वैशाली लोक सभा की कई विडंबनाएं

भगवान महावीर यहाँ पैदा हुए लेकिन यहाँ के उम्मीदवार अक्सर बाहुबली




वैशाली जहाँ भगवान महावीर पैदा हुए और जहाँ से सत्य, सद्भाव और प्रेम का सन्देश विश्व में फैला आज बाहुबली नेताओं के भरोसे पर है
             मोहमम्द सज्जाद

 

दुनिया में वैशाली भगवान महावीर के जन्म स्थली के रूप में जाना जाता है जिन्होंने शान्ति और अहिंसा का सन्देश दिया. इसको इसलिए भी जाना जाता है क्योंकि लिच्छवी के जमाने में यहाँ से लोकतांत्रिक स्वरूप में शासन की शुरुआत हुई. यह बौद्ध धर्म के लोगों का भी तीर्थस्थल है और कई बौद्ध परिषदों में से एक परिषद यहाँ हुआ करता था. बाद में, 15वीं शताब्दी में यहीं से शेख क़ाज़ीन शुत्तारी ने अपने सूफियाना प्रेम और सद्भावना का सन्देश फैलाया था. उनके मजार पर सभी समुदायों के लोग हर साल जमा होते हैं.

विडंबना यह कि, अक्सर यहाँ का लोक सभा सीट बाहुबली जैसे उम्मीदवार को मिलता है.

2014 में, वैशाली से लोजपा के रमाशंकर सिंह ने राजद के प्रोफेसर रघुवंश प्रसाद सिंह को हरा कर सांसद बने थे. रमाशंकर का आपराधिक रिकॉर्ड रहा है. 2014 में चुने जाने के बाद, रमा को फिरौती के लिए अपहरण करने के अपराध में दो साल जेल में रहना पड़ा था. 2014 की एक दूसरी उम्मीदवार, भूमिहार बाहुबली और ट्रांसपोर्ट कारोबारी मुन्ना शुक्ला की पत्नी अनु शुक्ला को भी अच्छा ख़ासा वोट मिला था.

बाहुबली जैसे उम्मीदवारों के चयन का सिलसिला 1994 से तब शुरू हुआ जब वहां से उप-चुनाव में लवली आनंद (कोसी बेल्ट के बाहुबली आनंद मोहन की पत्नी) चुनी गईं थी.

इसे लालू यादव के पतन की शुरुआत के तौर पर देखा जा सकता है. इस चुनाव के तुरंत बाद, नीतीश कुमार ने लालू से अलग हो कर समता पार्टी बनाया था.

यह वह दौर था जब लालू के खिलाफ दो ऊंची जाति भूमिहार और राजपूत मिलकर चुनावी फ्रंट तैयार कर रहे थे. इससे पहले कई गैंग वार देखने को मिले: 1992 में, विधायक हेमंत शाही को सत्ताधारी जनता दल के लोगों ने मार दिया. 1994 में, छोटन शुक्ला और बुटकन शुक्ला दो भाइयों को मार दिया गया. नतीजा यह हुआ कि छोटन शुक्ला की शव यात्रा की भीड़ ने गोपाल गंज के दलित डीएम को पीट पीट कर मार दिया. यह लालू का गृह क्षेत्र था. आनंद मोहन सिंह को इस लिंचिंग के मामले में सज़ा हो गयी.

बाद में, 1998 जून में, बाहुबली और सवर्ण गैंगस्टर के खिलाफ़ पिछड़ी जाति की दावेदारी के प्रतीक बृज बिहारी की हत्या हो गयी.

बृज बिहारी राबड़ी कैबिनेट में मंत्री थे. उनकी विधवा रमा देवी आज भाजपा में है और 2009 और 2014 में सांसद रही थीं. वह तीसरी बार 2019 में शिवहर से भाजपा की उम्मीदवार हैं. इससे पहले 1998-99 में वह राजद से मोतिहारी लोक सभा लड़ी थीं और मोदी कैबिनेट में कृषि मंत्री राधामोहन सिंह को हराया था. राधा मोहन इस बार फिर से मोतिहारी से चुनाव लड़ रहे हैं.

