मुसलमान और इसाई अपने देश में बेगाने




प्रियंका गांधी के लॉकेट को फोटोशॉप करके क्रॉस बनाया गया जिसका सोशल मीडिया पर बचाव किया गया

-समीर भारती

यह सभव है कि जिस तरह से सरकारी प्रतिष्ठानों का निजीकरण करके आरक्षण ख़त्म किया जा रहा है उसी तरह से संविधान समाप्त कर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए चुनाव के आरक्षित सीटों को ही ख़त्म कर दिया जाए

भारत का संविधान कहता है कि देश का कोई नागरिक धर्म, ज़ात, बोली, खान-पान और पहनावे के आधार पर जुदा नहीं है. कश्मीर से कन्याकुमारी तक यह देश विविधताओं वाला देश है और इसमें राज्य के अनुसार कई तरह के कानून भी हैं. स्पष्ट उदाहरण के तौर पर गोवा और दुसरे पूर्वोत्तर राज्यों में गौवंश का मांस कानूनी तौर पर सही है जबकि अन्य राज्यों में यह वैध नहीं है. ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ राज्य के कानून अलग हैं लेकिन इससे देश की संप्रभुता पर कोई असर नहीं पड़ता. उसका कारण यह है कि इस देश का संविधान एक है.

देश का संविधान मूल है

कानून के जानकार कहते हैं कि देश का संविधान मूल है. कानून में संशोधन की इजाज़त भी संविधान से परे होकर नहीं किया जा सकता. संविधान ने मुसलमानों, ईसाईयों, दलितों, आदिवासियों और सवर्णों सबको एक ही अधिकार दिए हैं और सबके कर्तव्य भी एक हैं. अधिकार यह है कि सब इस देश में शान्ति से रह सकता है, सब इस देश में अपनी पसंद का धर्म अपना सकता है. सब अपने धार्मिक अनुष्ठान कर सकता है. सब अपने धर्म का प्रचार और प्रसार कर सकता है. सब अपने पसंद का खाना खा सकता और कपड़े पहन सकता है. कर्तव्य यह है कि भारत के हर नागरिक को संविधान का पालन करना है. सबों को कानून का पालन करना है. संविधान द्वारा विभिन्न धर्मों और समुदायों को कुछ मामले में छूट दिए गए हैं. उदाहरण के लिए, पर्सनल लॉ. पर्सनल लॉ मुसलमानों. ईसाईयों, सिखों, आदिवासियों और सास्कृतिक तौर पर अलग समुदायों के लिए अलग अलग हैं. इन पर्सनल लॉ की अपनी सीमाएं है. ये शादी, तलाक और विरासत तक ही सीमित हैं. उदाहरण के लिए, मुस्लमान को एक से ज्यादा शादी की अगर इजाज़त है तो वही दक्षिण भारत और आदिवासी समूहों में भी यह रिवाज संविधानिक है. पर्सनल लॉ के अंतर्गत दिए गए यह अधिकार भी संविधान के दायरे में न कि इससे बाहर.

मुसलमान और इसाई को निशाना क्यों?

चुनावों से पहले एक विशेष पार्टी के लोग ऐसा करते हैं कि किसी विशेष नेता को एक विशेष धर्म से जोड़ कर उन्हें अछूत बनाते हैं. उदाहरण के लिए, गांधी परिवार को इसाई और पारसी कह कर पुकारा जाता है. नेहरु को मुसलमान कह दिया जाता है. एक कार्यक्रम में एक सामजिक कार्यकर्त्ता जो बहुजन समाज से आती थीं ने इंदिरा के बारे में कह दिया कि वह मुसलमान से शादी कर ली. यह बात गलत है लेकिन अगर सही भी होता तो क्या इंदिरा गांधी संविधान के अनुसार इस देश में चुनाव लड़ने से वंचित हो जातीं. इसी तरह राहुल गांधी के मंदिर जाने पर लोग कटाक्ष करने लगे. क्या राहुल को मंदिर जाने के लिए हिन्दू होने का प्रमाण पत्र साथ ले जाना चाहिए था?

यह देश का दुर्भाग्य है कि कोई अगर हिन्दू बनना भी चाहता है तो उसे ऐसा बनने से रोक दिया जाता है जबकि दूसरी ओर कोई हिन्दू अपना धर्म परिवर्तन करना चाहता है तो उस पर बवाल खड़ा किया जाता है.

प्रियंका गांधी के गले के लॉकेट को फोटोशॉप के ज़रिए क्रॉस में बदल दिया गया और सोशल मीडिया पर उन्हें इसाई के तौर पर प्रस्तुत किया जाने लगा. क्या इस देश में इसाई होना अपराध है? उर्मिला मातोंडकर को अभी एक विशेष पार्टी की ट्रोल सेना ने मरियम अख्तर मीर नाम दिया है. क्या मरियम अख्तर मीर होना अपराध है?

मीडिया का बचकाना रवैया

मीडिया भी ऐसे ट्रोल या विवाद को हवा देती है. इससे टीआरपी भी बढती है और मीडिया जिनके इशारे पर काम कर रहे होते हैं उनको इसका फायदा पहुँचाना भी मकसद होता है. समझदार मीडिया का भी इस मामले में बचकाना रवैया होता है.

