बालाकोट पर हवाई हमले का ढिंढोरा पीट कर नरेंद्र मोदी ने कश्मीर मसले को अंतर्राष्ट्रीय हस्तक्षेप का मसला बनाया: अरुंधती रॉय का बालाकोट, भारत और कश्मीर पर नज़रिया




-अरुंधती रॉय


टीवी पर दिन-रात चल रहा पागलपन मरीज को चढ़ाए जा रहे ग्लूकोज़ की तरह लोगों की रगों में उतारा जा रहा है. लोगों से कहा जा रहा है कि वे अपने दुख-दर्द, बेरोज़गारी, भूख, उजड़ते हुए छोटे व्यापार, घरों से विस्थापित किए जाने के खतरे, जजों की रहस्यमय मौत और भारतीय इतिहास के सबसे बड़े और भ्रष्ट दिखने वाले रक्षा सौदे की जांच की मांग भूल जाएं.

पाकिस्तान के बालाकोट में जल्दबाज़ी में की गई ‘रक्षात्मक’ एयर स्ट्राइक से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अनजाने में उन सब पर पानी फेर दिया है जो पिछली भारतीय सरकारें लगभग चमत्कारिक ढंग से बीते कई दशकों में हासिल करने में कामयाब रही थीं.

1947 से ही भारतीय सरकार कश्मीर विवाद पर अंतरराष्ट्रीय मध्यस्ता के हर सुझाव पर यह कहकर पल्ला झाड़ती रही कि यह हमारा ‘आंतरिक मसला’ है.
पाकिस्तान को जवाबी हमले के लिए उकसाकर, जिससे भारत और पाक इतिहास में दो ऐसे परमाणु शक्ति वाले राष्ट्रों के रूप में दर्ज हो गए, जिन्होंने एक दूसरे पर बम गिराए हैं, मोदी ने कश्मीर समस्या का अंतरराष्ट्रीयकरण कर दिया है.

उन्होंने सारी दुनिया के सामने यह दिखाया है कि कश्मीर इस दुनिया की शायद सबसे ख़तरनाक जगह है, जहां से परमाणु युद्ध शुरू हो सकता है. इससे हर उस व्यक्ति, देश और संगठन, जो परमाणु युद्ध की संभावनाओं को लेकर चिंतित है, को इसमें हस्तक्षेप का अधिकार है कि वह अपनी क्षमताओं के अनुसार इसे रोकने का भरसक प्रयत्न करे.

14 फरवरी 2019 को पुलवामा में अर्ध-सैनिक बल के 2,500 सैनिकों के एक काफ़िले पर आदिल अहमद डार नाम के बीस वर्षीय कश्मीरी युवक ने आत्मघाती हमला किया, जो घोषित तौर पर पाकिस्तान के संगठन जैश ए मोहम्मद से जुड़ा हुआ था.

यह हमला, जिसमें 40 से ज़्यादा लोग मारे गए, कश्मीर की त्रासदी में एक और भयावह अध्याय है. 1990 से अब तक इस संघर्ष में सत्तर हज़ार से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं, हज़ारों ‘लापता’ हो चुके हैं, दस हज़ार से अधिक लोग यातनाओं का शिकार बने और सैंकड़ो नौजवान पैलेट गन के चलते अपाहिज और दृष्टिहीन हो चुके हैं.

पिछले बारह महीनों में मरने वालों की संख्या साल 2009 के बाद सब से अधिक रही है. एसोसिएटेड प्रेस की रिपोर्ट है कि इस अवधि में लगभग 570 लोगों ने अपनी जानें गंवाई हैं, जिनमें 260 उग्रवादी, 160 आम नागरिक और 150 भारतीय सशस्त्र सेना के सदस्य थे, जो अपनी ड्यूटी निभाते हुए मारे गए.

इस संघर्ष को जिन भी नजरियों से देखा जाता है, उसके हिसाब से बागी लड़ाकों को ‘आतंकी’, ‘उग्रवादी’, ‘स्वतंत्रता सेनानी’ व ‘मुजाहिद’ कहा जाता है. अधिकांश कश्मीरी इन्हें ‘मुजाहिद’ कहते हैं और जब ये मारे जाते हैं तब उनके जनाज़े में हज़ारों की संख्या में लोग उन्हें आखिरी विदाई देने के लिए आते हैं, उनकी मौत पर शोक मनाते हैं, भले ही वे उनके काम करने के तरीके से इत्तेफ़ाक़ न रखते हों.

