छत्तीसगढ़ में आदिवासी बच्चों को हिंसक संघर्ष में जूझना मजबूरी: नंदिनी सुंदर




नंदिनी सुंदर द मॉर्निंग क्रॉनिकल के शम्स खान के साथ बात-चीत करती हुई

नंदिनी सुंदर छत्तीसगढ़ ख़ास कर बस्तर का बहुत ही सुंदर, लोकप्रिय नाम है। साथ ही साथ, यह नाम विवादों से घिरा नाम भी है। नंदिनी सुन्दर दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में समाजशास्त्र पढ़ाती हैं। नंदिनी के पास देश और विदेश की ढेर सारी डिग्रीयां हैं। आपका जवाहर लाल नेहरु विश्व विद्यालय से भी संबंध रहा है। आप पत्रिकाओं और समाचारपत्रों में छपती रही हैं। आप अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2007 के नियमों का मसौदा तैयार करने वाली तकनीकी सहायता समूह की सदस्य भी रही हैं। साथ ही साथ पिछले योजना आयोग और एनसीईआरटी में भी आपने अपनी सेवा दी।

नंदिनी सुंदर ने सलवा जुडम को असंवैधानिक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आप पर माओवादी होने का आरोप भी लगा। नंदिनी शायद चंद में से एक या अकेली सामाजिक कार्यकर्त्ता होंगी जिनके पुतले छत्तीसगढ़ की पुलिस ने जलाए। पटना में चंद्रशेखर व्याख्यान के लिए आई नंदिनी सुंदर का साक्षात्कार द मॉर्निंग क्रॉनिकल के शम्स खान ने लिया। शम्स खान के साथ नंदिनी की बातचीत का प्रमुख अंश:

शम्स: आम तौर पर सामाजिक कार्यकर्ताओं के बारे में यह प्रचार किया जाता है कि सामाजिक कार्यकर्त्ता विकास विरोधी होते हैं, और इस तरह प्रचार करने वाली तंत्र इसमें बहुत हद तक कामयाब भी दिखती है। आप का क्या कहना है इस पर?


नंदिनी: यह तो बड़ा अजीब भ्रम लगता है। कौन सा विकास का प्रोजेक्ट है जिसमें लोगों का हित हो और सामाजिक कार्यकर्त्ता ने उसका विरोध किया है। एक भी ऐसे सामाजिक कार्यकर्त्ता का नाम बताइए जिसमें उन्होंने किसी ऐसे प्रोजेक्ट के विरोध में बात किया हो जिसमें आम जनता का हित हो। सामाजिक कार्यकर्त्ताओं ने उन्हीं परियोजनाओं का विरोध किया है जिनमें लोगों का हित नहीं है। सामाजिक कार्यकर्त्ताओं ने उन परियोजनाओं का विरोध किया है जिसमें बड़े पैमाने पर लोगों को विस्थापित होने की आशंका थी। उदाहरण के लिए आप सरदार सरोवर बाँध को ले लीजिए। आप विस्थापितों का डाटा देख लीजिए। इसके लाभ-हानि को देख लीजिए और फिर बताइए कि क्या सामाजिक कार्यकर्त्ता गलत हैं।

शम्स: आप लोगों (सामाजिक कार्यकर्ताओं) के बारे में यह कहा जाता है कि आप लोग (सामाजिक कार्यकर्त्ता) पाखंड करते हैं। पहले आपलोग अलग अलग बहाना बना कर एडवांस्ड टेक्नोलॉजिकल शिफ्ट की आलोचना करती हैं लेकिन बाद में खुद ही उसी चीज़ को अपनाती हैं। उदाहरण के लिए, कम्प्यूटराइजेशन, सूचना प्रौद्योगिकी इत्यादि। एक बार फिर बुलेट ट्रेन को ले कर आप लोग बहुत आक्रामक हैं। आप क्या कहेंगी?


