साल 2018: ऐतिहासिक प्रेस कांफ्रेंस से शुरू, ऐतिहासिक जीत पर ख़त्म




-मनीष शांडिल्य

क्रिकेट को लेकर दीवानगी रखने वाले भारत को साल 2018 एक ऐतिहासिक जीत का तोहफा देकर विदा हो रहा है. क्रिकेट के मैदान में भारत और ऑस्ट्रेलिया की प्रतिद्वंद्विता जग-जाहिर है. दोनों देश एक-दूसरे से हारना कतई पसंद नहीं करते. लेकिन भारत का ऑस्ट्रेलिया में रिकॉर्ड बहुत अच्छा नहीं है. मगर इस ऑस्ट्रेलिया दौरे पर ग़जब का प्रदर्शन कर रही भारतीय टीम ने पहली बार बॉक्सिंग डे टेस्ट में ऑस्ट्रेलिया को हरा दिया. भारत की यह टेस्ट मैचों में 150वीं जीत भी है. हालिया संपन्न मेलबर्न टेस्ट से पहले ऑस्ट्रेलिया में भारत ने सात बॉक्सिंग डे टेस्ट खेले थे और इनमें से पांच में उसे हार मिली जबकि दो टेस्ट ड्रॉ रहे थे. क्रिकेट से इतर एशियाड में भी इस साल भारत ने अब तक का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन किया. जकार्ता में हुए एशियाड में भारत ने 15 गोल्ड मेडल सहित 69 पदक जीते.



साल 2018 की शुरुआत की बात करें तो साल के अंत की तरह ही इसकी शुरूआत भी एक ऐतिहासिक घटना से हुई थी. सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायाधीशों ने तत्कालीन चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा से मतभेद के कारण 12 जनवरी को राजधानी दिल्ली में संवाददाता सम्मेलन किया था. सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ. ये चार जज थे – जस्टिस जे चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ़. अपने आवास पर आयोजित इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में तब सुप्रीम कोर्ट के नंबर दो जस्टिस जे चेलमेश्वर ने कहा था, “हम चारों इस बात पर सहमत हैं कि इस संस्थान को बचाया नहीं गया तो इस देश में या किसी भी देश में लोकतंत्र ज़िंदा नहीं रह पाएगा. स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका अच्छे लोकतंत्र की निशानी है.” यह पूछे जाने पर कि वो क्या मुद्दे थे, जिस पर चीफ़ जस्टिस से उनके मतभेद थे,जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा, “इसमें मुख्य न्यायाधीश का कुछ मामलों की सुनवाई को जजों को सौंपना भी शामिल था.”

इस घटना के बाद एक-एक कर देश के अहम और स्वतंत्र संस्थानों पर सरकारी नियंत्रण के आरोप साल भर सुर्ख़ियों में रहे. एक ओर सरकार से विवाद के बाद 10 दिसम्बर को 61 साल में पहली बार किसी आरबीआई गवर्नर ने इस्तीफा दिया. तो दूसरी ओर अक्टूबर के अंत में सीबीआई ने पहली बार अपने ही दफ्तर पर छापा मारा.

महिलाओं के लिए अहम साल

महिलाओं के हक़ और इंसाफ़ के लिए 2018 एक अहम साल रहा. जनवरी 2018 में जम्मू से सटे कठुआ क़स्बे में एक आठ साल की बच्ची के साथ हुए सामूहिक बलात्कार की घटना ने पूरे देश को हिला दिया. इस यौन हमले के बाद की गई बच्ची की निर्मम हत्या ने एक बार फिर भारत में महिलाओं के ख़िलाफ़ हो रही हिंसा के मुद्दे को आम लोगों में चिंता और चर्चा का विषय बना दिया. सड़कों पर देश-व्यापी विरोध प्रदर्शन हुए और बच्चों के ख़िलाफ़ बढ़ रही यौन हिंसा के मामलों पर नए सख़्त क़ानूनों की मांग बढ़ी. भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब रेप के आरोपी के पक्ष में भी एक विशेष पार्टी के लोगों की ओर से जुलुस निकाले गए. इसके बाद लोकसभा ने छह महीनों के भीतर ही आपराधिक क़ानून संशोधन विधेयक पर चर्चा के बाद उसे पास कर दिया. आपराधिक क़ानून में इस बदलाव के बाद से अब 12 साल से कम उम्र की बच्चों के साथ बलात्कार के मामलों में दोषियों को मृत्युदंड तक की सज़ा सुनाई जा सकती है. हालांकि मानवाधिकार पर काम करने वाली कुछ संस्थाओं का मानना है कि यह फैसला एक क्रूर लोकलुभावन फैसला है; इसकी जगह न्याय प्रणाली में सुधार हो और बच्चियों और महिलाओं को सुरक्षा की गारंटी हो.



