सत्ता का जिहाद




कोलकाता में CAA के विरोध में सड़क पर प्रदर्शन करते लोग (साभार:सोशल मीडिया)

समीर भारती

पहले आदिवासी, फिर दलित, फिर किसान, फिर मुसलमान, दमन जारी है और दमन जारी रहेगा. जब सत्ता किसी कारण अयोग्य लोगों के हाथों आता है तो यही होता है. पहले इनका कोई नेता जेएनयू में कंडोम गिन रहा था आज इनकी वित्त मंत्री जिन्होंने एक दिन कहा था कि उनकी चमड़ी राहुल गांधी की तरह चिकनी नहीं और वह आम आदमी हैं आज जामिया और अलिगढ़ में जिहादी तलाश रही हैं. यह भूल गईं कि इनकी पार्टी में ही नाथू राम गोडसे नाम के जिहादी के भक्त मौजूद हैं. मैं यहाँ साफ़ कर दूं कि मेरे लिए जिहादी वह हैं जो पीस प्रोसेस में व्यवधान डालें. जो व्यक्ति और देश के विकास में बाधा उत्पन्न करे. जो इंसानियत को शर्मसार करे. मेरे लिए जिहादी भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस नहीं. मेरे लिए जिहादी गोडसे था और कुछ जिहादी दुर्भाग्य से अभी संसद की शोभा बढ़ा रहे हैं वह हैं. और यह शब्द एक गाली है. यह वह मूल शब्द नहीं जो सच के रखवालों के लिए इस्तेमाल होता था.

मेरे लिए जिहादी आज की सत्ता है. सत्ता का जिहाद यह है कि वह किसी तरह से विद्यार्थियों को पढने से रोके. आदिवासियों को पूंजीपतियों के रास्ते का रोड़ा बनने से रोके. दलितों को अछूतवाद के कलंक से निकलने के लिए रोके. मुसलमानों और ईसाईयों को इस देश का शहरी बने रहने से रोके.

यूनिवर्सिटी की फ़ीस बढ़ोतरी विद्यार्थियों को पढ़ने से रोकने के लिए सत्ता का जिहाद था. किसानों को कुछ बुनियादी सुविधाओं से भी महरूम कर देना सत्ता का जिहाद है. दलितों और ओबीसी को बाबा साहब आंबेडकर ने आरक्षण देने का वादा संविधान में किया था उससे वंचित करना सत्ता का जिहाद है. मुसलामानों को दोयम दर्जे का शहरी बनाने का प्रयास करना सत्ता का जिहाद है. इस जिहाद के लिए गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में जो संघर्ष किया था वही संघर्ष यह लोग आज गांधी के अपने देश में कर रहे हैं. वही संघर्ष पूरी जिंदगी दक्षिण अफ्रीका में गांधी के तरीके से नेल्सन मंडेला ने किया और वह इतिहास में अमर हो गए. दमनकारियों को आज दक्षिण अफ्रीका में कोई याद नहीं करता. वहां के गोरे भी उन्हें भूल गए. इन्हें भी देश कभी याद नहीं रखेगा.

CAA और NRC सत्ता का वह जिहाद है जिसके लिए देश का हर नागरिक चिंतित है. मीडिया चाहे कुछ भी दिखाए सत्ता के इस बेहूदा जिहाद के खिलाफ जो लोग पहले पायदान पर संघर्षरत हैं वह केवल मुसलमान कदापि नहीं हैं. वहां इस देश का इन्फॉर्मड (informed) नागरिक मौजूद है जो जानता है कि इसके बाद क्या होगा. उसे चिंता है कि NRC में दलित कहाँ से अपने दादा का खतिहान लाएंगे. कितने दलितों के दादा के पास ज़मीनें थीं. कितने आदिवासी के पास कितने कागज़ात हैं.

ऐसा ही सत्ता का एक जिहाद नोटबंदी था जिसमें मैंने कई गरीबों के मुंह से सुना कि मोदी जी ने बहुत अच्छा किया. अब सब ‘अमीरवन’ का हेकड़ी निकलेगा. हुआ क्या? नोटबंदी में सबसे ज़्यादा जो प्रभावित हुए वह ग्रामीण, प्रवासी मज़दूर और आदिवासी हुए जिनकी सालों की पूँजी डूब गयी. मेरा एक रुपया बर्बाद नहीं हुआ. मैं आराम से डिजिटल पेमेंट के माध्यम से अपनी ज़रूरत पूरी करता रहा. बिगबास्केट, ग्रोफेर नाम की कंपनियां मेरे यहाँ शान के साथ सब्जियां भी पहुंचती रही. उस नोटबंदी में लगभग 100 लोगों की दर्दनाक मौतें हुईं और जुमलेबाज़ ने फिर से अपने वचन को जुमला में बदल दिया. ट्विटर हर नोटबंदी के हर वर्षगाँठ पर #आओ_मोदी_चौराहे_पर ट्रेंड का तमाशा दिखाता रहा लेकिन मोदी चौराहे पर कभी नहीं आए. गुजरात दंगे की तरह ही उनहोंने देश से माफ़ी मांगने का भी साहस नहीं किया. साहस जिम में सीना फूला लेना नहीं होता. साहस के लिए ईमानदार होना पहली शर्त है.

CAA और NRC के नाम पर अब जो सत्ता का जिहादी तांडव चल रहा है वह तब तक नहीं थमेगा जब तक ब्रिटिश रुपी सत्ता अपने कानून वापस न ले ले. इतिहास गवाह है कि विद्यार्थियों ने जिस आंदोलन को शुरू किया वह हमेशा अपने उदेश्य में सफल हुआ.

मीडिया के भ्रम में न रहे कि यह आंदोलन केवल जामिया और अलीगढ में हो रहा है. और न ही इस भ्रम में रहें कि यह आंदोलन सिर्फ मुसलमान कर रहे हैं. इस आंदोलन में वह सब शामिल हैं जिन्हें इस देश को बर्बाद होने से बचाना है. इस देश की अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाना है. इस देश की शिक्षा व्यवस्था को फिर से बहाल करना है. इस देश की शासन व्यवस्था को फिर से बहाल करना है. इस देश की विदेश नीतियों को फिर से मज़बूत करना है.

सत्ता के जिहाद के आगे कभी कोई देश नहीं झुका है. क्योंकि सत्ता देश नहीं वह अस्थायी और बस सेवक होता है. और सेवक कभी भी बदले जा सकते हैं.

(समीर भारती स्वतंत्र पत्रकार हैं. इनका यह लेख इनका अपना मत है.)

 

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