लॉक डाउन से जूझ रहे श्रमिक और मई दिवस




-पुष्पराज

पहली मई को भारत में मई दिवस के रूप में जाना जाता है. हम भारतीय जिसे मई दिवस कहते हैं, यह पूरी दुनियां में विश्व श्रमिक दिवस के रूप में प्रतिष्ठित है. इस श्रमिक दिवस को लोगबाग मजदूर दिवस पुकारते हैं. अम्ररीका के शिकागो शहर में आज से 134 वर्ष पूर्व 1886 की पहली मई को एक लाख से ज्यादा मजदूरों ने 8 घंटे काम, 8 घंटे विश्राम और 8 घंटे मनोरंजन की एक सूत्री मांग के साथ कारखानों में हड़ताल कर सडक पर आन्दोलन खड़ा किया था. इस आन्दोलन को कुचलने के लिए गोली चलाई गई, जिससे 8 मजदूर शहीद हुए थे. इन मजदूरों की शहादत की याद में 1889 में पेरिस मे 1 मई को आयोजित अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मलेन में अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस की घोषणा हुई .भारत में 33 वर्ष बाद 1923 में लेबर किसान पार्टी ऑफ़ हिंदुस्तान के नेता सिंगरावेलू चेटयार की अध्यक्षता में मद्रास हाईकोर्ट के समक्ष मानव श्रम के अनिश्चित घंटों को निश्चित करने के लिए प्रदर्शन हुआ. ब्रिटिश हुकूमत ने काम के घंटों के अंतरराष्ट्रीय मानक को स्वीकृति प्रदान किया और 1923 से भारत में मजदूर दिवस मानव श्रम के महत्व को परिलक्षित करने वाले सामाजिक, राजकीय, राष्ट्रीय उत्सव में परिणत हो गया. मानवाधिकार दिवस, महिला दिवस जैसे दिवस भारत में प्रतिष्ठित होते हुए भी बहुल आबादी से उस तरह जैविक स्तर पर जुड़ाव नहीं रखते हैं, जिस तरह की मानव श्रम का प्रतिनिधित्व करने वाला मजदूर दिवस.

भारत में मज़दूर दिवस

पितृसत्तात्मक भारतीय समाज में मजदूर दिवस के साथ श्रम के महत्व को जनवादी संघर्ष में बदलने का एक अभ्यास शुरू हुआ, जिसके तहत भारत में मजदूरों ने संगठित होकर कारखानों से लेकर खेत –खलिहानों, जंगलों से लेकर खदानों तक में श्रमिक आन्दोलन की परंपरा कायम की. सभी वाम संगठनों ने मजदूरों के ट्रेड यूनियन खड़े कर ट्रेड यूनियन के नेतृत्व में श्रमिक अधिकार के संवैधानिक संघर्ष को सांस्थानिक व राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया. मजदूरों के संघर्ष का विप्लव भारत की समाजवादी व साम्यवादी धाराओं की आपसी टकराहट में लगातार प्रभावित हुआ. बावजूद दत्ता सावंत और शंकर गुहा नियोगी जैसे मजदूर नेताओं ने भारत में श्रमिक विप्लव को ऊँचाई प्रदान किया. साम्राज्यवाद व् पूंजीवाद के गठजोड़ में श्रमिक आंदोलनों को ध्वस्त करने की साजिश लगातार जारी रही, बावजूद नवजनवादी भारत के निर्माण के लिए भारत में जनवादी विप्लव की सबसे बड़ी उम्मीद श्रमिक संगठनों की एकजुट ताकत में ही प्रतीत होती है.

लॉक डाउन और मज़दूर की दशा

आज जब कोरोना की वैश्विक महामारी से भारत को बचाने के नाम पर प्रधानमन्त्री घोषित लॉकडाउन आपदा का रूप ले चुका है. असंगठित क्षेत्र के करोड़ों मजदूर कारखाने बंद होने, निर्माण कार्य बंद होने की वजह से रोटी–भात के लिए तड़पते हुए हजारों किलोमीटर की पैदल–यात्रा करने के लिए मजबूर हैं तो भारत में श्रमिकों की शक्ति, मानव श्रम की गरिमा और श्रम शक्ति के संवैधानिक महत्व पर विमर्श की दरकार बढ़ जाती है. लॉकडाउन के 38 दिन बीत रहे हैं और हर रोज महानगर से अपने गांवों की तरफ लौटते हुए किसी मजदूर के मौत की खबर आ रही है.