हक़ीक़त यह है कि पिछले एक साल में मारे गए अधिकांश आम नागरिक वे थे जो सैनिकों द्वारा घेरे गए उग्रवादियों को बच निकलने का मौक़ा देने के लिए ख़ुद ढाल बनकर खड़े हुए थे.

ख़ून में सनी इस लंबी गाथा में पुलवामा आतंकी हमला सबसे घातक और भीषण हमला है. कश्मीर घाटी में हज़ारों नहीं तो कम से कम सैंकड़ो आदिल अहमद डार मौजूद हैं जो युद्ध के माहौल में पैदा हुए और इतनी दहशत देखी कि ख़ौफ़ से बेख़ौफ़ हो गए हैं और आज़ादी के लिए अपनी जान क़ुर्बान करने को तैयार बैठे हैं.

किसी और दिन कोई और हमला हो सकता है, जो पुलवामा हमले से ज़्यादा भयावह हो सकता है. क्या भारत सरकार इस देश और पूरे उपमहाद्वीप का भविष्य इन युवकों के कृत्यों के हवाले कर देना चाहती है?

जिस तरह खाली नाटकीय अंदाज़ में नरेंद्र मोदी ने प्रतिक्रिया दी है, उससे तो ऐसा ही लगता है. उन्होंने वास्तव में इन लड़ाकों के हाथ में हमारा भविष्य तय करने की ताकत दे दी है. पुलवामा के उस युवा हमलावर को इससे ज़्यादा और कुछ चाहिए भी नहीं था?

अधिकांश भारतीय, जो ब्रिटिश राज से आज़ादी पाने की अपनी लड़ाई पर अभिमान करते हैं और इस लड़ाई के योद्धाओं को अपना पूज्य मानते हैं, कश्मीरियों के उसी तरह के संघर्ष के लिए वैसा भाव नहीं रखते. कश्मीर में जारी सशस्त्र संघर्ष, जिसे लोग ‘भारतीय शासन’ के खिलाफ संघर्ष मानते हैं, लगभग तीस बरस का हो चुका है.

यह कोई राज़ नहीं है कि पाकिस्तान (कभी आधिकारिक रूप से और अब अधिकतर गैर-सरकारी तरह से) इस संघर्ष को हथियार, लोग और साजो-सामान मुहैया कराने के जरिये समर्थन देता रहा है. न ही यह कोई ढकी-छुपी बात है कि कश्मीर जैसे संघर्ष क्षेत्र में कोई उग्रवादी बिना स्थानीय लोगों के प्रत्यक्ष समर्थन के सक्रिय रह सकता है.

अपनी सही मनोदशा में ऐसा कौन इंसान होगा जो यह सोच सके कि इस जटिल, नारकीय लड़ाई को शांत या हल करने का जरिया जल्दबाज़ी में की गई एक नाटकीय ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ हो सकती है, जो आखिर में उतनी ‘सर्जिकल’ भी साबित नहीं होती दिखती.

2016 में उरी में भारतीय सेना के कैंप पर हमले के बाद भी इसी तरह की एक ‘स्ट्राइक’ हुई थी, जिसका नतीजा एक बॉलीवुड एक्शन फिल्म से थोड़ा ज़्यादा निकला. बालाकोट स्ट्राइक इसी फिल्म से प्रेरित लगती है.

और अब मीडिया में यह ख़बरें आ रही हैं कि बॉलीवुड फिल्म निर्माताओं ने अपनी अगली फिल्म के लिए ‘बालाकोट’ नाम का कॉपीराईट पाने के लिए क़तार लगानी शुरू कर दी है. कुल मिलाकर इतना ही कहा जा सकता है कि यह निरर्थक मुहिम ‘बचावी’ से ज़्यादा ‘चुनावी’ नज़र आ रही है.

किसी देश के प्रधानमंत्री का अपनी ताकतवर वायुसेना को एक ख़तरनाक नाटकीय मुहिम में उतरने को बाध्य करना गंभीर रूप से अपमानजनक है.

और कैसी विडंबना है कि जब हमारे उपमहाद्वीप में ग़ैर-ज़िम्मेदाराना परमाणु तनातनी का यह खेल चल रहा है, उसी समय शक्तिशाली संयुक्त राष्ट्र अमेरिका ने उस तालिबान के साथ बातचीत शुरू कर दी है, जिसे वह 17 सालों की सीधी जंग के बावजूद हराने या डिगाने में नाकाम रहा.