हाल में, सितम्बर 2018 में, मुजफ्फरपुर के पूर्व मेयर की दिल दहला देने वाली हत्या हुई.

लालू-राबड़ी काल और आज का सुशासन

लालू-राबड़ी का समय मीडिया द्वारा अक्सर जंगल राज के तौर पर प्रस्तुत किया गया. ख़ास कर 2013 के बाद, जब नीतीश अलग होकर भाजपा में चले गए, बिहार में अपराध, अराजकता और सांप्रदायिक झगड़ों में तेज़ी आई. इसमें हाल के वर्षों में अधिक तेज़ी आई है. इसमें निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता कि मीडिया और मुखर गुट इस अराजकता को भी उतनी ही घृणा से देखते हैं जिस तरह वह राबड़ी काल में इसे देखते थे. अलबत्ता, इस बात से बहुत कम ही लोग इनकार करें कि बिहार में जो राजद नेतृत्व वाला शासन था वह आज की भाजपा के साथ वाली सत्ता की अपेक्षाकृत मीडिया और गप्पू लोगों के गुस्से की शिकार ज्यादा हुई.

कई सवर्णों के लिए, राजद का मतलब अराजकता है जबकि एनडीए को वे लोग इस तरह से नहीं देखते हैं. यह दोहरा मापदंड तब और ज्यादा स्पष्ट हो जाता है जब वैशाली के हाल के लोक सभा चुनावों को देखा जाए.

इस बार, वैशाली लोक सभा में, राजद के प्रोफेसर रघुवंश प्रसाद सिंह के खिलाफ लोजपा के वीणा देवी को खड़ा किया गया है.

सरल और साधारण जीवन शैली वाले रघुवंश का लगभग 50 सालों का लंबा राजनैतिक जीवन रहा है. इन्होंने अपने जीवन में कुछ चुनाव ही हारा है. केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री (यूपीए के फ्लैगशिप प्रोग्राम) के रूप में उनके काम को सभी दलों के लोगों ने सराहा था. उन पर न कोई भ्रष्टाचार का आरोप है और न ही उनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड हैं.

इस तरह से, रघुवंश राजद का विकास वाला चेहरा हैं हालांकि राजद विकास की अनदेखी करने के लिए बदनाम है. इतिहास के सन्दर्भ में अगर देखा जाए तो इस जगह की यह भी विडंबना है कि यह जगह इतना ऐतिहासिक होने और पर्यटन अर्थव्यवस्था की सभी संभावनाएं होने के बावजूद संसाधनों की कमी वाले बिहार में वैशाली का यह ऐतिहासिक गाँव अब तक रेल मानचित्र पर नहीं है, इस सच्चाई के बावजूद कि बहुत सारे बिहारी सांसद रेल मंत्री रह चुके हैं.

मतदाताओं की रघुवंश से शिकायतें

रघुवंश से इनके मतदाताओं को बस एक ही शिकायत रहती है कि यह केवल अपने जात वालों यानी राजपूतों को आगे बढाते हैं. जिस तरह से सिविल निर्माण में ठेकेदारी दिया गया है इससे यह सच भी लगता है. यही शिकायत राजद के मुख्य जन-आधार यादवों की भी रहती है. यह इतना ज्यादा होता है कि वैशाली लोक सभा के कई गाँवों के यादव प्रतिनिधि रघुवंश के राजपूत को समर्थन करने की अपनी शिकायत लेकर पटना भी पहुँचते हैं.



अपने गृह क्षेत्र में दूसरी शिकायत उनसे लोगों की यह होती है कि वह शायद ही किसी मुस्लिम गाँव का दौरा करते हैं हालांकि ये उनके सबसे नियमित मतदाता रहे हैं केवल 2014 को छोड़कर, जब लगभग हर तीसरे मुस्लिम वोटर ने एक या दुसरे मुस्लिम स्वतंत्र उम्मीदवार को (इन मुस्लिम उम्मीदवारों ने 46000 वोट हासिल किया था) वोट किया था, कुछ मुस्लिम वोट अन्य स्वतंत्र (अनु शुक्ला), जद-यू और लोजपा को गया था.