नंदिनी: जैसा मैं ने कहा कि यह बहुत अजीब तरह का आरोप लगाया जाता है। दुनिया में जिन जिन लोगों ने बड़े अविष्कार किए हैं मैं मानती हूँ अधिकतर कहीं न कहीं समाज की भलाइयों से जुड़े रहे और उनमें अधिकतर लोग सामाजिक कार्यकर्त्ता थे। अल्बर्ट आइन्स्टाइन को ही ले लीजिए वह खुद एक बड़े पीस एक्टिविस्ट थे। कंप्यूटर के जनक कहे जाने वाले एलन टूरिंग को ले लीजिए वह कंप्यूटर वैज्ञानिक होने के साथ साथ सोशल एक्टिविस्ट (सामाजिक कार्यकर्त्ता) भी थे।

जहाँ तक बुलेट ट्रेन का प्रश्न है तो बुलेट ट्रेन की टेक्नोलॉजी आ रही है उस पर तो कोई कार्यकर्त्ता विरोध नहीं कर रहा है। लोगों का जो विरोध है वह यह है कि आप मौजूदा रेल तन्त्र को ठीक नहीं कर रहे हैं और एक नई चीज़ को विदेश से कर्ज़ ले कर ला रहे हैं। क्या हमारी रेल तन्त्र को बेहतर और सुरक्षित बनाने की आवश्यकता नहीं है।

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शम्स: आज का माओवादी आन्दोलन पूंजीवादी विरोधी (anti-capitalist) ज्यादा और सामंतवाद विरोधी (anti-feudal) कम है। आपको क्या लगता है कि भारत में नक्सल आन्दोलन अपना रूप बदल रहा है?


नंदिनी: आज सामंतवाद ने पूंजीवाद की जगह ले लिया है। नक्सल आन्दोलन का स्वरूप नहीं बदला।


शम्स: सरकारी मशीनरी आप पर लगातार आरोप लगाती रही है कि आप माओ को लेकर नरम हैं। मानव अधिकारों के नाम पर, आप और बेला भाटिया जैसों का माओवादियों से सांठ गाँठ रहा है। आपकी क्या प्रतिक्रिया है?


नंदिनी: आपको क्या लगता है? अभी मैंने आपको बोला कि कैपिटलिज्म की जो उनकी सोच है उसके खिलाफ मैं बोल रही हूँ। हर बार जब छत्तीसगढ़ का मैंने मामला उठाया है तो मैंने बोला है कि शांति वार्ता होनी चाहिए। दोनों तरफ की बंदूकें बंद होनी चाहिए। सरकार की अब इसमें कोई रुचि नहीं है कि माओवादी की लोग आलोचना करें न करें, उनका जो मुद्दा है वह यह कि सरकार की आलोचना न हो। अगर कोई सरकार के खिलाफ बोलता है तो सरकार उन्हें माओवादी, देशद्रोही, विकास विरोधी और क्या क्या गालियाँ देना शुरू कर देती है। सरकार की कोई रुचि नहीं है कि शांति वार्ता हो और समस्या सुलझे, वह बन्दूक के बल पर केवल जनता को मरोड़ना चाहती हैं, बड़ी बड़ी खनिज कंपनियां आ रही हैं और ये सभी आरोप लगाना उनकी लोगों को दिगभ्रमित करने के तरीक़े हैं।


शम्स: जहाँ जहाँ हिंसा हो रही है ख़ास कर छत्तीसगढ़ में मैंने देखा कि वहां बच्चे सबसे अधिक प्रभावित हैं। सरकार और माओवादी दोनों ही ओर से बच्चों को निशाना बनाया जाता है।


नंदिनी: वहां तो बच्चों का जीवन बहुत ही दर्द भरा है। वहां बच्चों के पास खेलने कूदने का समय कम है और लड़ने का समय ज़्यादा है। कहने का मतलब यह कि जैसा आपने कहा कि लड़ने के लिए उन्हें मजबूर किया जाता है। एक तो वहां पढ़ने के लिए स्कूल नहीं है। जब से सलवा जुड्म शुरू हुआ तो सिक्यूरिटी फ़ोर्स वहां जाकर स्कूलों में रहने लगे, माओवादी उन स्कूलों को ब्लास्ट करने लगे। उसके बाद लगभग 12 सालों से वहां स्कूल है ही नहीं। उनका बचपन ऐसी स्थिति में गुज़र रहा है जहां न स्कूल है, न राशन की दुकानें हैं, न आँगनबाड़ी है।


शम्स: इससे तो समस्या और बढ़ेगी?