उपमहाद्वीप में यह बढ़ता संघर्ष उतना ही घातक है, जितना नज़र आ रहा है. लेकिन क्या यह इतना सरल है?

दुनिया भर में कश्मीर सबसे अधिक संख्या में सैन्य बलों की मौजूदगी वाला इलाका है, जहां करीब पांच लाख भारतीय सैनिक तैनात हैं. इंटेलीजेंस ब्यूरो, रॉ, राष्ट्रीय जांच ब्यूरो, वर्दीधारी बल- जिनमें भारतीय सेना, सीमा सुरक्षा बल, सेंट्रल रिज़र्व पुलिस फोर्स (और ज़ाहिरन जम्मू व कश्मीर पुलिस भी)- सब अपने स्तर पर अलग-अलग खुफिया जानकारियां इकट्ठी करते हैं.

लोग मुख़बिरों, डबल एजेंट, ट्रिपल एजेंट की दहशत की साये में जीते हैं, जो असल में स्कूल के ज़माने के पुराने दोस्तों से लेकर परिवार के सदस्यों तक कोई भी हो सकते हैं. इन परिस्थितियों में पुलवामा जैसा इतना बड़ा हमला होना बेहद चौंकाने वाली बात है.

जैसे किसी ने ट्विटर पर एक सटीक टिप्पणी की है कि यह क्यों है कि भाजपा ‘3 किलो बीफ का पता लगा सकती है लेकिन 350 किलो आरडीएक्स का नहीं?’ ( उनका इशारा उत्तर भारत में गोकशी के आरोप में मुसलमानों को पकड़कर पीट-पीटकर मारने की दिनोंदिन बढ़ती घटनाओं की ओर था.)

कौन जाने?

पुलवामा हमले के बाद जम्मू कश्मीर के राज्यपाल ने इसे इंटेलीजेंस की विफलता बताया था. कुछेक साहसी मीडिया पोर्टल ने बताया कि जम्मू कश्मीर पुलिस ने असल में इस संभावित हमले को लेकर चेताया था. मीडिया में कोई इसके बारे में ज़्यादा चिंतित नज़र नहीं आता कि आख़िर इस चेतावनी को नज़रअंदाज़ क्यों किया गया और गलती कहां हुई?

यह भले ही दुखद हो, पर पुलवामा हमला नरेंद्र मोदी के लिए वो करने का एक बेहतरीन राजनीतिक अवसर था, जो करने में वो पारंगत हैं- तमाशा.

हम में से कई, जिन्होंने महीनों पहले इस बात की चेतावनी दी थी कि राजनीतिक जमीन खोती भाजपा चुनाव से पहले आग बरसाएगी, डर के साथ अपनी भविष्यवाणी को सच में बदलते देख रहे थे.

और हमने देखा कि सत्तारूढ़ दल ने किस तरह होशियारी से पुलवामा की त्रासदी को अपने तुच्छ राजनीतिक फायदों के लिए इस्तेमाल किया.

पुलवामा हमले के बाद तुरंत बाद गुस्साई भीड़ ने देश के अलग-अलग हिस्सों में पढ़ने और काम करने वाले कश्मीरियों पर हमले शुरू कर दिए. मोदी इस पर तब तक चुप्पी साधे रहे जब तक सुप्रीम कोर्ट ने नहीं कह दिया कि कश्मीरियों की सुरक्षा करना सरकार का दायित्व है.

लेकिन एयर स्ट्राइक के फौरन बाद टीवी पर दिखकर इसका श्रेय लेने में उन्होंने कोई देर नहीं की, जो ऐसा दिख रहा था मानो वे खुद जाकर विमान से बम गिराकर आए थे.

तुरंत ही भारत के कोई चार सौ दिन-रात चलने वाले समाचार चैनलों, जिनमें ज़्यादातर बिना किसी झिझक के पक्षपाती हैं, ने अपने निजी ‘इनपुट’ के साथ इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना शुरू कर दिया.

पुराने वीडियो और फर्जी तथ्यों के साथ चीखते एंकरों ने खुद को सीमा पर खड़ा कमांडो समझते हुए जुनूनी राष्ट्रवाद का ऐसा माहौल तैयार किया, जहां उन्होंने एयर स्ट्राइक में जैश ए मोहम्मद की ‘टेरर फैक्ट्री’ के ध्वस्त होने और करीब 300 ‘आतंकियों’ की मौत होने का दावा किया.

