रोज़गार पर जुमलेबाज़ी तो नहीं हो सकती?




-सी. ए. प्रियदर्शी

अपने ही लोगों के साथ किए गए छल करने की संसदीय परिपाटी को बदस्तूर जारी रखते हुए बीजेपी ने शासन में आकर एक भी मौलिक वादे को पूरा नहीं किया है। यह पहली केंद्र सरकार है जिसने गरीबी उन्मूलन के लिए एक भी कार्यक्रम नहीं दिया है। रोजगार देने वाली एक भी मौलिक योजना नहीं दी है।

कृषि क्षेत्र के लिए यह नेहरु परम्परा की नहीं इंदिरा परम्परा की सरकार है। जो सिंचाई, उत्पादकता, कृषि सुधार के कार्यक्रम और सहायक संरचना बनाने के एक भी मौलिक उपाय नहीं लायी है। अनाज संरक्षण के लिए गोदाम बनाना, कोल्ड स्टोरेज, खेती का विकास, बीज क्रांति, कृषि विश्वविद्यालय इनके एजेंडे में नहीं है। कोसी बाढ़ नियंत्रण, टाल जल्ला जमीनों का संवर्धन, इस सरकार की प्राथमिकताओं में नहीं है। चीनी मिलों को चालू करना, निर्माण की छूट गई  योजना में सरकार का आगे बढ़ कर दखल देना, पिछड़े इलाके के विकास की योजना इनकी प्राथमिकता नहीं है। उत्पादक रोजगार की योजनाएँ बनाने में इनकी दिलचस्पी नहीं है।

ओमान के एक स्टेडियम में 10 फरवरी को भारतीयों की एक बहुत बड़ी सभा को संबोधित करते हुए श्री नरेन्द्र मोदी मानो 2019 के चुनाव अभियान की शुरुआत कर रहे थे। उन्होंने तफसील से सरकार की उपलब्धियों को गिनवाया। वहीं उन्होंने भारत को विश्व का सबसे निराला देश बताते हुये यहाँ की विविधता को बताया। कई भाषा  में उन्होंने नमस्कार भी किया। अगर इसी तर्क पर चलते हुये वे विश्व में अपना स्थान ऊँचा करने में लगे रहे तो निश्चय ही उन्हें अपने देश में सभी धर्मों का समादर करना होगा। तब उनकी पार्टी कटघरे में आयेगी कि उसने सोलह करोड़ आबादी वाले प्रांत उत्तर प्रदेश में एक ही धर्म के लोगों को अपना उम्मीदवार बनाया। नरेन्द्र मोदी यदि अपने दावे में रोजगार क्षेत्र में सफलता का उल्लेख करते तो खुद ओमान की यह बड़ी सभा प्रश्न चिन्ह बन जाती, क्योंकि बेरोजगारी की ही वजह से अनेक लोग भारत छोड़ने के लिये मजबूर हैं।

मोदी ने गिनाया – 1. कानून का राज; कम सरकार-ज्यादा गवर्नेंस ऐसा करने के लिए उनकी सरकार ने हर रोज एक-एक कर 1400 फालतू कानून को खत्म किया; 2. केन्द्र सरकार की योजना के अनुसार सभी बैंक 90 पैसे प्रतिदिन या 1 रू प्रति महीना पर जीवन बीमा देते हैं; 3. एक करोड़ परिवार को, यानी चार करोड़ गरीबों को सरकार ने हेल्थ बीमा करा कर साल में 5 लाख रु तक के इलाज लायक सुविधा देना तय किया है; 4. लोग अब हिसाब यह मांगते हैं कि कितना आया (उनके खाते में)? पहले हिसाब लगाते थे कि कितना गया (भ्रष्टाचार के मामलों में); और 5. काम में टाल मटोल नहीं होता, काम पूरा करते हैं। नेहरु ने नर्मदा बांध का शिलान्यास किया था। पूरा नहीं कर रहे थे। अब वर्क कल्चर बदलने से काम दोगुना होता है। रेल लाइन बन रही है, नए कोरिडोर बने। एविएशन, नेविगेशन की मुक्कम्मल नीति तक नहीं थी। अब तक 450 हवाई जहाज थे, अब कंपनियों ने 900 नए हवाई जहाजों का ऑर्डर दिया है।

ठीक है कि, रोज एक की जगह 6 किलोमीटर सड़क बना रहे हैं, रेल लाइन की अधियाचना बढ़ा रहे हैं। पर कांग्रेस मुक्त भारत के लिए क्या है आपके पास? कांग्रेस ने तो भाखड़ा नांगल से लेकर नर्मदा बांध की मल्टीपरपस योजना जारी रखी थी। शास्त्री ने जय जवान, जय किसान का नारा मात्र नहीं दिया था। पूसा, पंत नगर, अमृतसर जैसी कृषि शोध की संरचना दी थी। मोरारजी की जनता पार्टी सरकार ने छठी पंचवर्षीय योजना रोक कर, रॉलिंग प्लान मॉडल शुरू कर, कृषि के विकास की प्राथमिकता वाली योजनाएँ देकर रोजगार के साथ विकास की अनेक शुरुआतें की थीं। सभी 600 जिलों में लघु उद्योग की पट्टी बनाई थी। तीन साल भी शासन नहीं चला पाए मोरारजी। पर तब के इंदिरा कांग्रेस काल के गिरावट से देश को उबारने वाले कई स्पष्ट दिखने वाले दावे थे। गैरकांग्रेसवाद की नैतिक अपील तब थी, उसके पीछे मौलिक बल था। मोरारजी के समय महंगाई के बिना विकास का ढाई साल के मुकाबले आज पेट्रोल बेचने वालों की कमाई अधिकतम स्तर पर ले जाने की प्राथमिकता वाला विकास है। मानो सबकुछ कॉर्पोरेट मुनाफा के लिए हो।

