हिंदी साहित्य में अपने हिस्से का उजाला लेकर बहुत दूर चली गईं कृष्णा सोबती उर्फ़ हशमत




लेखिका और उपन्यासकार कृष्णा सोबती का आज दिल्ली में निधन हो गया (फ़ोटो साभार: विकिपीडिया)

प्रख्यात हिंदी साहित्यकार, साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ से पुरस्कृत और ज़िंदगीनामा से शोहरत पाने वाली कृष्णा सोबती का देहांत दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में शुक्रवार की सुबह हो गया. वह 94 साल की थीं.

वह हिंदी साहित्य के उन महिला सितारों में थीं जिन्होंने तब लिखना शुरू किया था जब लेखन पुरुष प्रधान हुआ करता था. मित्रो मरजानी और जिंदगीनामा उनकी दो बेहद चर्चित उपन्यास रहे. उनके उपन्यास मित्रो मरजानी में एक अलग तरह की इस्मत चुगतई का एहसास होता है. विवाहिता की निर्लज्ज कामुकता को दर्शाता हुआ यह उपन्यास उस समय की मर्दवादी समाज पर एक तरह का ज़ोरदार प्रहार था.

छद्मनाम हशमत

कृष्णा ने छद्मनाम हशमत से भी अपनी कुछ कृतियाँ लिखीं. सोबती का यह छद्मनाम पुरुष का था. सोबती ने अपने पुरुष छद्मनाम से कई छोटे छोटे प्रोफाइल और कालम लिखे जिसे ‘हम हशमत’ के नाम से प्रकाशित किया गया. जब उनसे पूछा गया कि उन्हें आखिर अपने पुरुष छद्मनाम की ज़रूरत क्यों पड़ी तो उनहोंने कहा “हम दोनों की ही अलग पहचान है. मैं छिपाती हूँ वह उजागर करता है. मैं पुरानी हूँ वह नया नवेला है, हम दोनों ही अलग दिशाओं से अपना काम करते हैं.”



सोबती का जन्म अविभाजित भारत के गुजरात में 18 फ़रवरी, 1925 को हुआ था. आज वह गुजरात पाकिस्तान में है. पढाई दिल्ली और शिमला में हुई. 1980 में जिंदगीनामा के लिए साहित्य अकादमी अवार्ड मिला. फिर 1996 में अकादमी का सर्वोच्च्य सम्मान साहित्य अकादमी फ़ेलोशिप मिला. 2017 में साहित्य में उनके योगदान के लिए उन्हें ज्ञानपीठ अवार्ड से नवाज़ा गया.

सोबती की लेखनी में पंजाबी, उर्दू और राजस्थानी बोली का अंश पाया जाता है. उनके लेखन में औरतों की कामुकता को लेकर बेबाकी भी खूब मिलती है. ऐसा कहा जाता है कि उनकी कोई ऐसी कहानी नहीं होगी जिसमें सेक्स का कोई दृश्य न हो. साहित्य का सफ़र उनहोंने अपनी छोटी कहानियां लिखने से की थी. उनकी दो कहानियां लामा (बौद्ध संत पर) और नफ़ीसा (मुस्लिम महिला पर) 1944 में प्रकाशित हुई.

2018 में उनका ऑटोबायोग्राफिकल नावेल ‘गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान’ रिलीज़ हुआ था. ‘सूरजमुखी अंधेरे के’, ‘दिलोदानिश’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ऐ लड़की’, ‘समय सरगम’, ‘जैनी मेहरबान सिंह’, ‘बादलों के घेरे’ उनके प्रसिद्ध उपन्यास रहे।

जिंदगीनामा और अमृता प्रीतम के साथ कानूनी लड़ाई

सोबती के चर्चित उपन्यास को लेकर एक अनोखी घटना है जो यह बताती है कि वह अपने काम को लेकर कितना सजग थीं. सोबती ने अपना पहला उपन्यास चन्ना के नाम से इलाहबाद के लीडर पब्लिकेशन को 1952 में भेजा था. किताब छप भी गयी. लेकिन जब किताब सोबती के पास पहुंची तो उनहोंने उसमें कई बदलाव देखे. उनके पंजाबी और उर्दू शब्दों को बदल कर संस्कृत में कर दिए गए थे. सोबती ने टेलीग्राम भेजकर प्रकाशक को पुस्तक के वितरण पर रोक लगवाई और सभी प्रकाशित प्रतियों का मूल्य चुकाकर उसे नष्ट करवाया. बाद में इसी पांडुलिपि को बदलकर राज कमल प्रकाशन भेजा जो जिंदगीनामा के नाम से छपा.

तभी, मशहूर कवियत्री और लेखिका अमृता प्रीतम ने भी अपना उपन्यास ‘हरदत्त दा जिंदगीनामा’ के नाम से लिखा. सोबती ने मिलते जुलते शीर्षक को लेकर अदालत में अमृता पर मुक़दमा किया. लंबी लड़ाई के बाद अमृता को आखिर जीत मिली.

पद्मभूषण लेने से इनकार और अवार्ड वापसी

2015 में, कृष्णा ने दादरी में दंगों को लेकर सरकारी निष्क्रियता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आघात और मोदी सरकार के एक मंत्री द्वारा हिंदी लेखकों के बारे में की गई टिप्पणियों का हवाला देते हुए साहित्य अकादमी से मिले पुरस्कार और फ़ेलोशिप दोनों लौटा दिए.

उन्हें 2010 में भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण की पेशकश की गई थी, जिसे यह कहते हुए उन्होंने मना कर दिया था कि, “एक लेखक के रूप में, मुझे सत्ता से दूरी बनाकर रखनी होगी। मुझे लगता है कि मैंने सही काम किया।”

जाना तो कृष्णा सोबती को एक दिन था ही लेकिन उनहोंने जितना लंबा जीवन को जिया उतना ही हिंदी साहित्य को भी जिंदादिल बनाया. आज उनके जाने से हिंदी साहित्य का एक भाग अँधेरा हो गया और वह सितारों में खो गयी. आज वह अपनी बौद्धिक विरासत के साथ हमें छोडकर दिल्ली में अग्नि में विलीन हो गईं.

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