नंदिनी: अभी तो वहां इसकी ज़रुरत है कि शान्ति वार्ता हो, जीवन सामान्य हो। हम लोगों ने बहुत कोशिश की थी। एक रिहैबिलिटेशन प्रोग्राम बनाया था। उसमें कोशिश थी कि सरकार के साथ मिलकर या कोर्ट के द्वारा कोई स्वतंत्र कमीशन बने जिसमें कोई रिटायर्ड जज की देख रेख में फिर से स्कूल स्थापित हों, अलग अलग गावों में प्राइमरी हेल्थ केयर सेंटर खुलें, लेकिन इन सबमें सरकार ने कोई रुचि नहीं दिखाई। बल्कि सरकार ने हमपर ही पूरा इलज़ाम थोप दिया।


शम्स: क्या आपको ऐसा लगता है कि छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के बीच कोई लोकतान्त्रिक राजनैतिक मंच का न होना अल्ट्रा लेफ्ट आन्दोलन के उभार का कारण है? उदाहरण के लिए, झारखण्ड में झारखंड मुक्ति मोर्चा एक वैकल्पिक राजनातिक मंच है जो उन्हें अपनी मांग को उठाने में मदद करती है लेकिन छत्तीसगढ़ में इस तरह की कोई राजनैतिक मंच नहीं है और जिसके कारण उन्हें हथियार उठाने पड़ते हैं।


नंदिनी: यह सच नहीं है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी पहले वहां बड़ी ताक़त थी लेकिन माओवादी के आने के बाद उनके कैडर माओवादियों के साथ चले गए क्योंकि वे गाँव में ज्यादा हावी थे उनको लगा कि माओवादियों के साथ रह कर उन्हें ज्यादा सुरक्षा मिलेगी। ज़मीन के बंटवारे में उन्हें लाभ मिलेगा। और सभी पार्टी चुनाव में लगभग माओवादियों के साथ हाथ मिलाते हैं। उदाहरण के लिए, 2013 के चुनाव के मौके पर भाजपा ने माओवादी के साथ सांठ गाँठ की थी। समाचारपत्रों में आया था कि धर्मेन्द्र चोपड़ा नाम के व्यक्ति थे जो भाजपा के टॉप ब्रास की माओवादियों से साठ-गाँठ करवाते थे। तो ऐसा नहीं है कि पार्टियों के अभाव में यह चल रहा है। सच कहें तो वहां सीपीआई एकलौती पार्टी है जो दोनों तरफ से दब रही है। पुलिस समझती है कि यह माओवादी हैं और माओवादी समझते हैं कि सीपीआई रिविश़निस्ट हो गयी है।


शम्स: इसका क्या कारण है कि लेफ्ट एक्सट्रीमीज़्म पूरी दुनिया में कम हो रहा है और भारत में इसका उभार हो रहा है?


नंदिनी: ऐसा नही है। अभी तो राईट एक्सट्रीमिज़्म का दौर चल रहा है। लेफ्ट एक्सट्रीमिज़्म का जो इतिहास है लैटिन अमेरिका में वह यह है कि वहां 50 के दशक में रेडिकल लेफ्ट मूवमेंट थे, फिर तानाशाही आई। वहां तानाशाह हुए। फिर जो एक्सट्रीम लेफ्ट मूवमेंट थे उन्होंने शांति वार्ता करके समझौता किया। अभी आप देखेंगे कि इसी साल, फ़ार्क (FARC) जो कोलंबिया का सबसे पुराना गुरिल्ला ग्रुप था वह ओवरग्राउंड हुआ है। हर का एक दौर होता है। बीच में एक नए तरह के लेफ्ट मूवमेंट्स भी आए थे लैटिन अमेरिका में। मुझे नहीं लगता है कि यह ख़त्म हुआ है। सबका एक दौरा होता है। मुझे लगता है कि इसके बाद कुछ नया आएगा।


शम्स: हाल के वर्षों में आदिवासियों और दलितों के अंदर एक बेचैनी पनपी है, समाजशास्त्री के तौर पर आप इसे किस तरह से देखती हैं?


