दुनिया भर में कोरोना की लड़ाई में शहीद हर पांचवां डॉक्टर मुसलमान




बाएँ से: अरीमा नसरीन, हबीब ज़ैदी, अल्फ़ा सादु, अमजद एल-हवारानी और आदिल एल टायर पहले और मुस्लिम डॉक्टर्स थे जो COVID19 से लड़ते हुए अपनी जान दे दी (चित्र साभार: बीबीसी, अल-जज़ीरा और द टेलीग्राफ)

-अब्दुल रशीद अगवान

भारतीय मुसलमान जहाँ विश्व महामारी के कारण लॉक डाउन के दौरान फेक न्यूज़ और फ़ासीवादी मीडिया के निशाने पर हैं,  यूनाइटेड किंगडम और अन्य जगहों पर इस समुदाय के लोगों को इस महामारी से लड़ने के कारण दिए गए बलिदान के कारण मसीहा के रूप में बहुत ही सम्मान के साथ देखा जा रहा है.

8 डॉक्टरों और नर्सों में से, जिनकी मौत अब तक यूनाइटेड किंगडम में कोविड-19 आपदा से फ्रंट लाइन योद्धाओं के तौर पर लड़ते हुए हुई, उनमें 5 मुस्लिम थे. यह उस समुदाय का महान योगदान है जिसकी आबादी यूनाइटेड किंगडम की कुल आबादी का मात्र 5% है.

डॉ हबीब ज़ैदी (Dr Habib Zaidi) इंग्लैंड के पहले डॉक्टर थे जिन्होंने कोविड-19 संक्रमण के कारण 25 मार्च को महामारी के खिलाफ लड़ाई में अपना जीवन त्याग दिया. 76 वर्षीय डॉ ज़ैदी एसेक्स (Essex) में जनरल फिजिशियन के तौर पर काम कर रहे थे. उनकी मौत संक्रमण के 24 घंटे के अंदर हो गयी. उनकी तीन पीढियां यूनाइटेड किंगडम में डॉक्टरी के इस पेशे से जुडी हैं.

उसी दिन, वेस्ट मिडलसेक्स यूनिवर्सिटी अस्पताल में कार्यरत एक अन्य मुस्लिम डॉक्टर डॉ आदिल एल टायर (Dr Adil El Tayer) की भी वायरल संक्रमण से मृत्यु हो गई. सूडानी मूल के इस 63 वर्षीय डॉक्टर महामारी के खिलाफ युद्ध में सेवारत थे और इस नए कोरोनवायरस के शिकार हो गए. उनहोंने यहाँ से पहले कई सऊदी अरब, सूडान और इंग्लैंड के कई बड़े अस्पताल में अपनी सेवा दी थी.

28 मार्च को, लीसेस्टर के ग्लेनफील्ड अस्पताल के डॉ अमजद एल-हवारानी (Dr Amged El-Hawrani of Glenfield Hospital) की भी वायरस से मृत्यु हो गई.

व्हिटिंगटन अस्पताल के 68 वर्षीय डॉ अल्फ़ा सादू (Dr Alfa Sa’adu) ने भी मार्च के आखिरी दिन महामारी से लड़ते हुए दम तोड़ दिया. वह मूल रूप से नाइजीरिया के रहने वाले थे और 40 वर्षों से ब्रिटेन की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा से जुड़े थे.

ब्रिटेन में वायरस की सबसे नई शिकार, वेलेमा मनोर अस्पताल में 36 वर्षीय स्टाफ नर्स, अरीमा नसरीन (Areema Nasreen) हैं,  जिनके अंदर 13 मार्च को कोरोनोवायरस के लक्षण विकसित हुए और आखिरकार 3 अप्रैल को जीवन के संघर्ष से मुक्त हो गईं.