दूसरी ओर सर्वोच्च न्यायालय ने सितम्बर में सबरीमला मंदिर विवाद और अडल्ट्री (व्यभिचार) के मुद्दों पर महिलाओं के पक्ष में दो महत्त्वपूर्ण फ़ैसले दिए. इन सब घटनाओं के साथ ही अमरीका से शुरू हुए ‘मी टू’ आंदोलन ने भारत के दरवाज़े पर पहली दस्तक भी 2018 में ही दी. मोदी सरकार में मंत्री रहे एमजे अकबर, अभिनेता नाना पाटेकर सहित कई सार्वजनिक हस्तियों पर इस दौरान यौन शोषण के आरोप लगे. आरोपों के बाद एमजे अकबर को अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा.

साल के अंत में लोकसभा ने मुस्लिम महिलाओं को दिए जाने वाले तीन तलाक़ पर लाए गए संशोधित विधेयक को पारित कर दिया. इस बिल में एक बार में तीन तलाक़ को ग़ैर-क़ानूनी क़रार देने और इसे तोड़नेवाले पति को तीन साल की सज़ा दिए जाने का प्रस्ताव पास किया गया है. इस बिल को कानून की शक्ल देने के लिए राज्यसभा में पास करवाना होगा. लोकसभा में तीन तलाक़ बिल पर वोटिंग का कांग्रेस सहित कुछ विपक्षी दलों ने बहिष्कार किया. वे इस बिल को विचार के लिए संसद की संयुक्त चयन समिति के पास भेजने की मांग कर रहे थे. विपक्ष इस कानून में सज़ा का प्रावधान रखने का विरोध भी कर रहा है. विपक्ष का कहना है कि ये विधेयक सुप्रीम कोर्ट के आदेश और संविधान के ख़िलाफ़ है. ऐसे में इस क़ानून का ग़लत इस्तेमाल हो सकता है.

नाकामियां

सरकार धार्मिक अल्पसंख्यकों, हाशिए के समुदायों और सरकार के आलोचकों पर बढ़ते भीड़ के हमलों की रोकथाम या उनकी विश्वसनीय जांच करने में नाकाम रही. ये हमले अक्सर सरकार का समर्थन करने का दावा करने वाले समूहों द्वारा किए गए. सत्तारूढ़ भाजपा से जुड़े कट्टरपंथी हिंदू समूहों द्वारा पूरे साल अल्पसंख्यक समुदायों, विशेष रूप से मुस्लिमों, को भीड़ की हिंसा का शिकार बनाया गया. उनके खिलाफ ये हमले गोमांस के लिए गायों के व्यापार या गायों की हत्या की अफवाहों के आधार पर किए गए. नवंबर तक, 18 ऐसे हमले हुए थे और इसमें आठ लोग मारे गए.

अहम घटनाएँ

अप्रैल में, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम में संशोधन के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ कई उत्तर भारतीय राज्यों में दलित समूहों के विरोध-प्रदर्शन में पुलिस के साथ संघर्ष में नौ लोगों की मौत हुई. मई में, पुलिस ने तमिलनाडु में एक कॉपर प्लांट का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई, जिसमें 13 लोगों की मौत हो गई और 100 घायल हुए.

जुलाई में, असम सरकार ने राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर का मसौदा प्रकाशित किया. इसका मकसद था – बांग्लादेश से होने वाले गैर कानूनी प्रवासन के मुद्दे पर बार-बार के विरोध प्रदर्शनों और हिंसा को देखते हुए भारतीय नागरिकों और वैध निवासियों की पहचान करना. चालीस लाख से अधिक लोगों, जिनमें से ज्यादातर मुस्लिम हैं, को इस रजिस्टर से निकाल बाहर कर दिए जाने से उन्हें मनमाने तरीके से हिरासत में रखने और राज्यविहीन करार देने की आशंका बढ़ गई है.