कांग्रेस ने शासन को गंदे स्तर तक ला गिराया था। भ्रष्टाचार के खिलाफ हर दूसरे तीसरे सप्ताह कॉमर्स अखबार संपादकीय या अग्रलेख लिखते रहे थे। तब जब संघर्षों की शक्तियां शासन के गिरते स्तर को बैरिकेड कर पाने के लिए एक होने की स्ट्रेटजी बना पाने में विफल रहीं। तो उस स्थिति में स्वाभाविक ही, प्रबल विपक्ष की दावेदारी मोदी ने की। बुड्ढे हो रहे हताश पार्टी भाजपा को भी इससे बल मिला। पार्टी को हथियाकर और बुड्ढे, आत्महीन आरएसएस का संपूर्ण समर्थन हथिया लेने के बाद, नरेंद्र मोदी ने तीखा अभियान चला दिया था। आरएसएस व बीजेपी को तीखे कैंपेन में उतारने के लिए मोदी ने पहले कथित हजारों करोड़ रुपयों की प्रचार योजना से शुरू कर जो कारपोरेट बिसात बिछाई , उसमे उनके लोग तो समा ही गए, जनता भी आ गई। कांग्रेस शासन के गिरे स्तर से, आज तक इनका काम चल रहा है। हालाँकि हर बार मुंह की खाने को तैयार भारतीय जनता पार्टी को जीत दिला कर मोदी ने इसे अपने नियंत्रण में बनाए रखा है।

जहां मोरारजी ने इस तरह शासन दिया था कि रोजगार बढ़े, महगांई नहीं बढ़े, वही मोदी ने तो स्टेगफ्लेशन (stagflation) की भूमि बना दी है।

क्लासिकल ढंग की अर्थव्यस्था में रोजगार बढ़ाने से आरंभ में महंगाई बढ़ती है। पर स्टेगफ्लेशन एक नई अवस्था है, रोजगार घटने और महंगाई बढ़ने की गतिरोध वाली अवस्था।

रोजगार के ताजा बहस में स्वरोजगार पर बात शुरू करें। पकौड़ा बेचने का बयान केरिकेचर बना दिया गया। यह गलत किया गया। पकौड़ा बेचना स्वरोजगार का काम है। इस काम में आप रोजगार दे भी सकते हैं। पॉलिटकल इकोनॉमी पर बात बंद कर दी गई है। इसलिए करोड़ों की संख्या में स्ट्रीट वेंडर्स का खयाल नहीं किया गया। स्वरोजगार को अच्छे बहस का मसला नहीं बनाया गया। कोई भी स्त्री-पुरुष, सरकार से रोजगार की पूर्ण गारंटी की अपेक्षा करेगा तो स्वरोजगार के पक्ष में नीति और योजना की मांग करेगा।

मैंने अपनी तरह से मुक्कमल जाँच कर और इत्मीनान करके ही लिखा है कि रोजगार देनेवाली योजना और नीति पर सरकार का जोर नहीं है। बिजली के प्रसार पर काम पहले से तेज है। यह गाँव में खेती और लघु उद्योग में बूस्टर होगा। पर ऐसा हुआ नहीं।

भारत में बीस करोड़ की बेरोजगारी है। 1980 में भी बीस करोड़ लोग बेरोजगार थे और आज भी उतने ही लोग बेरोजगार हैं। हालाँकि सरकार के पास पहले से बहुत ज्यादा पैसा है।

सन 1980 में एक तिहाई आबादी बेरोजगार थी। अवसर बढ़ने के बावजूद आज आबादी का पांचवां भाग बेरोजगार है।

पांच साल में पाँच करोड़ रोजगार के अवसर बनाकर भारत के बीस करोड़ बेरोजगारों के लिए क्रांतिकारी, परिस्थिति बनाई जा सकती है। भारत के मध्य काल में शेरशाह जैसा शासक हुआ था। उसने पाँच वर्षों में ही देश पर असर डालने वाली ऐसी योजना को पूर्णतः पूरा किया था कि उसकी याद आज तक ताजा है।

पूर्ण रोजगार संभव है यह विश्वास निराधार नहीं है।

एक ही उदाहरण लें। यदि गंगा को अविरल बहाने देना सुनिश्चित करके बिहार, यूपी और बंगाल की नदियों का समुचित नियोजन हो तो करोड़ों रोजगार पैदा होगा। जापान ने बुलेट ट्रेन ही नहीं पानी के नियोजन की सफल योजनाएँ दी हैं। जापान में गंगा होती तो कई टनल से गुजर कर भी अविरल बहती होती।

नदी में सिंचाई, पीने का पानी, बिजली, मछली, शाक सैवाल, खाद, सिल्ट, माल ढुलाई, नौकायान, नेविगेशन, पर्यटन, कुल ग्यारह उत्पादन बढ़ाने की संभावना है।

यह तो केवल मिसाल के लिए कही गई बात है। रोजगार को बढ़ाने वाली बड़ी, छोटी परियोजनाएँ चाहिए।

स्माल इज़ ब्यूटीफुल की अवधारणा है जो रोजगारोन्मुखी विकास मॉडल कहलाता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हिमालयन इज़ अग्ली अर्थात जहाँ जरूरी होगा, बड़ी योजना देनी होगी। नदी जल से बिजली और विकास के अन्य दस माध्यम कई बार बड़ी योजना भी हो सकती हैं।

देखना यह है कि रोजगार को छोड़ कर इस बार 15 अगस्त को क्या कहेंगे मोदी!

(चक्रवर्ती अशोक प्रियदर्शी जाने माने लेखक, पत्रकार और सामाजिक और राजनीतिक कर्मी हैं।)

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