ब्रिटिश इस्लामिक मेडिकल एसोसिएशन के महासचिव डॉ सलमान वकार ने मुस्लिम डॉक्टरों के इस अनूठे योगदान पर टिप्पणी की कि “इसे गिना नहीं जा सकता”. उन्होंने कहा, “वे समर्पित पारिवारिक लोग और वरिष्ठ चिकित्सक थे, और अपने समुदायों और रोगियों की सेवा में दशकों से समर्पित थे.”

संयुक्त राज्य अमेरिका में, दो युवा मुस्लिम डॉक्टरों, काशिफ चौधरी और नाला शीरीं (Kashif Chaudhry and Naila Shereen) की वायरल कहानी से हम सबको प्रेरणा मिलती है.  काशिफ चौधरी और नाला शीरीं का निकाह 21 मार्च को लॉक डाउन के बीच ही में हुआ लेकिन उनहोंने 12 घंटों के भीतर ही अपने नए विवाहित जीवन का मज़ा लिए बगैर ही अपनी अपनी ड्यूटी पर लोवा और न्यू यॉर्क इस खतरनाक महामारी से लड़ने के लिए लौट आए.

ईरानी चिकित्सक, डॉ. शिरीन रूहानी (Dr Shirin Rouhani) ने कोरोनोवायरस रोगियों का इलाज करते हुए अपना जीवन खो दिया. उनके जीवन के अंतिम क्षण महामारी के खिलाफ लड़ रहे योद्धाओं के लिए बहुत ही प्रेरक रहे. वह अपनी अंतिम सांस तक कोरोना पीड़ीत मरीजों का इलाज करती रहीं. 22 मार्च को उनकी मृत्यु से पहले, ईरान में डॉ मेहदी वर्जी (Dr Mehdi Variji) समेत 13 चिकित्सा कर्मचारियों की मृत्यु हो चुकी थी.

इटली में, जहां कोरोनोवायरस के चलते 50 से अधिक डॉक्टरों ने अपना जीवन खोया, उनमें कई स्थानीय मुस्लिम समुदाय के थे.

UCOII जो इटली का सबसे बड़ा मुस्लिम संगठन है के अध्यक्ष यासीन लाफराम कहते हैं, “बहुत सारे मुस्लिम डॉक्टर, जिनमें से कई सेवानिवृत्त हो चुके थे, अब फ्रंटलाइन पर हैं. उनमें से कुछ बीमार हो गए और कुछ की मृत्यु भी हो गई: वे ऐसे नायक हैं जिन्हें उन सभी इतालवी डॉक्टरों के साथ मिलकर सम्मानित किया जाना चाहिए जो इस आपातकाल का सामना कर रहे हैं. ” इनमें डॉ अब्देल सत्तार एयरौड (Dr Abdel Sattar Airoud) और डॉ अब्दुलघानी तकी मक्की (Dr Abdulghani Taki Makki) शामिल हैं जिन्होंने कोविड-19 संक्रमण से प्रभावित रोगियों का इलाज करते हुए अपनी जान दे दी.

मेडस्केप के कोरोनावायरस रिसोर्स सेंटर के अनुसार, हजारों कोविड-19 रोगियों को बचाने के दौरान दुनिया में अब तक एक सौ से अधिक स्वास्थ्य कर्मचारियों की मौत हो चुकी है, इनमें से कई नायक मुस्लिम थे जिनमें 2 पाकिस्तान से थे, एक मिस्र और एक मलेशिया से थे. दिलचस्प बात यह है कि इस सूची में भारतीय मूल के 3 नाम भी शामिल हैं, जिन्होंने कोरोनोवायरस के खिलाफ लड़ाई में अपने जीवन का बलिदान दिया. इनमें डॉ सत्यवर्धन राव येरुबांदी और माधवी आया संयुक्त राज्य अमेरिका में चिकित्सक सहायक और यूके की क्लिनिकल ​​फार्मासिस्ट पूजा शर्मा हैं. इस सूची में चीन से कोरोना शहीदों के 10 नाम शामिल हैं.

इसके अलावा, भारतीय मलयाली नर्स 58 वर्षीय बीना जॉर्ज की 5 अप्रैल को आयरलैंड में खूंखार कोरोनावायरस से लड़ते हुए मृत्यु हो गई.

