन तथ्यों पर विचार-विमर्श किया भी जाता है तो व्यापार जगत को बचाने के लिए इस विचार को”नारी स्वतन्त्रता पर प्रतिबंध” का नारा दे कर विराम लगा दिया जाता है । जबकि होना ये चाहिये था कि हम तार्किक दृष्टिकोण से समाज के इस गर्हित समस्या का विश्लेषण करते । एक उदाहरण से समझाने का प्रयास करता हूँ : चुंबक को हम सब ने देखा है, चुंबक के आकर्षित सीमा के अंदर जब लोहा को लाया जाता है, तो लोहा अकस्मात ही चुंबक की ओर खिंच जाता है । क्या हमने कभी गौर किया ऐसा क्यों होता है ? इसका उत्तर है आकर्षित करना चुंबक की प्रकृति है । ठीक इसी प्रकार नारी और पुरुष भी हैं, नारी चुंबक के समतुल्य है और पुरुष लोहा के। जब बालक बाल्यावस्था से वयस्क हो जाता है तो उसका खिंचाव नारी की ओर अत्यधिक बढ़ जाता है और इसी खिंचाव पर आग में घी का काम कर जाता है, शादी का समय पर न होना, ब्लू फ़िल्म का देखना, डिज़ाइनर द्वारा महिलाओं के लिए तैयार किए गए अश्लील कपड़े आदि ।

इस सामाजिक बुराई को जड़ से समाप्त करने के लिए आज से 1400 वर्ष पूर्व इस्लाम ने तार्किक दृष्टिकोण से कुछ नियम बताए हैं जिसको आज के बढ़ते बलात्कार के परिवेश में समझना और लागू करना अनिवार्य है ।

बलात्कार को रोकने का इस्लामी दृष्टिकोण

इस्लाम एक दीन है और दीन होने के नाते ये व्यक्तिगत जीवन से लेकर सामूहिक जीवन तक फैला हुआ है । दीन का निर्माण आस्था,पूजा, संस्कार,समाज,अर्थ तथा राजनीत इन छः तथ्यों से होता है । इसमें प्रथम तीन व्यक्तिगत जीवन से संबन्धित है तथा अन्य तीन सामूहिक जीवन से संबद्ध है । सामूहिक जीवन से संबद्ध होने के कारण ही इस्लाम का अपना क़ानून है जिसे “शरिया क़ानून” के नाम से जाना जाता है । ये वही शरिया क़ानून है जिसे लेकर पश्चिमी मीडिया दिन-रात निंदा करती है तथा औरतों के अधिकार की बात करती है जबकि पश्चिमी देशों में ही औरतों के प्रति बढ़ती हिंसा, बलात्कार इत्यादि की आधिक्य है तो वहीं सऊदी अरब जैसे अरेबियन देशों में महिलाओं पर होने वाली हिंसा, बलात्कार इत्यादि का दर पश्चिमी देशों के मुक़ाबले बहुत कम है, जिसका कारण है महिलाओं के विरुद्ध होने वाली हिंसा को लेकर कठोर क़ानून । जब बात कठोर क़ानून तक पहुँच चुकी है तो आपको बता दूँ इस कठोर क़ानून के पीछे इस्लामिक व्यवस्था की अपनी तत्वदर्शिता है, इसके दृष्टिकोण से शारीरिक सज़ा मुजरिम को जुर्म करने से रुकने को मजबूर करता है यही कारण है कि इस्लाम शारीरिक सज़ा पर अत्यधिक ज़ोर देता है । शारीरिक सज़ा  बजाहिर क्रूर तो अवश्य दिखता है परंतु इसके अंदर अत्यधिक गुण है जो समाज से बुराई को खत्म कर देने की क्षमता रखता है ।

अब बात करते हैं बलात्कार से निपटने के तरीक़ो पर । जैसा कि उपर बताया जा चुका है कि शादी का समय पर न होना भी बलात्कार का एक कारण है । इस्लाम इस समस्या के समापन हेतु आदेश देता है : “और तुम में जो अविवाहित हों उनका निकाह कर दो,और तुम्हारे दासों और दासियों में से जो निकाह के योग्य हो उनका भी” (क़ुरआन-24:32) ।

इसी प्रकार हदीस में वर्णित है कि निकाह में देर न किया करो जब लड़का या लड़की वयस्क हो जाएँ तो उनके निकाह में देर न किया जाए । हजरत अली रजि॰ से कथित है कि ” मुहम्मद सल्ल॰ ने फरमाया : अली तीन बातों के करने में देर न किया करना पहला नमाज़ पढ़ने में जबके उसका समय हो जाए, दूसरा जनाज़े में जबकि वह तैयार हो जाए तथा तीसरा निकाह करने में जबकि उसका जोड़ा मिल जाए” (जामेअ तिर्मिज़ी: 571)। इस हदीस में “वजूबे तअजील” (जल्दी निकाह करने को) लगभग नमाज़ के निकट का दर्जा दिया गया है ।



