मोदी है तो मुमकिन है




-मोहम्मद मंसूर आलम

नोटबंदी में परेशानी हुई लेकिन यह परेशानी उतनी ही है जितनी किसी निर्माण में होती है. आप जब अपने खंडहर को उजाड़ कर नया महल बनाना चाहते हैं तो उसे आपको तोडना ही होगा. और तोड़ने में परेशानी होगी. नोटबंदी की परेशानी उतनी ही थी. नए भारत के निर्माण के लिए दीमक से ग्रस्त खंडहरनुमा भारत को ढाहना ज़रूरी था जो मोदी ने किया.

 

मई 26, 2014 में जब प्रधानमंत्री मोदी शपथ ले रहे थे तब राष्ट्रपति भवन में वैसी ही स्थिति थी जैसी स्थिति लगभग दशक पहले अमेरिका में थी जब बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति की शपथ ले रहे थे. यह दोनों चित्र विश्व इतिहास में दुर्लभ है.

मोदी और ओबामा का परिवेश लगभग सामान्य था. दोनों ही बेचारगी में पले बढे थे और दोनों ही अपने समाज में निचले तबके से ताल्लुक रखने के कारण तिरस्कृत थे. लोगों ने खासकर कांग्रेस के बड़े नेताओं ने जिन्हें दिल्ली विश्विद्यालय के बड़े सम्मानित कॉलेज में पढने का गौरव प्राप्त था एक गरीब के बेटे को पहले गुजरात का मुख्य मंत्री और अचानक प्रधानमंत्री पद की दावेदारी और फिर बाद में प्रधान मंत्री बनने से ख़ुशी नहीं थी. भला हो भी क्यों? जिनके पसीने से लोगों को बदबू आती है उसी तबके से एक इंसान को प्रधानमंत्री बनते हुए देखना गवारा क्यों होता?

आम आदमी के प्रधानमंत्री बनने की गुंजाइश सिर्फ भाजपा जैसी पार्टी में

यह केवल भाजपा जैसी पार्टी में ही हो सकता है जहाँ पार्टी का एक सामान्य सा कार्यकर्त्ता भी प्रधानमंत्री बनने का सपना ही नहीं देख सकता बल्कि उसे हकीकत होते हुए भी देख सकता है. मोदी उन करोड़ों भारतियों के चिर प्रतीक्षित अभिलाषाओं की पूर्ति का प्रतीक हैं. कांग्रेस में यह मुमकिन नहीं. समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल और शिव सेना जैसी पार्टियों में ऐसा कभी संभव नहीं. ये सामजिक न्याय का नारा लगाने वाले लोग अपने कार्यकर्ताओं से केवल ब्लॉक और थाना की दलाली का लाइसेंस तो दे देते हैं लेकिन उन्हें उस गद्दी पर बैठने का सपना देखने का कोई अधिकार ही नहीं है. न कोई रास्ता. दलित उत्थान के नाम पर खड़ी पार्टी का भविष्य मायावती के बाद क्या होगा यह कहना मुश्किल है. मायावती की पार्टी में मायावती के कद का कोई दलित नेता हो जो दलितों की बात करता है मुझे नहीं पता. मायावती के पीछे एक ही नेता है जिसके बारे में कहा जाता है कि वह सिर्फ उनकी ही सुनती हैं वह हैं सतीश मिश्रा. ऐसे में कोई इसमें कोई अजब नहीं कि कांसी राम की यह विरासत ही ख़त्म न हो जाए. राजद का यह हाल है कि लालू प्रसाद यादव के सबसे बेहतरीन सिपाहसालार पप्पू यादव, श्याम रजक, राम कृपाल यादव जैसे लोग उनसे अलग हो गए. नालायक पुत्र और पुत्री के मोह में लालू प्रसाद यादव कब सामाजिक न्याय के मन्त्र भूल गए पता ही नहीं चला. जिस लालू प्रसाद ने युनुस लोहिया जैसे ज़मीनी कार्यकर्त्ता को विधान पार्षद बनाया वही लालू पुत्री मोह में अपने सबसे करीबी और जनता के बीच रहने वाले नेता राम कृपाल यादव को त्याग दिया. आज राजद के कार्यकर्ताओं की बड़ी मण्डली को सहारा उसी राम कृपाल से मिलता है.