नंदिनी: आदिवासियों और दलितों के मामले बिलकुल अलग हैं। उनकी समस्याएँ अलग हैं। हेल्थ और नुट्रीशन को देखेंगे तो आदिवासी लोग सबसे गरीब लोग हैं। 46% आदिवासी महिलाओं का बॉडी मास इंडेक्स एक दम लो है – बीएमआई 18.5 से भी कम है। उनकी ज़मीनें कम हुई हैं। उनमें माइग्रेशन सबसे अधिक हुआ है। उनकी ट्रैफिकिंग सबसे ज़्यादा हुई है। आदिवासियों की समस्या नेचुरल रिसोर्सेज का घटना है।

दलितों के साथ यह मामला नहीं है। यहाँ मामला जाती-व्यवस्था का है, उंच-नीच का है, अछूतता का है। दलितों का काम इनकी समस्या है। दोनों की समस्याएँ गहरी हैं लेकिन अलग अलग हैं।

दुर्भाग्यवश, आरएसएस ने आदिवासी इलाके में बहुत एंट्री किया है और कई लोगों को आरएसएस के साथ जोड़ दिया है। आदिवासी अपने हितों को पहचान नहीं पा रहे हैं। अपने आप को हिन्दू समझ करके दलितों से और मुस्लिमों से लड़ रहे हैं। वह यह नहीं देख पा रहे हैं कि आरएसएस के साथ जाने से उनका कितना बड़ा नुकसान हुआ है।


शम्स: छत्तीसगढ़ में किन चीज़ों ने आपको आदिवासियों के हक में लड़ने के लिए प्रेरित किया?


नंदिनी: जब मैं पीएचडी कर रही थी 1990 में, तब मैंने भारत दर्शन किया था। उस समय समाजशास्त्र में विद्रोह के बारे में पढने का बड़ा पैशन था। मैं देश में हर उस जगह गयी जहाँ विद्रोह हो रहे थे। उसी समय बहुत बड़े बड़े विद्रोह हो रहे थे जैसे नर्मदा बचाव आन्दोलन इत्यादि। इसी क्रम में, मुझे छत्तीसगढ़ बस्तर बहुत पसंद आया।
उस समय सबाल्टर्न स्टडीज का एक मूवमेंट चल रहा था हिस्ट्री ऑफ़ सोशियोलॉजी मे। मुझे पुराने आन्दोलन जो थे अंग्रेज़ों के खिलाफ उनमें बस्तर के आन्दोलन पर शोध करना था। बस्तर के आन्दोलन पर किसी ने शोध भी नहीं किया था। तो मैंने उसी पर शोध किया। चूँकि मैंने वहीँ के विषय पर पीएचडी किया था इसलिए मैंने वही एक्टिविज्म भी शुरू किया।


शम्स: विस्थापन की पीड़ा से इस तरह का असंतोष उभरा है। छत्तीसगढ़ में जो असंतोष है उसको आप मेधा पाटेकर और अन्य लोगों के नेतृत्व में चल रहे सरदार सरोवर के विस्थापित लोगों के लिए किए जा रहे शांतिपूर्ण आन्दोलन से कैसे जोड़ कर देखती हैं?


नंदिनी: सोशल साइंस में इसको पाथ डिपेंडेंस कहते हैं। मेधा पाटेकर का जो आन्दोलन था वह मध्य प्रदेश में था जो गांधीवादियों का क्षेत्र रहा तो वहां विरोध करने का शुरु से वही तरीका था इसलिए वहां के लोगों ने गांधीवादी रास्ते को चुना। छत्तीसगढ़ चूँकि आन्ध्र से क़रीब था और आंध्र में पीपल्स वॉर ग्रुप पहले से मज़बूत था। वहां उन्होंने वह रास्ता अपनाया जो वहां पहले से उनके लिए उपलब्ध था। कहने का अर्थ यह कि विरोध का जिनके पास जो तरीका था उनहोंने वह अपनाया।
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