कश्मीर आज सब से बुरे दौर में




कश्मीर के सड़कों पर सुरक्षाकर्मी (फ़ोटो क्रेडिट: AFP)

-चक्रवर्ती ए प्रियदर्शी

 

किसी भी स्टेट की सैनिक सत्ता दुनिया भर में आतंकवादी से कड़ाई से (दमन से) पेश आती है। परन्तु नागरिकों को आत्मनिर्णय का हक देती है। मानव अधिकार देती है। यहां तो जनता के हक को ही छीन लिया गया है। राज्य का दर्जा तक समाप्त कर दिया गया है।

राज्य को दो भागों में विभाजित कर, जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त कर, लद्दाख को सीधे केंद्र के हाथों में लेकर, और जे एन के को केंद्र शासित (विधानसभा सहित) राज्य के दर्जे में लाकर, कश्मीर की स्वायत्तता को समाप्त कर दिया गया।

प्रधानमंत्री ने 8 अगस्त को इस के समर्थन में देश को संबोधित किया। उनके अनुसार जम्मू और कश्मीर में विकास की लड़ी लग जाने वाली है। पर्यटन और सिनेमा उद्योग के द्वारा कश्मीर के लोगो के लिए रोजगार के अवसर या तोहफों का अंबार लग जाने वाला है। यह वादा या घोषणा की फेहरिस्त थी। ऐसा ही दावा पड़ोसी देश चीन तिब्बत के लिए करता है। फर्क यह है कि चीन ने जबरन तिब्बत को अपने मे मिलाया था। और तिब्बत की दलाई लामा की सरकार को निर्वासित सरकार चलाना पड़ रहा है। दलाई लामा को बिना भूमि की सरकार के रूप में भारत ने मान्यता दे रखा है। और यह सरकार भारत में शरणागत है।

जबकि कश्मीर अपनी मर्जी के साथ अक्टूबर 1947 में भारत में मिला था। कश्मीर ने पाकिस्तानी घुसपैठियों से बचाव में भारत में विलय की पेशकश स्वीकार की थी। तीन राजवाड़ों जूनागढ़, हैदराबाद निज़ाम और जम्मू कश्मीर ने भी भले ही उसी दस्तावेज (instrument of accession) विलय पत्र पर दस्तखत किया था। परन्तु उन तीनों की इस स्थिति तक आने के बीच में पाकिस्तान में विलय का विकल्प भी उनके पास था। भारत में कश्मीर का विलय कूटनीतिक (डिप्लोमेटिक) सफलता थी।

इसलिए इन बातों को याद दिलाये बगैर, या आम आदमी को यह विशिष्ट स्थिति समझाए बगैर भाजपा ने बलात जम्मू कश्मीर की स्थिति बदल दी है। कश्मीर भारत का अपरिहार्य (इंटीग्रल) अंग है यह इजाजत नहीं देता कि कश्मीर ने जो स्वायत्तता या विशिष्ट स्थिति बनाई थी, उसे नष्ट कर दिया जाय। इसलिए यह समझना मुश्किल नहीं कि इसके आवश्यक दुष्परिणाम होंगे ही।

आज भी, कश्मीर के सन्दर्भ में एकतंत्र का अगला कदम चल कर भारत का मौजूदा शासक शायद ही यह भूल पाए कि एक पक्ष पाकिस्तान को बना दिया गया था और उसका भूत एक नंगी और अदृश्य तलवार की तरह आज भी खड़ा है। आगे विश्व कूटनीति में इस स्थिति की चुनौतियां सामने रहने वाली हैं।