प्रियंका गांधी के इस विवाद को लेकर ऑल्ट न्यूज़ नाम की फेक न्यूज़ को पकड़ने वाली साईट ने फैक्ट चेक पेश की जिसमें दिखाया गया कि प्रियंका ने क्रॉस नहीं बल्कि लॉकेट पहना हुआ है. मीडिया का यह बचाव बेहद बचकाना है. क्या मात्र लॉकेट पहन लेने से प्रियंका गांधी इसाई हो गईं. फिर उसका क्या जब वह मंदिर के दर्शन कर रही हैं. उस समय क्या हैं वह? हिन्दू या इसाई? ऐसे मामलों में समझदार मीडिया को चाहिए कि वह इस बात का बचाव बिलकुल नहीं करें बल्कि सीना ठोक कर प्रियंका जैसे नेताओं को कहना चाहिए कि हाँ मैं क्रॉस पहनती हूँ तो इसमें हर्ज क्या है? हाँ मैं मुसलमान हूँ तो इसमें नुकसान क्या है? हाँ मैं पारसी हूँ तो इसमें हानि क्या है?

मुझे लगता है कि एक बार ऐसा करने के बाद ट्रोल सेना का यह हथियार उन पर ही भारी पड़ जाएगा.

फासिज़्म संविधान विरोधी

फासिज़्म किसी भी देश के संविधान की आत्मा के विरुद्ध होता है. यह फासिज्म का स्वभाव है कि उसमें कानून और संविधान की इज्ज़त का कोई अंश नहीं होता. वह संविधान के खिलाफ होता है. यही अब इस देश में हो रहा है. यहाँ संविधान के विरुद्ध हरकतें की जा रही हैं. हिन्दू को मुसलमान और मुसलमान को हिन्दू बनाया जा रहा है. यहाँ अपने ही देशवासियों को अपनाने का लोगों में जज्बा घट रहा है.

यही कारण है कि भारत की प्रबुद्ध जनता भाजपा को सत्ता से उखाड़ना चाहती है. इन्हें खतरा है कि कहीं यह संविधान न बदल दे और फिर जिस तरह से सरकारी प्रतिष्ठानों का निजीकरण करके आरक्षण ख़त्म किया जा रहा है उसी तरह से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए चुनाव के आरक्षित सीटों को ही ख़त्म कर दिया जाए. यह सभव भी है. जब संविधान ही नहीं रहेगा तो इसमें दिए अधिकार कैसे रह पाएंगे?

मुसलमानों का ‘आइए मस्जिद दर्शन कीजिए’ कार्यक्रम

जहाँ एक ओर एक विशेष पार्टी के लोग राहुल गांधी और अन्य के मंदिर दर्शन का उपहास उड़ा रहे हैं वही दूसरी ओर मुसलमानों ने कई शहरों में एक कार्यक्रम शुरू किया है जिसमें वह गैर मुसलामानों को अपने मस्जिद का दर्शन कराना शुरू किया है. ऐसा ही एक कार्यक्रम चलाने वाले तबरेज़ कहते हैं इसका उद्देश्य यह है कि लोगों को बताया जाया कि मस्जिद का दरवाज़ा किसी भी धर्म के लिए खुला है और अल्लाह के घर में सबका स्वागत है.

यह एक पार्टी विशेष के कार्यकर्ताओं की उस सोच के बिलकुल विपरीत है जो हिन्दुओं के मंदिर दर्शन का ही उपहास उड़ाया जाता है. इसका सीधा मतलब यही है कि मंदिर ईश्वर की उपासना की जगह होने के बजाए किसी विशेष व्यक्ति या समूह का अड्डा है. यह हिंदुत्व की उस आत्मा के विरुद्ध है जिसमें सभी धर्मों को समाहित करने का गुण है. इस्लाम का सूफी संत हिंदुत्व से बहुत प्रेरित है लेकिन हिंदुत्व के ठेकेदारों ने अब इन्हें भी निशाना बनाना शुरू कर दिया है. अजमेर दरगाह में बम ब्लास्ट इसका स्पष्ट उदाहरण है.

नेताओं की गलत परिपाटी

नेता चाहे वह योगेन्द्र यादव जैसे किसान नेता हों, चाहे वह इंदिरा गांधी, राहुल गांधी हों या नई नई राजनीति में आईं प्रियंका गांधी जब उनपर मुसलमान या इसाई होने का आरोप लगता है तो वह इसका बचाव करते हैं जो गलत हैं. उन्हें अपना यह बचाव करने के बजाय कि वह हिन्दू हैं मुसलमान या इसाई नहीं, उन्हें यह कहना चाहिए कि अगर वह मुसलमान भी हैं या इसाई भी हैं तो इससे क्या फ़र्क पड़ता है. क्या मुसलमान होना या इसाई होना इस देश में अपराध है.

हिंदूवादी नेताओं के घर मुसलमान और इसाई 

यही बात उन हिंदूवादी नेताओं पर लागू नहीं होता जिनके घरो में मुसलमान दामाद हैं. उदाहरण के लिए, भाजपा के कद्दावर और फायरब्रांड नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी की बेटी सुहासिनी हैदर के पति मुसलमान हैं. आडवाणी की भतीजी, शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे की चचेरी बहन के पति मुसलमान हैं,

अभी हाल में ही, राष्ट्री य स्वियंसेवक संघ (आरएसएस) के पूर्व प्रचाकर व बीजेपी के संगठन महामंत्री रामलाल की भतीजी श्रेया गुप्ता ने अपने मुस्लिम दोस्त फैजान करीम से शादी की है।

हालांकि यह एक तरफा नहीं है. एनसीपी के नेता फारुख अब्दुल्ला के दामाद सचिन पायलट हैं. इसी तरह मुख़्तार अब्बास नक़वी, शाहनवाज़ हुसैन की पत्नियाँ भी हिन्दू हैं.

(ये लेखक के अपने विचार हैं.)

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