जेएनयू आंदोलन: ज़मीं पे बहते लहू का हिसाब चाहता हूँ, मैं अब गुलाब नहीं इंक़लाब चाहता हूँ




पटना (बिहार): जमीं पे बहते लहू का हिसाब चाहता हूँ, मैं अब गुलाब नहीं इंक़लाब चाहता हूँ, अच्छी शिक्षा और सस्ती शिक्षा सबका अधिकार, जेएनयू वीसी होश में आओ, दिल्ली पुलिस मुर्दाबाद जैसे प्लेकार्ड और नारों से आज पटना की सड़कें कई घंटों तक गूंजती रहीं.

यह सब हुआ जेएनयू में बढ़ाई गयी फ़ीस के चलते दिल्ली में हजारों छात्रों द्वारा निकाले गए शान्ति मार्च पर पुलिसिया दमन से लहूलुहान छात्रों के विरोध में पटना में. पटना में इस शान्ति मार्च की अगुवाई कर रहा था एलुमनाई एसोसिएशन ऑफ़ जेएनयू – बिहार चैप्टर. शान्ति मार्च गांधी मैदान स्थित गांधी से मिलकर बुद्ध स्मृति पार्क स्थित बुद्ध तक पहुंचा और शांति के साथ अपनी मांगों को इतिहास के इन दो पथप्रदर्शकों की मूक गवाही में जन जन तक पहुंचाया.

शांतिपूर्ण मार्च के बाद प्रेस को दी गयी विज्ञप्ति में एसोसिएशन ने दिल्ली में हुए छात्रों पर पुलिसिया कारवाई की निंदा की और तत्काल प्रभाव से फ़ीस-वृद्धि को वापस लेने की मांग की.

विज्ञप्ति में कहा गया कि शातिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर रहे छात्रों के ऊपर दिल्ली पुलिस द्वारा किए गए क्रूर बल-प्रयोग की कड़ी निंदा करते हैं और मांग करते हैं कि जेएनयू छात्र-संघ और छात्र-समुदाय के मतानुसार प्रस्तावित फ़ीस-वृद्धि को पूरी तरह वापस लिया जाए क्योंकि सस्ती और समान शिक्षा सभी भारतियों का अधिकार है. साथ ही विज्ञप्ति में यह भी कहा गया कि छात्रों पर लगाए गए अनावश्यक प्रतिबन्ध को हटाया जाए.

इस शान्तिपूर्ण विरोध मार्च में नेताओं, विद्यार्थियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों ने पूरे उत्साह से हिस्सा लिया और लगा कि जेएनयू आंदोलन पूरे देश को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है.

ज्ञात रहे कि जेएनयू देश का ही नहीं बल्कि विश्व का जाना माना विश्वविद्यालय है जिसने देश को संतरी से लेकर मंत्री तक दिया है. निर्मला सीतारमण और जयशंकर दो वर्तमान कैबिनेट मंत्री इसी विश्वविद्यालय की देन हैं. उच्च शिक्षा के इस केंद्र में देश भर से साधारण परिवार के बच्चे अपनी पढाई पूरी करके देश की सेवा में लगते हैं. एक आंकड़े के अनुसार जेएनयू के 40% छात्र ऐसे परिवारों से आते हैं जिनकी आय महिना के दस हजार से भी कम हैं.

हाल के दिनों में यह विश्वविद्यालय कई कारणों से सुर्ख़ियों में रहा है. कभी कोई नेता परिसर में कंडोम गिनता हुआ पाया जाता है तो कोई नेता इसे आतंकी, अर्बन नक्सल के गढ़ और बहुत सारी उपमाओं से सुशोभित करते रहे हैं. जबकि सत्य यह है कि देश की ब्यूरोक्रेसी का एक अच्छा खासा हिस्सा इसी विश्वविद्यालय से हो कर आता है.

अभी हाल में ही इसकी फ़ीस कई गुना बढ़ा दी गयी जिसके खिलाफ विद्यार्थियों ने दिल्ली में शांतिपूर्ण मार्च किया था जिसे रोकने के लिए दिल्ली पुलिस ने उन पर लाठी चार्ज किया और कई विद्यार्थी लहूलुहान हुए थे. इस आंदोलन को अब देश भर से समर्थन मिल रहा है.

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