समाजवादी पार्टी का हाल तो यह है कि अखिलेश यादव ने सत्ता के लोभ में अपने बाप तक का त्याग कर दिया. लाल कृष्ण आडवाणी से सहानुभूति रखने वाले लोगों की टीस मैंने मुलायम सिंह यादव के किनारे कर देने पर नहीं देखी. जबकि हर अवसर पर मोदी ने आडवाणी को वह सम्मान दिया जो किसी सभ्य समाज में अभिभावक तुल्य इंसान को मिलता है.

तीन तलाक पर मुस्लिम औरतों के साथ लालची विपक्ष ने छल किया

तीन तलाक जैसे गैर क़ुरानी कानून से मुस्लिम औरतों पर सदियों से हो रहे अत्याचार पर जब मोदी ने नकेल कसनी चाही तो शरिया कानून के खिलाफ रहे वामपंथी भी शरिया कानून के पक्षधर हो गए. यह राजनीतिक दोगलापन (political hypocrisy) के अलावा कुछ नहीं. कांग्रेस अगर मुस्लिम हितैषी होती तो शाह बानो के मामले में ही कांग्रेस ने वह कर दिखाया होता जो अज मोदी ने किया. कम से कम मोदी की कोशिश से आज तीन तलाक असंवैधानिक तो है. सज़ा भी होगी. विपक्ष और छद्म बुद्धिजीवियों का यह तर्क मुझे समझ में नहीं आता कि जो असंवैधानिक है उसके लिए सज़ा क्यों? मुझे आश्चर्य होता उनकी सोच पर कि असंवैधानिक कार्यों के लिए वह अगर सज़ा मुक़र्रर नहीं करना चाहते तो क्या यह किसी संवैधानिक कार्य के लिए सज़ा का प्रावधान चाहते हैं? आज मुस्लिम औरतें आस में बैठी हैं कि सज़ा का प्रावधान हो और वह इस कानून से मुक्त हों. सज़ा के नाम पर तो अच्छे अच्छे शरीफों को पसीना आ जाए जो परदे में अपनी बीवियों और बहुओं को इस कानून से डराते रहते हैं. मुस्लिम समाज में आज भी औरतें स्वतंत्र नहीं हैं और जिसके चलते मर्द का सबसे बड़ा हथियार तीन तलाक है. तीन तलाक ख़त्म हो जाएगा सज़ा का प्रावधान होगा तो निश्चित ही औरतें अधिक मुक्त महसूस करेंगी.

नोटबंदी एक ऐतिहासिक फ़ैसला

किसी भी नेता के छप्पन इंच का सीना फ़ीता से नापा नहीं जा सकता. छप्पन इंच का सीना उसके कामों से नापा जाता है. विपक्ष फ़ीता लेकर मोदी का सीना नापना चाहती यह उसका महज़ दिमागी दिवालियापन है. विपक्ष का आरोप रहता है कि भाजपा बनिया के पैसे से चलता है. अगर इनकी बात मान लें तो इस नेता ने सबसे ज्यादा बनिया का नुकसान किया. मोदी ने नोटबंदी करके छप्पन इंच से सीना का सबूत दिया.

पटना के एक डॉक्टर के कम्पाउण्डर ने नोटबंदी के फ़ौरन बाद मुझसे कहा कि डॉक्टर साहब ने नोटबंदी के बाद अपने सारे स्टाफ को दो दो साल की सैलरी एडवांस में देने का प्रस्ताव दिया. उसका कहना था कि यह डॉक्टर पांच रुपया एडवांस न देता अगर नोटबंदी न होती. आश्चर्य की बात कि सबने उससे पैसे लेने से मना कर दिया. उस डॉक्टर ने अपने दीवान पलंग को बैंक बना रखा था. मोदी के इस छप्पन इंच वाले फैसले ने ऐसे कितने गैर कानूनी बैंक को बंद कर दिया.