इसी प्रकार ब्लू फिल्म या फ़हहाशी को देखने पर अल्लाह का आदेश है “….और अल्लाह रोकता है अश्लीलताओं से और बुराइयों से और सरकशी से । अल्लाह तुमको उपदेश देता है ताकि तुम खूब याद रखो” (क़ुरआन-16:90)। इसी प्रकार क़ुरआन पराई औरत या पराये मर्द दोनों को एक दूसरे को देखने से भी मना करता है ।

इस्लामिक बुद्धिजीवियों का मानना है कि व्यभिचार या बलात्कार जैसी घटना का आरंभ देखने से ही होता है इसलिए इससे बचना चाहिए इस हेतु अल्लाह का आदेश है “मोमिन आस्थावान पुरुषों से कहो कि वह अपनी निगाहें नीची रखें और अपने गुप्तांगों की रक्षा करें। यह उनके लिए पवित्र है। इसी प्रकार मोमिन महिलाओं को भी आदेश दिया कि  “मोमिन महिलाओं से कहो कि वह अपनी निगाहें नीची रखें और गुप्तांगों की रक्षा करें और अपने सौंदर्य को प्रकट न करें, अतिरिक्त उसके जो समान्यतः प्रकट हो जाए । और अपने दुपट्टे (ओढ़नी) अपने सीनों पर डाले रहें” (क़ुरआन-24:30,31)।

व्यभिचार या बलात्कार हो जाने पर सज़ा का प्रावधान

अब अगर कोई अल्लाह और नबी के आदेशों की अवहेलना करता है तो उसके लिए सज़ा का भी प्रावधान है । इस्लाम में ज़िना (व्यभिचार) को दो भागों में बाँट कर सज़ा निर्धारित किया गया है ।

पहला “ज़िना बिल रज़ा” अर्थात बगैर निकाह के ही सहमति से शारीरिक संबंध बनाना तथा दूसरा “ज़िना बिल जब्र” यानि ज़बरदस्ती शारीरिक संबंध बनाना। इसमें ज़िना बिल रज़ा के लिए क़ुरआन ने 100 कोड़े मारने को कहा है “व्यभिचारिणी महिला और व्यभिचारी पुरुष दोनों में से हर एक को सौ कोड़े मारो। और तुमको इन दोनों पर अल्लाह के दीन के मामले में दया नहीं आनी चाहिए यदि तुम अल्लाह पर और परलोक के दिन पर विश्वास रखते हो । और चाहिए के दोनों को दंड देने के समय मुसलमानों का एक समूह उपस्थित रहे ” (क़ुरआन-24:2)। ज़िना बिल जब्र के लिए मुहम्मद सल्ल॰ ने रज़्म (पत्थर मारने की क्रिया) करने का आदेश दिया है जैसा कि इस वाकये से पता चलता है : “वाएल बिन हजर रजि॰से रिवायत है कि एक शख्स (व्यक्ति) ने नमाज़ के लिए मस्जिद जाती हुई एक महिला (खातून) को रास्ते में अकेला पा कर उसे पकड़ लिया और ज़बरदस्ती उसके साथ बदकारी (दुष्कर्म) कर के भाग गया । लेकिन जब उसके शक में किसी दूसरे शख्स को पकड़ लिया गया और उसको सज़ा सुनाया जाने लगा तो असल मुजरिम ने अपने जुर्म का एक़रार कर लिया इस पर मुहम्मद सल्ल॰ ने उसे संगसार (पत्थरों से मारना) करने का आदेश दिया” (अबु दाउद-4379)। ताबइ मुफ़स्सिर सदी ने क़ुरआन की सूरह अहज़ाब की आयात 61 में मुनाफकीन के हवाले से ब्यान होने वाली आयत को आधार बना कर लिखा है कि “क़ुरआन मजीद में ये एक ऐसा आदेश है कि जिस पर अमल नहीं किया जाता । अगर कोई व्यक्ति या कुछ लोग किसी महिला का पीछा करें और उसको ज़बरदस्ती पकड़ कर उसके साथ बलात्कार करें तो उनकी सज़ा 100 कोड़े मारना या रज़्म करना नहीं होना चाहिए बल्कि उन्हें पकड़ कर उनकी गर्दनें उड़ा देनी चाहिए ।

अगली कड़ी: हिंदुत्व के जानकार मार्कंडेय, ईसाई धर्म गुरु फ़िलिप मंत्रा, नारीवादी नीलू  रुपेश की राय अवश्य पढ़ें

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