दिल्ली से बिहार, उत्तर प्रदेश या मुम्बई से इंदौर जाने की राह में या देश के किसी भी हिस्से से रोज पैदल घर पहुँचने की राह में किसी मजदूर के मौत की खबर आ रही है. असंगठित क्षेत्र के 40 करोड़ मजदूरों ने लॉकडाउन प्रांरभ होने के तीसरे दिन से भूख से बिलबिलाते हुए रेल–बस के बिना जीने की अदम्य शक्ति की ताकत से पैदल चलना शुरू किया. राज्य या केंद्र सरकारों ने सरकारी तालाबंदी के सख्त कानून के उलंघन के आरोप में इन मजदूरों को जेलों में बंद नहीं किया, ना ही इनके लिए अस्थाई जेल बनाए. जाहिर है कि भारत के जेल पूर्व से ही 20 गुणा ज्यादा कैदियों से भरे हुए हैं. हमने दिल्ली के आनंद बिहार टर्मिनल, नोएडा–फ़रीदाबाद बॉर्डर, मुम्बई के बांद्रा में हजारों–हजार मजदूरों की भीड़, सूरत का स्वस्फूर्त मजदूर–विप्लव देखते हुए महसूस किया कि इन करोड़ों मजदूरों की जिन्दगी से इंकलाब-जिंदाबाद जैसा सबसे जरुरी श्रमिक मन्त्र किस तरह, क्योँ-कर गायब हो गया है. सोचिए कि दिल्ली से पैदल मुरैना जाते हुए होटल के जिस बेयरे की मौत हो गयी. दिल्ली से बिहार जाने की राह में वाराणसी में जिस रामजी महतो नामक श्रमिक की मौत हुई. अगर इन मजदूरों ने दिल्ली में मजदूरों की भीड़ के साथ इंकलाब–जिंदाबाद का शोर किया होता तो क्या दिल्ली सरकार हर अप्रवासी मजदूर को भोजन की गारंटी करने के लिए मजबूर नहीं हो जाती. इस विषम दौर में यह समझने की जरूरत है कि भारत के स्थापित ट्रेड यूनियनों ने कारखाने, खदानों, सरकारी प्रतिष्ठानों में ट्रेड यूनियन संघर्ष को बचाए रखने में जिस तरह अपनी शक्ति झोंक दी. काश, असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के मध्य भी इन्होने सामूहिक–राजनीतिक प्रशिक्षण अभियान चलाए होते. 97 वर्षों से मजदूर दिवस मनाने वाले भारत के असंगठित क्षेत्र के 40 करोड़ श्रमिक अगर इंकलाब–जिंदाबाद का नारा बिसर चुके हैं तो भारत के श्रमिकों के ऊपर कहर बढ़ता ही जाएगा. मानव श्रम शक्ति का जिस तरह भारतीय राज्यसत्ता ने उपहास व अपमान किया है, ऐसा दुनियां के इतिहास में कभी नहीं घटित हुआ था.

2020 का विश्व श्रमिक दिवस भारत के करोड़ों श्रमिकों, बेरोजगारों, युवाओं के लिए इस तरह संक्रमण काल साबित होगा, यह सब पूर्णतः अकल्पनीय था. हम सोचते हैं कि काश सडक पर भूख से बिलबिलाकर पैदल भागते हुए इन करोड़ों श्रमिकों की पीठ पर एक शंकर गुहा नियोगी खड़ा होता, इनकी पीठ पर एक दत्ता सामंत खड़ा होता तो निश्चित ही भारत का मजदूर–विप्लव सबसे कमजोर के हक का भारत निर्माण करने की तरफ आगे बढ़ रहा होता. अफ़सोस कि फासीवाद के आगमन से पूर्व नव-उदारवाद के स्वागत वर्ष में 1991 में शंकर गुहा की हत्या हुई और 1997 में दत्ता सामंत भी मारे गए. प्रसिद्ध लेखक कमलेश्वर ने शंकर गुहा नियोगी को ‘श्रमिक देवता‘ लिखा था. काश, भारत की ट्रेड यूनियन राजनीति में शंकर गुहा नियोगी को भगत सिंह की तरह का प्रतीक बनाया गया होता.

