राष्ट्रीय प्रेस दिवस: मीडिया की निष्पक्षता का आईना है सीतामढ़ी सांप्रदायिक हिंसा का कवरेज




-मनीष शांडिल्य

आज राष्ट्रीय प्रेस दिवस है. यह एक मौका भी है कि जब ठहर के यह देखा जाए कि मुख्यधारा का मीडिया किस स्थिति में है, उसका चाल-चरित्र और उसकी निष्पक्षता का हाल क्या है.

हाल में ही बीबीसी के लखनऊ में आयोजित कार्यक्रम #BeyondFakeNews में वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने कहा था कि आजकल मीडिया ने ही बहुत सी ख़बरें ग़ायब कर दीं हैं. उन्होंने कहा कि अब तो ‘नो न्यूज़ भी फ़ेक न्यूज़ है.’ रवीश कुमार के इस कहे को बिहार की मुख्यधारा की मीडिया ने बीते एक महीने से भी कम समय में कम-से-कम दो बार सच साबित किया है.

खबर जो गायब कर दी गई

हाल में संपन्न हुए दशहरे के बाद 20 अक्तूबर को बिहार के सीतामढ़ी शहर में दुर्गा प्रतिमा विसर्जन का जुलूस एक ऐसे इलाक़े से निकाला गया जो प्रशासन की नज़रों में संवेदनशील था. नतीजा ये कि विसर्जन जुलूस पर पथराव की ख़बर आई और फिर प्रतिमा विसर्जन के लिए दूसरे रास्ते से ले जाई गई. लेकिन इसकी खबर जैसे ही शहर के अन्य हिस्सों में फैली, बड़ी संख्या में लोगों ने संवेदनशील इलाके के उस मुहल्ले पर हमला कर दिया.



दोनों तरफ़ से पथराव हुआ. पुलिस ने मामले में दख़ल दिया, इंटरनेट बंद कर दिया गया और पुलिस ने दावा किया कि उसने जल्द ही स्थिति पर नियंत्रण कर लिया. लेकिन इन सबके बीच लौटती भीड़ ने 80 साल के एक बुजुर्ग ज़ैनुल अंसारी को पीट-पीट कर मार डाला. यही नहीं सबूत मिटाने के लिए लाश को जलाने की कोशिश की गई.

20 अक्तूबर को बिहार के सीतामढ़ी शहर में दुर्गा प्रतिमा विसर्जन के बाद सांप्रदायिक हिंसा हुई जिसे लगभग सभी प्रमुख मीडिया ने कुछ समय तक दबा कर रखा

हर लिहाज़ से यह बहुत बड़ी खबर थी. देश ही नहीं बिहार के भी सांप्रदायिक और राजनीतिक-सामाजिक माहौल को देखते हुए इस खबर की अहमियत और भी ज्यादा थी. लेकिन यह खबर करीब दस दिनों तक मुख्यधारा मीडिया में दबी रही. पटना से छपने वाले हिंदी-अंग्रेजी के लगभग हर बड़े अखबार और हर अहम क्षेत्रीय चैनल से यह खबर गायब रही. माना जा रहा है कि ऐसा इन मीडिया संस्थानों ने बिहार सरकार की छवि बनाये रखने के लिए किया. हालाँकि फिर धीरे-धीरे कर यह खबर राष्ट्रीय और कुछ अंतर्राष्ट्रीय मीडिया संस्थानों के जरिए बड़े पैमाने पर सामने आई.

पच्चीस दिन बाद भी मीडिया रही चुप

ट्वीटर पर नेताओं के बयान पर आज-कल रोज खबरें बनती हैं. बिहार के नेताओं में नेता-प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ट्वीटर पर खूब सक्रिय रहते हैं. उन्होंने गुरुवार सुबह-सुबह कई ट्वीट्स कर बिहार सरकार पर यह आरोप लगाया कि वह मुख्यमंत्री आवास पर लगे कैमरे से उनकी जासूसी कर रही है. इन ट्वीट्स पर आधारित खबर को गुरुवार को समाचार चैनल्स ने प्रमुखता से दिखाया और अगले दिन अख़बारों ने इसे प्रमुखता से छापा भी.

लेकिन तेजस्वी यादव के ठीक एक दिन पुराने यानी कि बुधवार के ट्वीटस को बिहार के मीडिया ने लगभग ब्लैक-आउट कर दिया क्यूंकि ये ट्वीटस सीतामढ़ी सांप्रदायिक हिंसा से जुड़े थे. बुधवार को सीतामढ़ी साम्प्रदायिक हिंसा पर सरकार को घेरते हुए तेजस्वी यादव ने ट्वीटर पर लिखा, “25 दिन पहले बिहार के सीतामढ़ी में संघ प्रशिक्षित मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा संरक्षित उन्मादी भीड़ ने 82 वर्षीय बुजुर्ग जैनुल अंसारी को जमकर पीटा फिर गला रेत सरेआम चौक पर जिंदा जला दिया था. और तो और प्रशासन ने उन्हें 75 किमी दूर दूसरे जिले में दफ़नाया. जनादेश के चीरहर्ता एवं सृजन चोर मुखिया आदरणीय नीतीश कुमार की नकारा पुलिस ने अभी तक जान-बूझकर 82 वर्षीय बुज़ुर्ग को ज़िंदा जलाने वाले दंगाईयों को नहीं पकड़ा है ताकि वो दरिंदे फिर किसी और को ज़िंदा जला सके और नीतीश जी चुनाव से पहले सांप्रदायिक तनाव पैदा कर वोटों की फ़सल काट सके.”

वैसे यहाँ यह बताते चलें कि तेजस्वी ने भी सीतामढ़ी साम्प्रदायिक हिंसा के पच्चीस दिन बाद ही अपनी चुप्पी तोड़ते हुए ये ट्वीट्स किए थे.

रास्ता क्या है?

आज मुख्यधारा की मीडिया आम तौर पर जिस चिंताजनक हालात में है उसमें बड़ा सवाल यह है कि जनता को निष्पक्ष खबरें सही समय पर कैसे मिले जो कि उसका अधिकार है. इसका कोई एक जांचा-परखा और सटीक तरीका तो फिलहाल दिखाई नहीं देता लेकिन एक रास्ता ये हो सकता है कि जनता खबर दबाने या अधूरी या गलत खबर दिखाने वाले संस्थानों के खिलाफ शिकायत करे, सड़क पर उतरे. शिकायत सीधे-सीधे संस्थानों से भी की जाए. सोशल मीडिया के जमाने में विरोध जताने का एक नया मंच भी उपलब्ध है.



अंत में एक बात. जनता की सीधे-सीधे नाराजगी पर मीडिया संस्थान ध्यान देने को मजबूर होते हैं क्यूंकि ये अभी भी कहीं-न-कहीं पाठकों-दर्शकों के ताकत से ही चलते हैं. उदाहरण के लिए, झारखण्ड के कुछ आदिवासी समूह कुछ महीनों पहले पथलगढ़ी और आदिवासियों से जुड़े मामलों के कवरेज पर वहां के कुछ अख़बारों से नाराज हो गए और इन अख़बारों के बहिष्कार की घोषणा कर दी. इसका अख़बारों के सर्कुलेशन पर जितना असर पड़ा उससे ज्यादा इस फैसले ने अखबार प्रबंधनों के माथों पर चिंता की लकीरों को गहरा किया.

(लेखक युवा पत्रकार हैं)

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