अगली सुबह के अख़बार, जिसमें सबसे संजीदा माने जाने वाले अख़बार भी शामिल थे, ऐसी ही हास्यास्पद और शर्मनाक सुर्ख़ियों से भरे पड़े थे. इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा- ‘पाकिस्तान में घुसकर भारत का आतंकियों पर हमला [‘India Strikes Terror, Deep in Pakistan’]

इस दौरान रॉयटर्स, जिसने अपने एक पत्रकार को पाकिस्तान में उस जगह भेजा था, जहां असल में बमबारी हुई थी, ने खबर दी कि केवल पेड़ों और चट्टानों को नुक़सान पहुंचा और एक ग्रामीण ज़ख़्मी हुआ. एसोसिएटेड प्रेस ने भी इसी तरह की खबर दी.
न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा, ‘नई दिल्ली के विश्लेषकों और राजनयिकों ने बताया कि भारतीय एयर स्ट्राइक के लक्ष्य अस्पष्ट थे क्योंकि सीमा के क़रीब काम करने वाले आतंकवादी समूह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कश्मीर हमले का बदला लेने के प्रण के बाद वहां से हट गए होंगे.’

भारत की मुख्यधारा की मीडिया ने रॉयटर्स की रिपोर्ट को कोई जगह नहीं दी, इसलिए भारत की मतदान करने वाली अधिकांश आबादी, जो न्यूयॉर्क टाइम्स नहीं पढ़ती, के लिए उनके 56 इंच के सीने वाले प्रधानमंत्री ने आतंकवाद को हमेशा के लिए ध्वस्त कर दिया.

कुछ ही समय के लिए ही सही, लेकिन ऐसा लगा कि मोदी ने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों, जो भारत के बहादुर पायलटों की प्रशंसा में ट्वीट कर रहे थे, को पूरी तरह चित कर दिया है. इस बीच मोदी और उसके साथी चुनावी मुहिम पर निकल गए.

एंटी-नेशनल होने का आरोप झेल रहे संदेह और असंतोष व्यक्त करने वाले हिंदुत्व ट्रोल्स के डर से आतंकित थे या फिर एक आवाज़ पर जमा होकर पीट-पीटकर मार डालने वाली भीड़, जो उत्तर भारत के हर गली के नुक्कड़ पर मौजूद है, से डरे हुए थे.

लेकिन यह सब एक दिन में बदल सकता है. इस झूठी जीत की चमक उस वक़्त फीकी पड़ गई जब पाकिस्तान ने जवाबी हमला किया, एक लड़ाकू विमान को मार गिराया और भारतीय वायुसेना के एक पायलट विंग कमांडर अभिनन्दन वर्धमान को हिरासत में ले लिया.

एक बार फिर भाजपा की डांवाडोल चुनावी संभावनाएं स्पष्ट रूप से कमज़ोर नज़र आने लगीं.

चुनावी राजनीति के कारोबार और अगला चुनाव कौन जीतेगा, को दरकिनार करते हुए भी मोदी के कदम माफ़ी के लायक नहीं हैं. उन्होंने करोड़ों लोगों की ज़िंदगी को खतरे में डाला है और कश्मीर के संघर्ष को आम हिंदुस्तानियों की दहलीज़ पर ला खड़ा कर दिया है.

टीवी पर दिन-रात चल रहा पागलपन मरीज को चढ़ाए जा रहे ग्लूकोज़ की तरह लोगों की रगों में उतारा जा रहा है. लोगों से कहा जा रहा है कि वे अपने दुख-दर्द, बेरोज़गारी, भूख, उजड़ते हुए छोटे व्यापार, घरों से विस्थापित किए जाने के खतरे, जजों की रहस्यमय मौत और भारतीय इतिहास के सबसे बड़े और भ्रष्ट दिखने वाले रक्षा सौदे की जांच की मांग भूल जाएं.

वे अपनी इस चिंता कि उन पर मुस्लिम, दलित या ईसाई होने के चलते हमला हो सकता है या वे मारे जा सकते हैं- को छोड़कर राष्ट्रीय गौरव के नाम पर उन्हीं लोगों को वोट दें, जो इस बर्बादी के ज़िम्मेदार हैं.