भारत के स्टेट्समैन सरीखे नागरिक नेता (जयप्रकाश नारायण इत्यादि) ने ज्यादा स्वायतता के साथ जम्मू और कश्मीर प्रांत की वकालत उस समय भी जारी रखी थी, जब कांग्रेसी केंद्र सरकारों ने कश्मीर में एकतंत्रवादी (authoritative) रुख अपनाना शुरू कर दिया था। बाद में कश्मीर की अपनी विशिष्ट स्वायत्तता को मात देने के लिए कश्मीर के प्रति केंद्र का रुख आम चुनावों को सेना के हाथो नियंत्रित कर कठपुतली सरकार बनाने का होता था। इन सरकारों को भी केंद्र शासन खास चलने नहीं देते थे, और राष्ट्रपति शासन लाद कर दिल्ली के राज्यपाल के हाथो कठपुतली शासन चलाते थे। (इन्हीं परिस्थितियों में कश्मीर में 1991 के बाद एक नागरिक संवाद टीम में रहकर घूमते समय हर स्तर के लोगो की आम राय का अंदाजा लेखक को मिला था, कि मोरारजी देसाई शासन 1977-1980 के दौर का कश्मीर का चुनाव मुक्त और ईमानदार था।)

भारत में राष्ट्र निर्माण की जारी प्रक्रिया और इसके बकाया कामों में राज्यों की स्वायत्तता और अधिक स्वायत्तता की मांगे हर उन नेताओं की मांग में शामिल है, जो नेता स्टेट्समैन माने जाते थे।

अन्य प्रांतों के लिए यानी हमारे लिए यह रास्ता अभी भी है कि ज्यादा स्वायत्त राज्यों की मांग हम भी करते रहते हैं। राज्यों को दायित्व अधिक दिए गए हैं, उनकी ताकत या स्वायत्तता कम है। निश्चय ही हमारी मांग और संघर्ष शांतिमय तरीके से जारी रहती हैं। इसलिए इसकी दिशा में अलगाववादी या अतंकवादी होने की गुंजाइश कम रहती है।

किसी भी स्टेट की सैनिक सत्ता दुनिया भर में आतंकवादी से कड़ाई से (दमन से) पेश आती है। परन्तु नागरिकों को आत्मनिर्णय का हक देती है। मानव अधिकार देती है। यहां तो जनता के हक को ही छीन लिया गया है। राज्य का दर्जा तक समाप्त कर दिया गया है।

जम्मू कश्मीर को जो स्वायत्तता इतिहास ने दी थी, यह बहुत बड़ा प्रोत्साहन था। इस वजह से कश्मीर की अवाम ने भारत के विकल्प को चुना था। शांतिमय तरीके से हम भारतीय यह भूमिका लेते रहे थे, कि कश्मीर हमारे साथ रहे। और जो हमारे लोग दंभ के साथ जो कश्मीर को लेकर राष्ट्रीय एकता की जो बात करते हैं उन्हें समझाना भी शांतिमय तरीके से जारी था।

राष्ट्रीय एकता की एकल धारणा की वजह से भारत की सहिष्णुता और विविधता को खतरा है। राष्ट्रीय एकता जिस तरह से वैचारिक अभियान था, भारत की विविधता की कल्पना भी आकर्षक और प्रगतिशील वैचारिक अभियान ही है। इसका शानदार इतिहास है । विविधता की संस्कृति कभी कमजोर ना हो जाए। इसकी जुगत हमेशा करनी होगी। हम कश्मीरी जनता के आत्मनिर्णय के अधिकार (justify to self determination) का समर्थन करने में भी बंट जाते हैं। विरोध करने में भी हम विभाजित हो जाते हैं, और भूल जाते हैं कि पूरी दुनिया में इसे समुदायों का नैसर्गिक (natural) अधिकार माना जाता है।

गत शाम (8 अगस्त को) रेडियो, टीवी से बोलते हुए नरेंद्र मोदी ने बिल्लियों के झगड़े में बंदर के न्याय की वकालत की है। कश्मीर के जन मन पर हमला किया है। और जहां कहीं भी डेमोक्रेटिक चेतना बची है, उन पर हमला किया है।