भारत में भी, कई मुस्लिम डॉक्टर वैश्विक स्वास्थ्य संकट के खिलाफ युद्ध में समर्पित रूप से राष्ट्र की सेवा कर रहे हैं. महामारी के खिलाफ बचाव अभियान में एएमयू, जामिया हमदर्द, हैदराबाद के कई मेडिकल कॉलेज और अन्य शहरों के मुस्लिम डॉक्टर आदि सबसे आगे हैं. देश के विभिन्न हिस्सों में सरकारी अस्पतालों में कई मुस्लिम डॉक्टर महामारी रोकने में दूसरों के साथ अपनी भूमिका निभा रहे हैं.

इंदौर की डॉ ज़किया सईद का नाम पिछले दिनों तब चर्चा में आया जब एक भीड़ द्वारा उन पर हमला किया गया, जब वह 3 अप्रैल को डॉ तृप्ति कटारे और अन्य लोगों के साथ कोरोनोवायरस से संबंधित स्वास्थ्य मिशन पर गयी थीं.

देश के विभिन्न भागों से कुछ कहानियाँ इंदौर की तरह की आ रही हैं जहाँ कोविड-19 टास्क फोर्स को पब्लिक प्रतिरोध का करना पड़ रहा है, जिसमें सभी वर्गों के अज्ञानी लोग इसमें असहयोग कर रहे हैं.

हालाँकि, फासीवादी मीडिया अपने घृणा के एजेंडे के साथ बेलगाम है और अपने मामले को एक ख़ास दृष्टिकोण से बहुत ही कुटिल कहानियों के साथ फैला रही है. एक तरफ, फेक न्यूज़ लोगों को डरा रहे हैं कि पुलिस और स्वास्थ्य टीम उन्हें स्वस्थ्य होने के बावजूद क्वारंटिन सेंटर ले जा सकती हैं वहीँ दूसरी तरफ वह चुनिंदा रूप से मुसलमानों को बीमारी के बड़े वाहक के तौर पर और महामारी को रोकने में सहयोग न करने वाले लोगों के तौर पर पेश कर रही है. मीडिया और सोशल मीडिया की यह दोहरी तलवार माहौल को सांप्रदायिक बना रही है जिसमें स्वास्थ्य कर्मी और प्रभावित लोग दोनों एक दुसरे को संदिग्ध की तरह देख सकते हैं.

इंदौर में भीड़ की गड़बड़ी में घायल डॉ कटारे ने मीडिया को बताया कि स्थानीय निवासियों की कोई गलती नहीं थी, लेकिन कुछ असामाजिक तत्वों ने उन्हें उकसाया था. ये तथाकथित “असामाजिक तत्व” वे लोग हो सकते हैं जिन्हें सोशल मीडिया की फर्जी खबरों के आधार पर यह दिमाग में बिठाया जा रहा है कि कोरोनावायरस के नाम पर स्वस्थ मुसलमानों को घातक वायरस से संक्रमित करने के लिए अस्पताल ले जाया जा सकता है. ऐसे फर्जी समाचार भी घूम रहे हैं कि सरकारी निकाय कोरोना रोगी की खोज की आड़ में विवादास्पद एनपीआर/एनआरसी से संबंधित जानकारी एकत्र कर रहे हैं, हालांकि इस प्रकोप के बाद एनपीआर की प्रक्रिया को सरकार द्वारा निलंबित कर दिया गया है. इसलिए, लोग आम तौर पर अधिकारियों को कोई भी व्यक्तिगत जानकारी देने से हिचक रहे हैं और अक्सर तब संदिग्ध हो जाते हैं जब स्वास्थ्य कर्मचारी और पुलिस उनके इलाकों में जाते हैं.

