हिंदी साहित्य के शलाका पुरुष नामवर सिंह नहीं रहे




हिंदी के मशहूर समालोचक और साहित्यकार डॉक्टर नामवर सिंह ने दिल्ली एम्स में मंगलवार रात तकरीबन 11.50 बजे आखिरी सांस ली।

नामवर सिंह का जन्म 28 जुलाई 1927 को जीयनपुर (अब चंदौली) वाराणसी में हुआ था। उन्हें साहित्य अकादमी सम्मान से भी नवाजा गया है। नामवर सिंह हिंदी साहित्य जगत का सम्मानित नाम हैं। उन्होंने आलोचना और साक्षात्कार विधा को नई ऊंचाई दी है। नामवर सिंह ने साहित्य में काशी विश्वविद्यालय से एमए और पीएचडी की। इसके बाद इसी विश्वविद्यालय में पढ़ाया भी। यहां से रिटायर होने के बाद भी वे एमिरिटेस प्रोफेसर के तौर पर पढ़ाते रहे। उनकी छायावाद, नामवर सिंह और समीक्षा, आलोचना और विचारधारा जैसी किताबें चर्चित हैं।

आलोचना में उनकी किताबें पृथ्वीराज रासो की भाषा, इतिहास और आलोचना, कहानी नई कहानी, कविता के नये प्रतिमान, दूसरी परंपरा की खोज, वाद विवाद संवाद आदि मशहूर हैं। उनका साक्षात्कार ‘कहना न होगा’ भी सा‍हित्य जगत में लोकप्रिय है। नामवर सिंह ने सागर विश्वविद्यालय में भी अध्यापन का काम किया, लेकिन यदि सबसे लंबे समय तक रहने की बात करें तो वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्याल में रहे। यहां से रिटायर होने के बाद वे एमिरिटेस प्रोफेसर के तौर पर पढ़ाते रहे।

नामवर सिंह ने लोकसभा का चुनाव भी लड़ा था। उन्होंने 1959 में चकिया चन्दौली की लोकसभा सीट से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था लेकिन वह इसमें हार गए थे।

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