असमान समानता (inequal equality) का सिद्धांत देते हुए लोग भारत में राष्ट्रवाद कि अधूरी उद्घोषणा को अट्टहास और ख़ुशी के साथ जाहिर कर सकते हैं। पर इसके अपरिहार्य बुरे परिणाम आएंगे।

धारा 35A खत्म होते ही कश्मीर के खेत और जमीन पर उनका अपना संरक्षण या विशेषाधिकार खत्म हो जाएगा। अमित शाह ने राज्य सभा में कहा कि कश्मीर की जमीन को होटल वाले, पूंजी वाले खरीद सकेंगे। अमित शाह या खुद नरेंद्र मोदी ने भी पूंजी के प्रवाह का तर्क देकर कश्मीर को पूंजी वाद से सीधा जोड़ा दिया है। परन्तु बहुत सारी पूंजी का समर्थन देने का यह तर्क किसी क्षेत्र के विकास का तर्क नहीं हो सकता। यह विषमता का तर्क होगा। जहां अपनी ही जमीन पर, आप ऑटो वाले, होटल के बेरा, घोड़ा वाले, गार्ड, टूरिस्ट गाइड हो कर रह जाएंगे। जो लोग जमीन बेचेंगे वे थोड़ा पूंजी पाएंगे। उनमें से थोड़े लोग अपनी दुकान सजाएंगे, या कहीं जमीन के पैसे के आधार पर पूंजी व्यापार में सेकेंड पार्टनर बन जाएंगे।

हम और आप सभी इस तरह के विकास का दंश झेलते रहे हैं। यह सब करने का यह क्या तरीका हुआ? क्या आप भलाई लाद रहे हैं! निश्चय ही कोई भी सूबा रोजगार के लिए, विकास के लिए, सड़कों के लिए, रेल या हवाई अड्डों के लिए, अपनी प्राकृतिक अक्षुणता के लिए नरेंद्र मोदी के आकर्षक भाषण से प्रेरित होकर अपने राज्य के दर्जा को गंवाना स्वीकार नहीं करेगा।

आप स्वायत्ता समाप्त कर कश्मीर को मुख्य धारा में लाने का तर्क दे रहे हैं। और अपने में मुकम्मल इतिहास और ज्योग्राफी वाले जन प्रदेश को केंद्र शासित प्रदेश के दर्जे पर, यानी दोयम दर्जे पर धकेल रहे हैं। क्या यह सब समरूपता या एकरूपता का नारा भारत की रंग बिरंगी विविधता को चुनौती नहीं? इस तरह असमानता पर आधारित राष्ट्रीय एकता, हमारी सनातन विविधता पर हमलां है। (नेशनल यूनिटी इस द थ्रेट टू डायवर्सिटी)

इस सप्ताह 5 अगस्त को राज्य सभा की बहस के बाद और सरकार के प्रस्ताव के विरोध में जितने मत थे उससे दोगुने मत समर्थन में थे। यह दुखांत नाटक ही था कि नेहरू और पटेल के बारे में संदर्भ विहीन बात आती रही। इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन के तहत भारत के सवा पांच सौ रजवाड़े मिला लिए गए थे। Jammu & Kashmir अलग रह गया था। इन सब कामों में आई सी एस अधिकारी की जगह नीचे पद से पदोन्नत मलयाली वी पी मेनन ही सरदार के प्रतिनिधि बनते थे। सभी जगहों की तरह मेनन को ही विलय पट्टा पर दस्तखत लेने को राजा हरि सिंह के पास भेजा गया था। यह शुरू से अन्य रजवाड़ों से भिन्न विलय था। कश्मीर अन्य रजवाड़ों के मुकाबले अलग देश रहा ही था। यह तो पाकिस्तान और भारत के बॉर्डर पर एक स्वतंत्र देश था।