विश्व श्रमिक दिवस और 2020

2020 का विश्व श्रमिक दिवस दुनियां के लॉकडाउन वाले 100 देशों के मजदूरों के लिए संक्रमण दिवस साबित हो रहा है. भारत के असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की जिन्दगी में लॉकडाउन त्राहिमाम साबित हो रहा है. मजदूर दिवस के अल–सुबह टेलीग्राफ़ के लखनऊ ब्यूरो पियूष श्रीवास्तव की खबर दिखी कि उत्तर प्रदेश के कबीर नगर के कृषक–मजदूर शिव कुमार पत्नी के लिए दवा लाने के लिए पुल को पैदल पार कर रहे थे तो पुलिस ने बलपूर्वक उनका रास्ता रोका. वे नदी में कूद गए और नदी को तैर कर पार करते हुए पुलिस के भय से वे गहरे पानी में डूब गए. निर्दोष श्रमिक की मौत हो गयी. पटना से युवा पत्रकार सीटू तिवारी ने मर्माहत करनेवाला पोस्ट लिखा है. ”परदेश से अपने गाँव लौट रहे 3 मजदूर रेल की पटरी का अनुसरण करते हुए घर वापसी की राह में काल-कलवित हो गए हैं. 2 मजदूरों को सरकार की मालगाड़ी ने कुचल दिया तो 1 मजदूर जिन्दा सरयू नदी में समा गए“. जनसत्ता में साइकल से 1100 किलोमीटर का सफ़र तय कर चेन्नई से उड़ीसा पहुँचने वाले मजदूरों की कहानी छपी है. आज बेगूसराय के अखबारों में मेरे पड़ोसी 35 मजदूरों की दर्दनाक कहानी छपी है.

24 मार्च को दिल्ली से मंझौल के लिए निकले 35 मजदूरों को उत्तर परदेश के कुशीनगर में 3 हफ्ते तक कोरोंटाइन में रखा गया. कुशीनगर से बेगूसराय की राह में बिहार के गोपालगंज में 10 दिनों तक कोरोंटाइन में रखा गया. 1200 किलोमीटर की दूरी तय कर अपने घर पहुँचने की राह में 3 किलोमीटर पूर्व रोककर उन्हें पुनः तीसरी बार 14 दिनों के लिए कोरोंटाइन में भेज दिया गया है. सोचिए कि किसी भी सभ्यता के विकास की रीढ़ कहलाने वाले मानव श्रम का इस तरह का हास्यास्पद स्वरूप मजदूर दिवस के दिन दिख रहा है. अच्छा होता कि भूख से तडपते हुए लॉकडाउन को तोड़ते हुए सडक पर पाँव रखने वाले हर एक मजदूर को जेलों में बंद कर दिया गया होता. कोरोंटाइन को हमारे इलाके के मजदूर सरकार की जेल ही मानते हैं. भला सोचिए कि दिल्ली से बेगूसराय पहुचने की राह में 45 दिनों का कोरोंटाइन, स्वास्थ्यसुरक्षा के नाम पर यह किस तरह का स्वास्थ्यक्षरण अभियान चलाया जा रहा है.

बिहार और उत्तर प्रदेश में मुसहरों के बीच भूख से मौत बढ़ेगी. प्रथम चरण के लॉकडाउन में ही बिहार के एक मुसहर श्रमिक की भूख से मौत की खबर आई थी. बिहार के अलौली के सहरबन्नी इलाके में मुसहरों के घर नई फसल का अनाज भी बहुत कम आया है. असमय ओला गिरने से पहले राई की फसल नष्ट हो गयी थी, इधर लॉकडाउन के दौरान ओलावृष्टि से बिहार में गेहूं की आधी पकी हुई फसल खेत में ही नष्ट हो गयी. जब किसानों की फसल बर्बाद हो गई तो कृषक–मजदूर मुसहरों के पेट में दाने कहाँ से आयेंगे?

बिहारी मज़दूरों की दयनीय स्थिति

कोरोना–राहत के नाम पर जो चावल व गेहूं गरीबी रेखा के नीचे बसर करने वाले गरीबों को वितरित हो रहे हैं, उनमें मुसहर समुदाय के हिस्से का ज्यादातर खाद्यान डीलर, मुखिया और दलाल बीच में ही गटक जा रहे हैं. मेरे गाँव के 2000 से ज्यादा मुसहर श्रमिक देश के अलग–अलग हिस्सों में भूख से तड़प रहे हैं. मंझौल पंचायत-1 के मगहिया मुसहर मुहल्ले के 30 मुसहर परिवार, जो बरसों से सुअरबाड़ा तरह के खोहर में रहने के लिए अभिशप्त हैं. इस आपदा काल में उनके भोजन, आवास, वस्त्र सहित चिकित्सा की गारंटी मुख्यमंत्री को करनी होगी. मैं पूरी तरह सशंकित हूँ कि बेगूसराय के जिलाधीश के गोरे साहबों जैसे आचरण की वजह से किसी दीनहीन मुसहर श्रमिक की भूख से मौत ना हो जाए. बिहार के मुख्यमंत्री ने लॉकडाउन के बाद प्रवासी मजदूरों को किसी कीमत पर बिहार प्रवेश ना करने देने की घोषणा की. इस घोषणा के बाद भी रोज प्रवासी मजदूर पैदल–पैदल महानगरों से गाँवों की तरफ आ रहे हैं.

