दिल्ली दंगे की मनगढ़ंत कहानियों पर लिखी पुस्तक वापस ली गयी, प्रकाशक ने कपिल मिश्रा की मौजूदगी को कारण बताया




1993 में एबीवीपी से दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ की अध्यक्ष और मोदी सरकार का दिल्ली हाई कोर्ट में पक्ष रखने वाली अधिवक्ता मोनिका अरोड़ा और अप्रत्यक्ष रूप से आरएसएस और भाजपा से जुडी दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर सोनाली चितलकर और प्रेरणा मल्होत्रा द्वारा दिल्ली दंगे पर लिखी पुस्तक “दिल्ली रायट्स 2020: द अनटोल्ड स्टोरी” को ब्लूम्सबरी इंडिया ने बाज़ार में न उतारने का निर्णय लिया.

प्रत्यक्ष तौर पर ब्लूम्सबरी के इस निर्णय का कारण लेखिकाओं द्वारा पुस्तक के अधिकारिक लांच से पहले के एक कार्यक्रम में कथित तौर पर दिल्ली दंगा भडकाने वाले और सार्वजनिक तौर पर एक पुलिस ऑफिसर को हिंसा की धमकी देने वाले कपिल मिश्रा की मौजूदगी बताई गयी.

कपिल मिश्रा इस कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि थे. कपिल मिश्रा के अलावा इसमें विशिष्ट अतिथि के तौर पर कट्टरवादी हिंदुत्व की प्रोपगंडा और फेक न्यूज़ के लिए प्रसिद्ध वेब साईट ऑपइंडिया डॉट ऑर्ग की संपादिका नुपुर शर्मा, ‘बुद्ध इन अ ट्रैफिक जैम’ जैसी जंगल और जमीन की लड़ाई लड़ने वाले लोगों को अर्बन नक्सल बताने वाली प्रोपगंडा फिल्म के लेखक और निर्देशक विवेक अग्निहोत्री भी मौजूद थे. भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और राज्य सभा सांसद भूपेन्द्र यादव मुख्य अतिथि के तौर पर थे जिन्हें पुस्तक को लांच करना था.

ब्लूम्सबरी इंडिया ने अपने प्रेस रिलीज़ में पुस्तक वापस लेने पर कहा कि “हाल की घटनाओं के मद्देनज़र, हमारे संज्ञान में लाए बिना लेखकों द्वारा प्रकाशन से पहले आयोजित एक वर्चुअल लॉन्च और उन लोगों को इस लांच में शामिल करने पर जिन्हें प्रकाशकों ने मंजूरी नहीं दी होती, हमने किताब का प्रकाशन वापस लेने का फ़ैसला किया है।’

रिलीज़ में आगे कहा गया है कि ब्लूम्सबरी इंडिया बोलने की स्वतंत्रता का ज़ोरदार समर्थक है, लेकिन समाज के प्रति ज़िम्मेदारी की गहरी भावना भी रखता है।”

फ़रवरी में हुए दंगे में दिल्ली पुलिस की रिपोर्ट के अनुसार 40 मुसलमान और 12 हिन्दू मारे गए थे. करोड़ों की संपत्ति का नुकसान हुआ था. एक दर्जन से अधिक मस्जिद और मदरसे को जलाया गया था या जलाने की कोशिश की गयी थी.

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक सोनाली चीतलकर और प्रेरणा मल्होत्रा ​​और अधिवक्ता मोनिका अरोड़ा द्वारा लिखी गई इस पुस्तक से पता चलता है कि दंगा ‘जिहादियों’ और ‘अर्बन नक्सलियों’ ने किया था, उनके इस्लामिक स्टेट के साथ संबंध थे, और ‘पेशेवर शार्पशूटर’ शामिल थे। किताब जामिया और शाहीन बाग़ में सीएए के ख़िलाफ़ प्रदर्शन का भी दंगों से संबंध बताती है, और कहती है कि ‘प्रमुख क्षेत्रों में’ मुस्लिम भीड़’ ने हिंसा भड़काई।

हालांकि प्रकाशक द्वारा पुस्तक को वापस लेने पर कई सारे ऐसे लोग भी हैं जो हमेशा अभिव्यक्ति की आज़ादी के हिमायती रहे हैं और वह प्रकाशक के इस रवैये से नाराज़ हैं लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि भाजपा और आरएसएस से जुड़े लोग भी अभिव्यक्ति की आज़ादी का राग अलाप रहे हैं.

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