आज़ाद भारत में 15 अगस्त को भारत के जिस नक्शे पर तिरंगा फहराया गया था, उस में हमारे माथे पर कश्मीर नहीं था। यह तो अपनी परिस्थिति की वजह से और अपनी मर्जी से बाद मे भारत में आया था। पर सभी लोग कहते हैं, कि कांग्रेस की अधिसत्ता या ऑटॉक्रिसी से कश्मीर में घाव बनाने शुरू हो गए थे। इस तरह जो राजा हरि सिंह और शेख अब्दुल्ला के प्रस्ताव से एकजुट मानस बना था , वह टूटता गया।

कश्मीर के विलय का सवाल पहले पहल तभी आया था, जब पाकिस्तान से मुस्लिम कबीलाई, पाक सेना के बल पर घुस आए। तब राजा हरि सिंह के आग्रह पर भारतीय सेना ने कश्मीर बचाया। राजा हरि सिंह ने विलय के उसी मजमून पर दस्तखत किया। इससे नेहरू अलग, पटेल अलग नहीं हो जाते। और पटेल के प्रतिनिधि मेनन ही राजा हरी सिंह का दस्तखत लेकर आए थे। भारत के इस नक्शे के बनने में लौह पुरुष सरदार पटेल और उस समय भारत के जनतांत्रिक चेतना के वाहक नेहरू को अलग दिखाने की कोशिश निन्दा का पात्र है।

अब तो कश्मीर पर शिमला समझौता, ताशकंद समझौता हो चुका है। यह लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी के हाथो हो चुका है।

लोकसभा ने भी दिन भर की चर्चा के बाद क्रमशः 351 मतों से धारा 370 के कुछ प्रावधानों को समाप्त कर दिया। इसी तरह 370 मत राज्य पुनर्गठन बिल के पक्ष में थे।

मंगलवार को लोकसभा की चर्चा में ऊधमपुर के भाजपा एमपी राजेन्द्र जायसवाल यह कह रहे थे कि कांग्रेस ने दो दफा, शेख अब्दुल्ला और फारुख अब्दुल्ला को गैर जनतांत्रिक तरीके से हटाया, इमरजेंसी लगाने के लिए रात का समय चुना। इस तरह से कांग्रेस परंपरा की अधिसत्ता की मिसाल देकर क्या आपको जनतांत्रिक प्रक्रिया पर बोलने का हक है? नहीं। आप कांग्रेस के विरुद्ध शासन में आए हैं। तब कांग्रेस का नाम लेकर आपको गैर जनतांत्रिक होने का हक है क्या?

इसका जश्न मेरे कुछ नजदीकी लोग भी मना रहे हैं। इसलिए कि उन्हें इस नारे के अधूरेपन का ज्ञान नहीं कि, “कश्मीर भारत का है।” निश्चय ही यह बात अधूरी है, तब तक जब तक लोग इसके साथ यह बराबरी का दर्जा नहीं स्वीकार करते कि कश्मीर के लोग और इसकी चौहद्दी दोनों ही हमारी है, यानी भारत की है। पर जनता के एक हिस्से से, दंभ के साथ, यह चुनौती दी गई है। (मुझे यह भी याद आता है कि कश्मीर के मसले पर मुझे सुझाव दिया गया था कि, गांव देहात की परिस्थितियों पर बोलना सीमित रखूं, परन्तु कश्मीर पर कभी नहीं बोलूं। कश्मीर पर इसके स्टेक होल्डर्स को बोलने दूं। पर आज वे सभी लोग आगे बढ़ कर कश्मीर पर बोल रहे हैं।)

कश्मीर भारत का तो है ही, कश्मीरी पंडितो का है, कश्मीरी मुसलमानों का है, शिया और सुन्नी का है, बौद्धों का है, सीमा के पास (एल ओ सी) के कारगिल, खैबर, उरी का है। लद्दाख का भी है, जम्मू के लोगों का भी है। कश्मीर बारामूला, सोपोर, पट्टन, गंदरबल, श्रीनगर का है। कश्मीर के अल्पसंख्यकों का भी उतना ही जनतांत्रिक अधिकार है जितना बहुसंख्यक मुसलमानों का है।