स्थानीय राजनैतिक कार्यकर्त्ता, भीतर के लोग और वैशाली के चुनाव पर नज़र रखने वाले लोग ऐसा बताते हैं. ऐसा कहा जाता है कि 2014 में बहुत सारे यादव भी रघुवंश के राजपूत को समर्थन करने के रवैये से गुस्सा हो कर मोदी के पक्ष में चले गए. उनहोंने भूमिहार के साथ भी कोई गठबंधन नहीं बनाया चाहिए यह था कि कम से कम वैशाली की एक विधान सभा सीट पर कांग्रेस-राजद का एक भूमिहार विधायक होता.

रघुवंश पर यह भी आरोप है कि उन्होंने अपने विधान सभा क्षेत्र, कांति में मुस्लिम नेतृत्व को उभरने नहीं दिया; और यह कि वह एक पसमांदा जैसे अंसारी, मंसूरी, राइन को दुसरे के खिलाफ खड़ा करवा देते हैं. इसके साथ ही, लोगों की उनके खिलाफ यह भी राय है कि यह सांप्रदायिक तनाव और हिंसा में दखल देकर इसे शांत कराने की कोशिश नहीं करते.

अब तक, वैशाली के स्थानीय समीक्षकों, चुनाव पर नज़र रखने वाले लोगों और राजनैतिक कार्यकर्ताओं की राय है कि यादव और मुसलमान और बहुत सारे गरीब नीची जाति वाले रघुवंश की तरफ लौट आए हैं.

कुशवाहा, मल्लाह और मुसहर के लोगों की बात से बहुत ज्यादा ज़ाहिर नहीं होता कि वह किसे वोट देंगे. राजद के साथ इन तीनों जातियों का प्रतिनिधित्व करने वाली छोटी पार्टियों से गठबंधन से यह साफ़ नहीं है कि इनके वोट राजद के नेतृत्व वाले गठबंधन में स्थानांतरित होंगे या नहीं.

कुर्मी और अति पिछड़ों का वोट एनडीए में जाने की संभावना है. लेकिन बड़ा सच यह है कि अति पिछड़ा (पचपनिया, 55 जाति वाले) लगभग चुप हैं. इसका कारण यह है कि इनमें किसी जाति का कोई घनी आबादी वाला गाँव नहीं है. ये अधिकतर बिखरे हुए हैं और चुनाव के समय ये खुद को चुनावी एकजुट और मुखर गुट के तौर पर पेश करने से कतराते हैं.



सवर्णों का क्या?

ऐसा कहा गया कि रघुवंश के नामांकन में राजपूतों की संख्या बहुत कम थी. ऐसा लगता है कि वे लोजपा उम्मीदवार वीणा देवी की तरफ चले गए. इसके अलावा, गाँव के अधिकतर बदमाश चाहे वे किसी भी जाति या समुदाय के हों ने वीणा देवी का प्रचार रथ थाम लिया है. यह कहने की आवश्यकता नहीं कि ये बदमाश सह बिचौलिए (पुलिस थानों और सामुदायिक विकास ब्लॉकों के) अपने अपने बूथों पर अच्छे खासे वोट को प्रभावित करते हैं.

ऐसे ही नहीं, अमेरिकी मानवविज्ञानी, विट्सो जेफरी जो ग्रामीण बिहार में काम कर रहे हैं इन बिचौलियों को “राज्य के पहली पंक्ति के पदाधिकारी’ कहते हैं. इन्ही लोगों को पश्चिम बंगाल में मस्तान कहा जाता है जो सत्ताधारी पार्टी से मिले हुए होते हैं और उनकी तरफ से इन्हें शरण मिला होता है. नेताओं का मुवक्किल और संरक्षण का नेटवर्क इन्ही लोगों के दम पर फलता फूलता है. नीतीश की निगरानी में, आज के ग्रामीण भारत में, इन लोगों ने स्थानीय पुलिस और विधायकों की खुशामद कर शराब की तस्करी कर अपना जेब भरते हैं. एक और विडंबना यह भी है कि, नीतीश को सुशासन बाबू कहा जाता है. ये शराब माफिया राजनैतिक पार्टियों के लिए मोटे आसामी (धन देने वाले) हैं.