दिल्ली में मजदूरों की मजबूरी

बिहार के एक करोड़ से ज्यादा श्रमिक महानगरों में भात–रोटी के बिना तड़प रहे हैं. बिहार सरकार बार–बार आपदा विभाग का विज्ञापन जारी कर बता रही है कि सरकार बिहार के श्रमिकों को दिल्ली सहित दूसरे नगरों में दोनों वक्त का भोजन उपलब्ध करा रही है. हकीकत में सब मिथ्या कथा है. मैंने मयूर विहार में निवास कर रहे अपने इलाके के श्रमिकों को दिल्ली स्थित बिहार निवास और आपदा विभाग के सारे नंबर दिए. आपदा सहायता के किसी सरकारी नंबर से असहाय श्रमिकों को भोजन उपलब्ध नहीं हुआ. मयूर विहार में निवास कर रहे श्रमिकों में ई-रिक्शा, ओटो चालक, फुटपाथ विक्रेता और रिक्शा चालक हैं. मेरे इलाके के 300 से ज्यादा मजदूर हैं, जिनकी जिन्दगी उधार और कर्ज पर आश्रित हो गई है. मैंने 31 मार्च 20 को दिल्ली के मुख्यमंत्री के पास मयूर विहार के इन श्रमिकों के लिए भोजन का बंदोबस्त करने का निवेदन भेजा था.

दिल्ली सरकार ने इनके लिए 100 मजदूरों का भोजन एक बार ज़रूर भेजा पर नित्य इनके लिए भोजन का इंतजाम करना केजरीवाल सरकार की प्राथमिकता नहीं. मजदूरों से कहा गया कि वे 2 किलोमीटर दूर स्थित राहत शिविर में आकर भोजन प्राप्त करें. भूखे मजदूरों ने बताया कि अपने आवास से 2 किलोमीटर आगे बढ़ने में पुलिस 4 बार उनकी टांग पर डंडे मारेगी और इस तरह पुलिस के भय से श्रमिक दिल्ली सरकार का भोजन ग्रहण करने से वंचित रह गए. आम आदमी पार्टी के उस ख़ास भोजन प्रभारी ने मुझे फोन पर बताया कि मजदूरों के पास तक भोजन भेजने की व्यवस्था कर पाना उनके लिए मुमकिन नहीं है. मैंने दिल्ली सरकार के श्रम मंत्री के पास भी इन मजदूरों के सहायतार्थ फोन किया पर वे श्रमिकों की सहायता में आगे बढ़ कर कुछ भी कर पाने में लाचार दिखे.

अखबारकर्मियों का असुरक्षित भविष्य

मैं एक फ्रीलांस जर्नलिस्ट हूँ. मेरी पूरी हैसियत एक कलम–मजदूर से ज्यादा कभी नहीं रही. हमारा पेट हमारे कलम के पसीने पर आश्रित है. यह अलग की बात है कि विकासशील राष्ट्र भारत में अब तक फ्रीलांस जर्नलिस्टों के हक़ के लिए अलग से कोई कानून, कोई नियमावली, कोई गाइडलाईन ही नहीं बना, जिसके आधार पर फ्रीलांस जर्नलिस्ट इकट्ठे होकर अपने अधिकारों की रक्षा कर सकें और मीडिया समूहों की गुलामी की जंजीर से मुक्त होकर जनपक्षधर पत्रकारिता का स्वरूप विकसित कर सकें. मजदूर दिवस के अवसर पर बेगूसराय के पत्रकार नवीन ने फेसबुक पोस्ट में कवि अशांत भोला को मजदूर–कवि के रूप में प्रस्तुत किया तो मुझे अच्छा लगा. मैंने कवि अशांत भोला की पूरी जिन्दगीं को अपनी आँखों से देखा है. मंचों पर कवि का सम्मानं प्राप्त करने वाले कविजी को लोगबाग कविजी, कविजी कहकर जितना भी सम्मान देते हों, उनकी पूरी हैसियत कभी भी एक कलम मजदूर से ज्यादा की नहीं रही. नतालिया कार्पेको ने मेरे एक लेख को पढ़ते हुए रूस से लिखा है कि लॉकडाउन के खिलाफ मजदूर सड़क पर विद्रोह कर रहे हैं, जिनके साथ कलाकार, गायक, कवि, पत्रकार भी खड़े हैं. इसलिए कि कलाकार, कवि, पत्रकार जो फ्रीलांसर की जिन्दगी जीते हैं तो उनके सामने भी रोटी के लाले आ गए हैं. रूस में क्रांति का इतिहास रहा है तो वहां इतिहास की पुनरावृति बहुत मुश्किल नहीं है.