सितंबर में, सुप्रीम कोर्ट ने बायोमैट्रिक पहचान परियोजना, आधार की संवैधानिकता को बरकरार रखा और कहा कि सरकार इसे सरकारी लाभों तक पहुंच और आयकर दाखिल करने के लिए के एक आवश्यक शर्त बना सकती है, लेकिन इसे अन्य उद्देश्यों के लिए प्रतिबंधित कर सकती है. सितंबर में ही, भारत के सुप्रीम कोर्ट ने सहमति से बने वयस्कों के समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर निकालते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को निरस्त कर दिया. कार्यकर्ताओं, वकीलों और एलजीबीटी समुदायों के सदस्यों के दशकों के संघर्ष के बाद यह फैसला आया. अदालत के फैसले का अंतरराष्ट्रीय महत्व भी है, क्योंकि यह भारतीय कानून पूर्ववर्ती ब्रिटिश साम्राज्य के ज्यादातर हिस्सों में इसी तरह के कानूनों का आधार बना था.

नवंबर में, किसानों ने कर्ज और ग्रामीण समुदायों के लिए राज्य समर्थन की कमी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया. उन्होंने महिला किसानों के अधिकार को मान्यता देने और जबरन अधिग्रहण के खिलाफ दलितों और जनजातीय समुदायों के भूमि अधिकारों की रक्षा की मांग की.

साथ ही सरकार ने नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं और मानवाधिकार रक्षकों को निशाना बनाने के लिए गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम का बड़े पैमाने पर उपयोग किया. महाराष्ट्र में पुलिस ने प्रतिबंधित माओवादी संगठन का सदस्य होने और 1 जनवरी, 2018 को हुई जातीय हिंसा के लिए आर्थिक मदद पहुंचाने और उसे भड़काने का ज़िम्मेदार ठहराते हुए दस नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं, वकीलों और लेखकों को गिरफ्तार किया और हिरासत में लिया. रिपोर्ट लिखे जाने तक उनमें से आठ जेल में थे और एक को घर में नज़रबंद रखा गया था.

चर्चित शादियों का साल

साल 2018 में दो तरह की शादियां हुईं. एक वो जो शादी के ऐलान से लेकर संपन्न होने तक चर्चाओं में बनी रहीं. दूसरी वो जो साधारण तरीके से गुपचुप हुईं और शादी की तस्वीरों के शेयर किए जाने के बाद ही दुनिया को दो लोगों के परिणय सूत्र में बंधने का पता चला.

पहली तरह की शादियों में प्रियंका चोपड़ा, दीपिका पादुकोण, रणवीर सिंह, निक जोनास और ईशा अंबानी जैसे नाम शामिल हैं. दूसरी तरह की शादी करने वाले लोगों में बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल, पारुपल्ली कश्यप और मसान फ़िल्म की श्वेता त्रिपाठी शामिल रहीं.

उपलब्धियां

भारत की इकोनोमी फ्रांस को पीछे छोड़ते हुए इस साल दुनिया की छठी सबसे बड़ी इकॉनमी बनने में कामयाब रही. वहीं साल के अंत में ब्रह्पुत्र नदी पर बने देश के सबसे लम्बे डबल डेकर रेल-रोड ब्रिज का तोहफा देश को मिला. साथ ही इस साल भारत दुनिया की सबसे ऊँची मूर्ति वाला देश भी बन गया. सरदार वल्लभ भाई पटेल की 182 मीटर ऊँची प्रतिमा के साथ भारत को यह गौरव मिला जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पटेल की जयंती 31 अक्टूबर को किया.

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने अपने अब तक के सबसे भारी रॉकेट जीएसएलवी-एमके3 को प्रक्षेपित किया है. इस प्रक्षेपण को अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है.



राजनीति

राजनीति के मैदान से इस साल सबसे बड़ी खबर साल के अंत में 11 दिसम्बर को आई जब तीन राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा. इन परिणामों को नरेन्द्र मोदी की घटती लोकप्रियता और राहुल गाँधी की बढ़ती स्वीकार्यता और सक्रियता के रूप में देखा गया. साथ ही इसे संबंधित राज्य सरकारों के साथ-साथ नरेन्द्र मोदी सरकार के काम-काज पर जनता का फैसला भी माना गया. इन परिणामों ने विपक्ष को अगले साल होने वाले आम चुनाव के लिए नई उर्जा दी तो भाजपा को अपने फैसलों और रणनीति पर सोचने पर मजबूर किया.

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