इस सरकार ने हिंदुस्तान की रूह को गहरे तक नुकसान पहुंचाया है. इसे भरने में बरसों लगेंगे. यह प्रक्रिया कम से कम शुरू हो, इसके लिए ज़रूरी है कि हम इन ख़तरनाक, प्रदर्शन-लोलुप धूर्तों को सत्ता से निकालने के लिए वोट करें.

हम ऐसे प्रधानमंत्री का आना बर्दाश्त नहीं कर सकते, जिसने किसी झोंक में आकर, रातोंरात बिना किसी की सलाह के देश की अस्सी फीसदी मुद्रा को अवैध घोषित करते हुए करोड़ों की आबादी वाले देश की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी हो.

क्या इतिहास में किसी ने कभी ऐसा किया है? हम एक परमाणु शक्ति संपन्न देश में एक ऐसा प्रधानमंत्री बर्दाश्त नहीं कर सकते, जो देश में संकट की घड़ी आने पर किसी नेशनल पार्क में अपने ऊपर बनने वाली फिल्म की शूटिंग में व्यस्त रहे और फिर ओछेपन से ऐलान कर दे कि आगे क्या किया जाये- यह उन्होंने फैसला सेना पर छोड़ दिया है.

किस लोकतांत्रिक देश में किसी चुने हुए नेता ने ऐसा किया है?

मोदी को जाना होगा. उनकी जगह आ सकने वाली झगड़ालू, विभाजित, अस्थिर गठबंधन की सरकार समस्या नहीं है. लोकतंत्र का सार यही तो है. यह सरकार कहीं ज़्यादा समझदार और कम मूर्ख होगी.

पाकिस्तान द्वारा हिरासत में लिए गए विंग कमांडर का मामला अभी बाकी है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के बारे में किसी की जो भी राय हो, और कश्मीर के संघर्ष में पाकिस्तान की जो भी भूमिका रही हो, लेकिन उन्होंने इस पूरे संकट के दौरान गरिमा और सादगी का परिचय दिया है.

भारत सरकार की यह मांग बिल्कुल जायज़ थी कि वर्धमान को वे तमाम अधिकार प्राप्त हों, जो जेनेवा कन्वेंशन के तहत एक युद्ध के क़ैदी को मिलते हैं. उसकी यह मांग भी दुरुस्त थी कि वह जब तक पाकिस्तान की हिरासत में रहें, रेड क्रॉस की अंतरराष्ट्रीय समिति (आईसीआरसी) को उनसे मिलने दिया जाए.

इसके बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने यह ऐलान किया कि सद्भावना के तौर पर विंग कमांडर को रिहा किया जाएगा.

मुमकिन है कि भारत भी कश्मीर और देश के बाकी हिस्सों में अपने राजनीतिक बंदियों के साथ ऐसा भद्रता भरा व्यवहार कर सकता है- जेनेवा कन्वेंशन के तहत उनके अधिकारों का संरक्षण और रेड क्रॉस की अंतरराष्ट्रीय समिति तक पहुंच देकर?

जिस युद्ध के बीच हम लोग हैं, वह भारत-पाकिस्तान की जंग नहीं है. यह एक ऐसी लड़ाई है जो कश्मीर में लड़ी जा रही थी और अब बढ़कर भारत-पाक के बीच एक दूसरी जंग की शुरुआत बन गई है.

कश्मीर न बयां की जा सकने वाली हिंसा और गिरती नैतिकता का ऐसा मंच है, जहां से हमें किसी भी पल हिंसा और परमाणु युद्ध में धकेला जा सकता है.

ऐसा होने से रोकने के लिए कश्मीर के संघर्ष पर बात करते हुए इसका हल निकालने की ज़रूरत है. और ऐसा तब ही हो सकता है जब कश्मीरियों को आज़ादी से, बिना किसी डर के यह बताने का मौका दिया जाए कि वे किसके लिए लड़ रहे हैं और क्या चाहते हैं.

प्यारे दुनियावालो! कोई तो रास्ता निकालो.

अरुंघती रॉय जानी मानी लेखिका हैं. उनकी यह लेख अंग्रेजी में मूल रूप से हफिंग्टन पोस्ट पर प्रकाशित हुआ है, जिसे द वायर हिंदी  ने अर्जुमन्द के अनुवाद के साथ प्रकाशित किया. इसका मौलिक अधिकार इन दो के पास है. द मॉर्निंग क्रॉनिकल इस पर अपना अधिकार व्यक्त नहीं करता.

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