वीणा देवी भी राजपूत हैं. वह मुजफ्फरपुर जिला बोर्ड की सभापति (2001-2006) और गायघाट (मुज़फ्फ़रपुर) से भाजपा की विधायक (2010-2015) रही हैं. उनके पति दिनेश सिंह (जद-यू) विधान पार्षद हैं और वह सत्ता के हिसाब से राजद और जद-यू के बीच आते जाते रहते हैं. उनकी पूरी कहानी रंक से राजा की है, बिलकुल स्लमडॉग मिलियनेयर वाली. उनकी बहू मुजफ्फरपुर जिला बोर्ड की उप सभापति हैं. यहाँ परिवारवाद राजद-कांग्रेस के खिलाफ एनडीए के परिवारवाद के प्रोपगंडा से कहीं ज़्यादा है.

आडवाणी और मोदी की कहानियों की तरह यहाँ की भी कहानी है. दिनेश रघुवंश के छत्रछाया में आगे बढे. अब दिनेश की पत्नी अपने खुद के पूर्व संरक्षक के खिलाफ चुनाव लड़ रही हैं. 1980 के दशक में, दिनेश को श्याम कुमार, श्रीमती उषा सिंह और रघुनाथ पाण्डेय जैसे भूमिहार विधायकों का संरक्षण हासिल था.

आलोचकों/विरोधियों के अनुसार, दिनेश-वीणा पति पत्नी के खिलाफ अपराध के कई मामले दर्ज हैं. आम राय में, पति-पत्नी अभी के मुजफ्फरपुर-वैशाली में लैंड-माफिया और आपराधिक गिरोहों के संरक्षक हैं.

भूमिहारों के कुछ गुट भी इस बात को निजी बात-चीत में कहते हैं कि चुनाव में वीणा देवी की जीत से उनकी प्रभुत्व पर बुरा असर पड़ेगा. बहुत पहले से, भूमिहार उम्मीदवार न मुजफ्फरपुर से और न ही वैशाली से जीते हैं (दोनों गठबंधन ने मल्लाह उम्मीदवार उतारा है). मुजफ्फरपुर भूमिहारों का सांस्कृतिक राजधानी कहा जाता है. साथ ही साथ, अधिकतर लोगों के दिलों में मोदी के लिए अब तक प्रेम बाक़ी है.

इस तरह, भूमिहारों के अंदर काफी असमंजस है. हालांकि, उनके छोटे गुट रघुवंश के प्रचार-दल में शामिल हो गए हैं. उनका तर्क यह है कि हालांकि भूमिहारों को अधिकारहीन बनाने की राजद राजनीति के साथ लंबे समय से शिकायत रही है लेकिन दो राजपूत उम्मीदवारों में वह अधिक साफ़ छवि वाले और पढ़े लिखे उम्मीदवार रघुवंश को ही वोट देना पसंद करेंगे.



हालांकि की जातीय-गणित की परतें 23 मई को ही खुलेगी जब वोट की गिनती होगी, वैशाली में राजद कुशासन के मामले में उल्टा है जहाँ से राजद का उम्मीदवार एनडीए के उम्मीदवार की अपेक्षा बहुत ज्यादा साफ़ सुथरा छवि वाला है.

वैशाली के मतदाताओं का क्या होगा? वह 12 मई के चुनाव में क्या करेंगे? यह 23 मई को ही साफ़ होगा.

रघुवंश की ऊपर की कुछ कमियों के बावजूद, पैसा और बाहुबल की राजनीती वाले इस थके हारे इलाके में एक सरल सज्जन इंसान का अच्छा कर पाना वाकई कमाल की बात होगी. क्या वह अपने ही चेले के धन और बाहुबल पर जीत हासिल कर पाएंगे? यह देखना बाक़ी रहेगा.

(मोहम्मद सज्जाद अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर हैं और Muslim Politics in Bihar: Changing Contours (Routledge)और अन्य पुस्तकों के लेखक हैं. यह उनके अंग्रेजी आलेख का द मॉर्निंग क्रॉनिकल द्वारा अनूदित संस्करण है.)

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