हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन, दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है: मिर्ज़ा ग़ालिब




हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे, कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और‘ के माध्यम से ग़ालिब ने अपने ही शब्दों में अपनी शायरी की तारीफ़ भले ही की हो लेकिन अंदाज़ ए बयाँ यानी उनकी अभिव्यक्ति का अंदाज़ निराला तो था ही. ‘हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन, दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है का यह शेर उस जमाने में इस्लाम के किस परवाने को अच्छा लगा होगा लेकिन वह कहते गए और गरीबी और बेचारगी के बावजूद अपनी शायरी से दुनिया को मालामाल कर इस दुनिया से कूच कर गए. उन्हीं के अंदाज़ में इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना, दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना, वह फना हो गए इस दुनिया में दुनिया का एक क़तरा (बूँद) बन कर.

ग़ालिब का जन्म आगरा के काला महल में 27 दिसम्बर, 1979 को हुआ और उनका देहांत 15 फरवरी, 1869 को हुआ. ग़ालिब का असली नाम मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग खान था. ग़ालिब उनका लिखने का नाम था. उन्होंने उर्दू और फ़ारसी में शायरी की और उर्दू साहित्य को मज़बूत किया.

ग़ालिब की मृत्यु दिल्ली में जिस घर में गली कासिम जान, बल्लीमारन में हुआ जो पुरानी दिल्ली में है उसे ग़ालिब की हवेली कहते हैं. ग़ालिब की हवेली को ग़ालिब मेमोरियल में बदल दिया गया है जहाँ ग़ालिब के बारे में स्थायी तौर से प्रदर्शनी लगी होती है.

उर्दू साहित्य ग़ालिब की शायरी से भरी है. लेकिन इनके कुछ शेर तो आप गुनगुना भी सकते है और अपनी बात को प्रभावी बनाने में उपयोग भी कर सकते हैं.

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक

बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल (बच्चो की बगिया) है दुनिया मिरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ (दिन और रात) तमाशा मिरे आगे

बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना

दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा (दवा का आभारी) न हुआ
मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ

हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर (अच्छा बोलने वाले, कवि) बहुत अच्छे
कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और

हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

इशरत-ए-क़तरा (बूँद की ख़ुशी) है दरिया में फ़ना (ख़त्म) हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना

काबा किस मुँह से जाओगे ‘ग़ालिब’
शर्म तुम को मगर नहीं आती

कहाँ मय-ख़ाने (शराब खाना) का दरवाज़ा ‘ग़ालिब’ और कहाँ वाइज़ (प्रवचन देने वाला)
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले

कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए-नीम-कश (आधा चुभा हुआ तीर) को
ये ख़लिश (चुभन) कहाँ से होती जो जिगर के पार होता

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर (नास्तिक) पे दम निकले

न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता

क़र्ज़ की पीते थे मय (शराब) लेकिन समझते थे कि हाँ
रंग लावेगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती (बदहाली में ख़ुशी) एक दिन

रेख़्ते (उर्दू) के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो ‘ग़ालिब’
कहते हैं अगले ज़माने में कोई ‘मीर’ भी था

उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता

मिर्ज़ा ग़ालिब (Mirza Ghalib) के ऊपर बॉलीवुड (Bollywood) और टेलीविजन में ज्यादा काम नहीं हुआ. बॉलीवुड (Bollywood) में सोहराब मोदी की फिल्म ‘मिर्ज़ा ग़ालिब (1954)’ यादगार थी. टेलीविजन पर गुलजार (Gulzar) का टीवी सीरियल ‘मिर्ज़ा ग़ालिब (1988)’ भी मील का पत्थर है. फिल्म में भारत भूषण ने लीड रोल निभाया तो टीवी पर नसीरूद्दीन शाह (Naseeruddin Shah) ने मिर्ज़ा ग़ालिब को छोटे परदे पर जिंदा किया.

Liked it? Take a second to support द मॉर्निंग क्रॉनिकल हिंदी टीम on Patreon!