कभी-कभी तो मिलता है लालू यादव जैसा किरदार : गोविंद नामदेव




गोविन्द नामदेव

-रीतू तोमर

नई दिल्ली, 7 सितंबर | अपनी बेहतरीन अदाकारी से किरदार में जान फूंकने में माहिर अभिनेता गोविंद नामदेव करियर और उम्र के इस पड़ाव में भी चुनौतीपूर्ण किरदारों को तवज्जो देना पसंद करते हैं। वह जल्द ही बड़े पर्दे पर फिल्म ‘दशहरा’ में लालू यादव के किरदार में दिखने वाले हैं, जिसे वह अपने करियर की सबसे चुनौतीपूर्ण भूमिका समझते हैं।

वर्ष 1990 के दशक में कुटिलता और धूर्तता का पर्याय बन चुके गोविंद फिल्म ‘दशहरा’ में लालू यादव के किरदार को लेकर खासे उत्साहित हैं। यह फिल्म बिहार की पृष्ठभूमि पर आधारित है। फिल्म में लालू का किरदार निभाने के बारे में पूछे जाने पर वह कहते हैं, “मैं इस फिल्म में एक बार फिर नकारात्मक किरदार में हूं। बिहार की परिदृश्य पर बनी इस फिल्म में मेरा किरदार लालू यादव से मिलता-जुलता है। यह कहना ठीक नहीं होगा कि यह किरदार पूरी तरह से लालू यादव से जुड़ा हुआ है लेकिन लालू और इस किरदार में काफी समानताएं हैं।”

उन्होंने कहा, “फिल्म में ‘चारा’ भी है, यानी इस तरह की परिस्थतियां हैं कि लोग अनुमान लगा लेंगे कि यह ‘लालू’ है। किरदार को सनसनीखेज रखने के लिए ऐसा किया गया है। वैसे, इस तरह का किरदार निभाने का मौका हमेशा नहीं मिलता।”

गोविंद पिछले 25 वर्षो से नकारात्मक भूमिकाएं करते आ रहे हैं। यह पूछने पर कि वह इस तरह के किरदारों में खुद को कितना फिट पाते हैं। इसके जवाब में गोविंद कहते हैं, “हिंदी सिनेमा में तीन ही किरदार मुख्य होते हैं, नायक, नायिका और खलनायक बाकी सब तो फिलर्स हैं। नायक, नायिका का किरदार नहीं कर सकता इसलिए खलनायक का किरदार पसंद हूं, क्योंकि इसमें करने को बहुत कुछ है। मैं वहीं फिल्में करता हूं, जिसमें मैं अपने किरदार में जान डाल सकूं। बड़ी फिल्मों में काम करने के लिए छोटी भूमिकाएं करना मुझे रास नहीं आता।”

समय के साथ सिनेमा में बदलाव आया है। एक्टिंग के तरीकों से लेकर फिल्मों की कहानियों में बदलाव देखने को मिला है। ऐसे में हिंदी सिनेमा में नकारात्मक किरदार कितना बदले हैं? गोविंद कहते हैं, “बहुत बदलाव आया है। वह दौर खत्म हो गया है, जब खलनायक का अपना स्टाइल होता था, जैसे शोले का गब्बर हो या फिर मिस्टर इंडिया का मोगैंबो। अब खलनायक आम आदमी जैसा ही है। उसका जीवन साधारण है, फिर भी वह तमाम गलत काम करता है तो यह कहना गलत नहीं होगा कि अब स्टारडम वाली खलनायकी खत्म हो गई है।”

उन्होंने बात आगे बढ़ाई, “फिल्मों का मिजाज भी तो बदला है। पहले निर्देशक एवं निर्माता छोटे शहरों में फिल्में शूट करने से डरते थे। अब तो हर दूसरी फिल्म छोटे शहरों पर बेस्ड है, फिर चाहे वह ‘अनारकली ऑफ आरा’ हो या ‘बरेली की बर्फी’। ऐसा ही बदलाव कलाकारों में देखने को मिल रहा है। आलिया भट्ट, वरुण धवन, राजकुमार राव बेहतरीन काम कर रहे हैं। ये लोग नेचुरल एक्टिंग करते हैं, इसलिए कम उम्र में इतने बड़े स्टार बन गए हैं।”