विपक्ष ने नोटबंदी के दौरान हुए लाशों की गिनती कर कर के बताया. यही वही विपक्ष है जो आज पाकिस्तान के आतंकियों की लाश गिनने से कतरा रहा है. नोटबंदी से हुए मौत के आंकड़ों में कितनी सच्चाई है किसी ने इसका सबूत नहीं दिया लेकिन यह आज आतंकियों की लाशों का फोटो मांग रहे हैं. अचरज है न?

मुझे आश्चर्य इस बात का है कि मीडिया ने नोटबंदी के बाद जिन काला धन के मालिकों पर नकेले कसी गईं उसे नहीं दिखाया. हजारों की तादाद में नोटबंदी के बाद लोगों से सवाल पूछे गए, पेनल्टी हुई, संपत्ति जब्त हुए उसे दिखाने का साहस देशभक्त मीडिया को कम से कम करना चाहिए था.

नोटबंदी में परेशानी हुई लेकिन यह परेशानी उतनी ही है जितनी किसी निर्माण में होती है. आप जब अपने खंडहर को उजाड़ कर नया महल बनाना चाहते हैं तो उसे आपको तोडना ही होगा. और तोड़ने में परेशानी होगी. नोटबंदी की परेशानी उतनी ही थी. नए भारत के निर्माण के लिए दीमक से ग्रस्त खंडहरनुमा भारत को ढाहना ज़रूरी था जो मोदी ने किया.

मोदी की ये योजनाएं जिसका मैं कायल हूँ

मोदी ने कई योजनाओं को पांच सालों में सफलतापूर्वक चला कर दिखाया. आज भारत स्वच्छ दिखती है तो यह कमाल केवल मोदी का है. आज हमारे मोहल्ले, गाँव साफ़ नज़र आते हैं तो यह कमाल मोदी का ही है. भारत को स्वच्छ देखने का ख्वाब कइयों ने देखा था लेकिन मोदी ने इसे स्वच्छ करके दिखाया.

मोदी ने पेंशनधारियों के पैसे उनके अकाउंट में डलवाकर ब्लॉक और पंचायत स्तर के दलालों से गरीबों को मुक्त कर दिया. मुझे याद है जब पेंशनधारकों को वार्ड कौंसिलर के घर में झाड़ू देकर कार्ड बनवाना पड़ता था. सैकड़ों फर्जी कार्डधारक बनाए जाते थे और पैसे मुखिया, वार्ड कौंसिलर, बीडीओ और बड़ा बाबू में बंट जाते थे. आज वही वार्ड कौंसिलर घर घर जाकर पेंशन के कार्ड बनवाता है. क्योंकि अब भ्रष्टाचार की गुंजाइश कम है.

राजीव गांधी हमेशा कहते ही रहे कि उन्हें दुःख है कि 1 रुपए का मात्र 15 पैसा ही गरीबों को मिलता है. वह उनका जुमला था. उनहोंने अपने कार्यकाल में कभी इमानदाराना कोशिश नहीं की कि वह सुनिश्चित करें कि पैसा 1 रूपए का 1 रुपया गरीबों तक पहुँच जाए. गरीब माँ बहनों की भीड़ को घंटों ब्लॉक में जमा होते मैं ने देखा था. बहुतेरे को मैंने लौटते हुए भी देखा था. ब्लॉक के बड़ा बाबू ने कह दिया कि पैसे खत्म हो गए और मायूस महिलाएं लौट गईं. तब सवाल बस की बात नहीं थी. असली हकदारों को जो पैसे भिखारियों की तरह बांटे जाते थे आज उन्हें ससम्मान बैंक से मिलते हैं. वह अपने पैसे ज़रूरत के हिसाब से कभी भी निकाल सकते हैं. यह अद्भुत है.