भारत में हम कलम मजदूर अपने हक़ की बात तो तभी कर पायेंगे, जब भारत में अखबार बचेंगे. कोरोना की तालाबंदी ने जो जीवन की असुरक्षा का दहशत पैदा किया. उस दहशत में पूंजीवाद के नक्कड़खाने से यह दुष्प्रचार भी हुआ कि अख़बार कोरोना फ़ैलाने में सहायक हैं. पहले भारत में अखबार बेच कर गुजारा करने वाले लाखों अखबार विक्रेताओं की हालत पस्त हुई. अखबार बिकने कम हुए तो छपाई भी कम हुई और आज देश के सबसे बड़े अखबार समूह के पास 20 फीसदी ही पाठक शेष हैं. कई प्रतिष्ठित पत्रिकाएँ व अखबार स्थाई तौर से छपने बंद हो गए हैं. अखबारकर्मियों की छंटनी की गति रोज बढती जा रही है. लाखों पत्रकारों, अखबारकर्मियों के सिर पर अपने भविष्य की चिंता सवार है. पत्रकारों के हक़ की रक्षा में वर्किंग–जर्नलिस्ट यूनियन कानून सक्षम है लेकिन भारत की सर्वोच्च अदालत अखबारकर्मियों को वेजबोर्ड का वाजिब हक़ दिला पाने में अब तक अक्षम साबित हुई है.

बछावत आयोग और मनीसाना आयोग सुप्रीम कौर्ट ने ही गठित किए थे पर इन न्यायिक आयोगों की अनुशंसा के आलोक में अखबारकर्मियों को उनके हिस्से का वाजिब हक दिला पाने में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका लगातार हास्यास्पद साबित हुई. पटना स्थित टाईम्स ऑफ़ इण्डिया के श्रमिक जब वेज बोर्ड का हक़ मांगने सुप्रीम कोर्ट पहुँचे तो 56 कर्मचारियों को रातोंरात सडक पर फेंक दिया गया. 9 वर्षों से छटनीग्रस्त कर्मचारी पटना स्थित टाईम्स ऑफ़ इण्डिया के समक्ष धरनारत हैं. धरना देते हुए 4 कर्मचारियों की असमय मौत हो चुकी है. पत्रकार और पत्रकारिता तो मुख्यधारा की बौद्धिक वर्ग के सबसे महत्वपूर्ण घटक हैं. अगर पत्रकार और अखबारकर्मी ही मालिकों के शोषण की चक्की में पिसते रहेंगे तो मानवाधिकार और मानवतावादी भारत के निर्माण की कल्पना को दिवास्वप्न ही माना जाएगा.

उम्मीद है कि कोरोना के नाम पर पैदा की गई आर्थिक अराजकता के खिलाफ भारतीय श्रमिक वर्ग जल्दी ही इकट्ठा होकर भूख के खिलाफ भात के लिए संघर्ष का मोर्चा तैयार करे. पेट की आग दिमागों में सुलगेगी तो करोड़ों मेहनतकशों का पसीना और आँसू साथ होकर तेजाब बन जाएगा. गिरिजेश्वर भाई ने 2020 के मजदूर दिवस को मजबूर दिवस लिखा तो हम मजदूर की आत्मा आहात हुई. हमारे लिए यह मजदूर दिवस चुनौती और संकल्प का दिवस है. अपने सपनों को ताकतवर करते हुए मजदूरों, बेरोजगारों, युवा छात्रों, किसानों की व्यापक गोलबंदी के आधार पर नवजनवादी भारत के निर्माण के लिए संघर्ष व आकांक्षा का दिवस है. क्या आप शोषणमुक्त–मानवतावादी भारत के निर्माण के पक्षधर हैं? हम कलम मजदूर किसी से दया की भीख नहीं मांगते, हम अपने कलम की ताकत से अपने पसीने का सही दाम और वाजिब सम्मान चाहते हैं.

(लेखक प्रसिद्ध पुस्तक नंदीग्राम डायरी के लेखक हैं.)

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