गोविंद के मन में सेंसर बोर्ड को लेकर भी खींझ है। वह बोर्ड के मनमाने रवैये को लेकर चिंतित हैं, इसलिए इसके होने या ना होने पर ही सवाल उठा रहे हैं। वह कहते हैं, “हमारे दौर में सेंसर बोर्ड चुपचाप बैठा रहता था, लेकिन बीते कुछ वर्षो में सेंसर बोर्ड की वजह से काफी विवाद हुआ। बोर्ड के नजरिए में बदलाव को समझने का सबसे बेहतर तरीका दोनों दौर में रिलीज हुई फिल्मों को देखना। अलबत्ता ‘बैंडिट क्वीन’ को देखिए। यह फिल्म शुरू ही गाली के साथ हुई थी। वह बच्ची फिल्म की शुरुआत में गाली देती है। पूरी फिल्म में गालियां भरी हुई हैं। इसकी वजह है, जिस पृष्ठभूमि पर फिल्म आधारित है, उस क्षेत्र विशेष के लोगों की बोलचाल की भाषा वैसी ही है। अगर इसमें से गालियां निकाल देते तो फिल्म बेकार हो जाती। उस दौर में सेंसर बोर्ड ने इस जरूरत को समझा और फिल्म को उसी रूप में रिलीज होने दिया। लेकिन क्या आप सोच सकते हैं कि ‘बैंडिट क्वीन’ आज के दौर में उस रूप में रिलीज हो पाती?” 

वह सरकार को भी बीच में लाते है, और कहते हैं, “यह एक क्रिएटिव फील्ड है। किसी फिल्म में गाली का इस्तेमाल होता है, मतलब साफ है कि फिल्म में उसकी जरूरत है। अगर उड़ता पंजाब से पंजाब हटा देंगे तो फिल्म क्या रह जाएगी? सेंसर बोर्ड को इसे समझने की जरूरत है। समझदार लोग बोर्ड में होने चाहिए, जो इसे समझे। यही वजह रही कि पहलाज निहलानी को हटाया गया। कोई भी निर्माता फिल्म में इतना पैसा समाज को बर्बाद करने के लिए नहीं लगाता। वह भी अपना दायित्व समझता है। यह भी सोचना पड़ेगा कि क्या वाकई सेंसर बर्ड की जरूरत है? अगर बच्चों को बिगड़ना ही है तो इंटरनेट पर ही तमाम तरह की चीजें हैं, जिनसे वे बिगड़ सकते हैं और बिगड़ रहे हैं। सरकार को इस तरफ ध्यान देने की जरूरत है।”

गोविंद नामदेव की अगले चार महीनों यानी सितंबर से दिसंबर के दौरान पांच फिल्में रिलीज हो रही हैं, जिनमें ‘जेडी’, ‘दशहरा’, ‘शादी में जरूर आना’, ‘कमिंग बैक डार्लिग’ और ‘झलकी’ हैं। इन सभी फिल्मों में गोविंद के अलग-अलग किरदार हैं।

देश की मौजूदा स्थिति को लेकर वह आशान्वित बने हुए हैं। हालांकि, उनकी कभी राजनीति में आने की तमन्ना नहीं है। वह कहते हैं, “जब मोदी सरकार सत्ता में आई थी, तो उनसे बहुत सी उम्मीदें थीं और उन्होंने उम्मीदों के अनुरूप काम भी किया और कर भी रहे हैं। उनकी सोच में कमी नहीं आई है। देश का दुनिया में नाम बढ़ा है। दूसरे देशों से हमें सम्मान मिल रहा है और इसका कारण मोदी ही हैं। हालांकि, हाल के कुछ महीनों में काफी चीजें बदली हैं और उम्मीद है कि आगे आने वाला समय अच्छा होगा।”

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