आयुष्मान भारत गजब की कल्याणकारी योजना है. इस योजना ने उन गरीबों को एक आस दी है जो यह समझते थे कि गंभीर बीमारी के बाद मौत के दिन गिनने के अलावा और कुछ नहीं हो सकता. आज बड़े अस्पतालों में गरीबों का इलाज संभव है जिसका दीदार भी गरीबों को मयस्सर नहीं था.

उज्ज्वला योजना ने शहरी गरीबों के लिए बहुत काम किया है. जिनकी सैलरी ही महीने की तीन हज़ार रुपए थी वह क्या 5 हज़ार का गैस कनेक्शन लेने के कभी काबिल होते. आज गरीबों के घर में भी गैस से पकाने की व्यवस्था मौजूद है. यह गरीब भी उन करोड़ों लोगों की श्रेणी में आ गए जिन्होंने कभी गैस से खाना बनाने का ख्वाब देखा होगा.

इसमें कोई संदेह नहीं मुद्रा योजना, स्टार्ट-अप इंडिया और कई योजनाओं ने किसी भेद भाव के बगैर भारतवासियों की तकदीर बदली है.

मोदी काल में पत्रकारिता का मतलब बदला गया

आज मीडिया इस बात को फैलाती रही कि मोदी इंटरव्यू नहीं देते. मोदी सवालों से डरते हैं. इनका इस बात से कोई मतलब नहीं कि ये मोदी से सवाल पूछें. इन्हें इस बात से निराशा है कि मोदी के दी जाने वाले साक्षात्कार से इनका टीआरपी कितना बढ़ जाता.

जो मीडिया आज नरेंद्र मोदी को गुजरात दंगे को लेकर निशाना बनाने से अब तक नहीं चूकती उसी मीडिया ने हजारो दंगों का जवाबदेह तत्कालीन सरकार को कभी नहीं बनाया. यह बात हजम हो ही नहीं सकती कि सत्ता के हाँ के बगैर कोई दंगा हो जाए. मोदी के पांच साल के कार्यकाल में कहीं दंगे नहीं हुए. इस बात से मीडिया बेचैन है.

भागलपुर दंगे का मुख्य आरोपी लालू प्रसाद यादव द्वारा सम्मानित किया जाता है और मीडिया चुप रहती है. नीतीश कुमार की सत्ता में आने के बाद नीतीश ने सबसे पहला जो काम किया उस आरोपी को बेनकाब किया. नीतीश ने ही भागलपुर दंगा कमीशन बनाया. लालू ने वह काम नहीं किया था. नीतीश कुमार ने ही भागलपुर के दंगापीडितों को पेंशन देने की शुरुआत की थी.

मोदी है तो मुमकिन है

पांच सालों में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि जो सुधरी है वह अजूबा है. पांच सालों में पकिस्तान को वह सब करना पड़ा जो उसने आज तक कभी नहीं किया. सर्जिकल स्ट्राइक से विपक्ष भले ही मायूस हुआ हो लेकिन भारत के हर नागरिक को इससे ख़ुशी हुई.

हाल के पुलवामा आतंकी हमले के बाद जिस तरह से पाकिस्तान ने भारत के सामने सर झुकाया है वह अद्भुत है. अभिनंदन की जिस तरह से वापसी हुई ऐसा कभी नहीं हुआ. जेनेवा संधि के बावजूद कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तान ने नचिकेता को सौंपने में आठ दिन का समय लिया था. और वह भी जिस शान से अभिनंदन की वापसी इस बार हुई वह सपना था. पकिस्तान ने घोषणा करके ससम्मान अभिनंदन को लौटाया. नचिकेता को तो इसने रेड क्रॉस को सौंपा था. आज भी अगर मोदी नहीं होते तो पाकिस्तान आठ दस दिन के बाद अभिनन्दन को उसी तरह से लौटाता. यह सब इसलिए क्योंकि मोदी है.

मोदी है तो मुमकिन है.

(ये लेखक के अपने विचार हैं.)

 

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