मीडिया फासीवाद ने भारत में चिकित्सक बिरादरी को इतना प्रभावित किया है कि राजस्थान के भरतपुर के सरकारी जनाना अस्पताल में एक डॉक्टर और ओबीएस और स्त्रीरोग विभाग के प्रमुख ने धर्म के कारण एक मुस्लिम महिला को प्रसव के लिए प्रवेश देने से इनकार कर दिया. यह पिछले हफ्ते एक ऐसे राज्य में हुआ था जहां कांग्रेस पार्टी की धर्मनिरपेक्ष सरकार वर्तमान में शासन कर रही है और वहां स्थानीय विधायक राज्य के स्वास्थ्य मंत्री हैं. गर्भवती महिला को उसी एम्बुलेंस में अपने बच्चे को जन्म देना पड़ा जिसपर उन्हें अस्पताल ले जाया गया था लेकिन बच्चा मर गया.

संबंधित डॉक्टर की अनैतिक और अनौपचारिक कार्रवाई की निंदा करते हुए और उसके खिलाफ कार्रवाई का आश्वासन देते हुए, राजस्थान के पर्यटन मंत्री विश्वेंद्र सिंह ने कहा की, “इससे ज्यादा शर्मनाक कुछ नहीं हो सकता.” उन्होंने मुस्लिम संगठन के साथ कोरोनोवायरस के फैलाव को जोड़ने के लिए भी मीडिया की आलोचना की, जिसके कारण कुछ चिकित्सकों के अंदर ऐसा गलत रवैया विकसित हो सकता हो, हुआ है. यह ‘शर्मनाक’ कृत्य उस राज्य से सुर्खियों में आया, जहाँ देश के पहले स्वास्थ्य कर्मी इस  कोरोनवायरस से प्रभावित होने वाले भीलवाड़ा के पुरुष मुस्लिम नर्स निसार अहमद थे.

यह आश्चर्यजनक है कि दुनिया भर में चिकित्सा बिरादरी महामारी के खिलाफ मानवता के उद्धारकर्ता के रूप में लड़ रहे हैं, यहां तक ​​कि भारत में भी अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं, फिर भी इस तरह की घटनाओं से न केवल पेशे की छवि धूमिल होती है, बल्कि इससे देश का भी नाम ख़राब होता है. तब्लीगी प्रकरण के बाद, इस विपदा को ज़हरीले ब्लेम-गेम में बदलने के लिए भारत की आलोचना पहले ही दुनिया के विभिन्न हिस्सों में की जा रही है.

वास्तव में, लाखों डॉक्टर, नर्स और अन्य स्वास्थ्य कार्यकर्ता फ्रंटलाइन सैनिकों के रूप में महामारी के खिलाफ युद्ध लड़ रहे हैं. उनमें से कई ने मानवता की रक्षा करते हुए अपने जीवन का बलिदान किया है. यह गर्व से महसूस किया जा सकता है कि 130 स्वास्थ्य कर्मचारियों में से लगभग 20%, यानी हर पांचवां शख्स जिन्होंने पूरी दुनिया में महामारी से लड़ते हुए अपने जीवन का बलिदान दिया है, वह मुस्लिम है.

विभिन्न आशंकाएं आम लोगों और चिकित्सकों पर एक ही जैसे हावी हैं जैसे कि सामाजिक गड़बड़ी, क्वारंटिन, मृत्यु, आर्थिक संकट, मानवता का भविष्य, आदि. भारत इस जटिल स्थिति में अतिरिक्त कारकों को जोड़ने को लेकर ख़ास है, जहाँ बड़े पैमाने पर विस्थापन और नफ़रत शामिल हैं. सांप्रदायिकता किसी भी अच्छे कारण की सेवा के बजाय अभूतपूर्व आपदा के खिलाफ भारत के संघर्ष को कमजोर कर सकती है.

जो लोग इतने महत्वपूर्ण समय में इस खेल को खेल रहे हैं, वे शायद ही देशभक्त और अच्छे इंसान माने जा सकते हैं.

(अब्दुल रशीद अगवान दिल्ली में रहते हैं और प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता और विद्वान हैं.)

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