मैंने ऊपर बताए स्थानों में लद्दाख को छोड़ कर सभी स्थानों की यात्रा सन 1991 और उसके बाद के सालों में की है। अन्तिम यात्रा मैंने सन 2014 में की है। कई भिन्न परिस्थितियों में मैं कश्मीर गया हूं। कर्फ्यू में घुमा हूं।

कश्मीर के अलग अलग इलाके के आवाम में मसलों के प्रति भिन्न नजरिया है। कांग्रेस या फारुख परिवार के प्रति लोगों की शिकायतों का विवरण मेरे सामने आया है। वी पी सिंह ने कांग्रेस खेमे के बदनाम नुमाइंदे जगनमोहन को जब कश्मीर का राज्यपाल बनाया था, तब उनकी कड़ाई से घाटी की स्थिति बदल गई थी। उनहोंने सांप्रदायिक कार्ड भी खूब खेला था। तब मैं कश्मीर संवाद वाहिनी के टीम में श्रीनगर, बारामूला, उरी गया था। स्थिति सामान्य नहीं थे। कर्फ्यू पास के साथ हम घूमते थे। सेना के नियंत्रण के इलाके में घूमे थे। आज उन सूत्रों को जोड़ने का वक़्त नहीं है।

कश्मीर पर जे पी या तारकुंडे या वाहिनी फार्मूला हिंसा के सहारे, या दमन के सहारे पर नहीं, राजनीति के आधार पर और जनमत के आधार पर थी। इसी तरह से अन्य नागरिक फार्मूला या प्रस्ताव थे जिसके इर्द गिर्द कश्मीर मसले पर बात चीत होती थी और इनका राष्ट्रीय महत्व भी बनता था लेकिन धीरे धीरे इन राजनैतिक जनतान्त्रिक और नागरिक प्रस्तावों का महत्व समाप्त होता चला गया।

1977-1980 में आए सुधार के बाद दोबारा जब कश्मीर का जनतान्त्रिक वातावरण कमजोर पड़ने लगा तब वहां भूमिगत अलगाववादी संगठनों का महत्व बढ़ गया था और 1990 तक आते आते उनके सिनेमा बंदी जैसा फरमान पूरी घाटी पर पूरी तरह से लागू होने लगा था। उस परिस्थिति में राज्यपाल बनने के बाद जगमोहन ने अपने टीम के साथ पूरो घाटी में दमन, कर्फ्यू और सांप्रदायिक विभाजनों के कार्ड का खुल कर उपयोग किया। उसके पहले कश्मीर में आतंकवादी कही जानी वाली हिंसा ने कभी सांप्रदायिक कार्ड नहीं खेला था। इसीलिए कश्मीरी मुस्लिम अवाम की भी तब यह मुक्कम्मल धारणा थी कि कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़ने की कोई मजबूरी नही। इन्हीं परिस्थितियों में धीरे धीरे कश्मीर में जब जनतान्त्रिक परिवेश कमजोर पड़ गया तब कश्मीर तीन स्टेक होल्डरों के बीच रह गया। एक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप, पाकिस्तान आधारित घुसपैठिए दूसरा कश्मीर के अतिवादी अलगाववादी हिंसक संगठन और तीसरा इन दोनों को एक तरह से हवा देने वाली भारत सरकार की AFSPA, सेना और अर्द्ध सैनिक बल। आज कश्मीर की अवाम को ही इसका स्टेक होल्डर होने से वंचित कर दिया गया।

कई बुरे दिनों में कश्मीर को देखने की कोशिश में मैं यही देख पाता हूं, कि कश्मीर आज उन सब से बुरे दौर में है।

 

(चक्रवर्ती ए प्रियदर्शी जाने माने लेखक, पत्रकार और सामाजिक और राजनीतिक कर्मी हैं। उपरोक्त विचार उनके निजी हैं उनके अनुभवों को परिलक्षित करते हैं।)

 

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