ब्राह्मणवाद को खुली चुनौती देने वाले पेरियार का जन्म दिन आज




पेरियार अर्थात सम्मानित व्यक्ति के नाम से विख्यात, इरोड वेंकट नायकर रामासामी (17 सितम्बर, 1879-24 दिसम्बर, 1973) का दक्षिण भारतीय समाज खास कर तमिल समाज में गहरा असर आज तक है. जो लोग भी तर्क का सम्मान करते हैं वह पेरियार के आगे अपना मस्तक झुकाते हैं चाहे वह मार्क्स और लेनिन के दीवाने हों या बाबा साहेब के चाहने वाले, चाहे वह किसी भगवान के आगे झुकते हों, न झुकते हों या ईश्वर को पूरी तरह से खारिज करते हों सब पेरियार को अपना मार्गदर्शक मानते हैं.

पेरियार ब्राह्मणवाद के विरोधी तो थे लेकिन वह शुरू में कांग्रेसी और कट्टर गांधीवादी थे. वह गांधी की शराब विरोधी, खादी और छुआछूत मिटाने की नीतियों के प्रति आकर्षित थे.

पेरियार ने मद्रास राज्य काँग्रेस अध्यक्ष का पद भी संभाला लेकिन यह बहुत दिनों तक नहीं चला.

1924 में केरल में त्रावणकोर के राजा के मंदिर की ओर जाने वाले रस्ते पर दलितों के प्रवेश को प्रतिबंधित करने का विरोध हुआ था. इसका विरोध करने वाले नेताओं को राजा के आदेश से गिरफ़्तार कर लिया गया और इस लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए कोई नेतृत्व नहीं था. तब, आंदोलन के नेताओं ने इस विरोध का नेतृत्व करने के लिए पेरियार को आमंत्रित किया गया.

यही वह समय था जब पेरियार कांग्रेस से अलग हो गए और गांधी की बात भी नहीं सुनी. पेरियार ने मद्रास राज्य काँग्रेस अध्यक्ष के पद से इस्तीफ़ा दिया और गांधी के मना करने पर भी केरल चले गए.

इत्तेफाक ऐसा कि वह जिस राजा के आदेश के खिलाफ केरल में विरोध करने गए थे वह राजा उनके पक्के दोस्त थे. जब राजा को पता चला कि पेरियार केरल आ रहे हैं तो उनहोंने पेरियार के शान में स्वागत समारोह का आयोजन किया लेकिन पेरियार ने उनका आमंत्रण स्वीकार नहीं किया.

राजा के खिलाफ उनहोंने पूरी शिद्दत के साथ विरोध प्रदर्शन किया. परिणामस्वरूप राजा को गुस्सा आया और वह जेल गए. कई महीने तक वह जेल में ही रहे.

गांधी की ही तरह उनहोंने अपने आंदोलनों में अपनी पत्नी नागमणि को भी सहभागी बनाया. ताड़ी आन्दोलन में उनकी पत्नी ने अपने खुद के नारियल के बाग़ नष्ट किए. पत्नी पेरियार के मुद्दों पर महिला विरोध प्रदर्शन की अगुवाई करतीं.

देश में चल रहे जातीय भेदभाव को लेकर वह हमेशा मुखर रहते. आज की ही तरह हर जगह ब्राह्मणों का बोल बाला था और गैर ब्राह्मणों का बुरा हाल था. इसी को लेकर उनहोंने देश में गैर-ब्राह्मणों यानी द्रविड़ के आत्म-सम्मान के लिए आंदोलन शुरू किया.

बाद में वह दक्षिण भारतीय लिबरल फेडरेशन (जस्टिस पार्टी के रूप में विख्यात) के अध्यक्ष बने. यह संगठन ब्राह्मणवाद का घोर विरोधी था और इसकी स्थापना 1916 में ही की गयी थी. 1944 में इसी पार्टी का नाम बदलकर द्रविड़ कज़गम किया.

पेरियार हिन्दू धर्म को ब्रह्मणों की एक साज़िश मानते थे. वह मानते थे कि समाज में जो ऊंच नीच है वह वैदिक हिंदू धर्म के कारण है. वह कहते थे कि जो धर्म समाज को जाति के आधार पर विभिन्न वर्गों में बांटता है और जो एक विशेष जाति (ब्राह्मणों) को सबका उद्धारक बनाए उसका आदेश नहीं मानना चाहिए और जब तक इसका वर्चस्व खत्म नहीं होगा समाज की कुरीतियाँ खत्म नहीं होंगी.

पेरियार ने सिन्दूर और मंगलसूत्र पहनने को लेकर भी आन्दोलन किया. वह कहते थे कि विवाह के यह चिह्न केवल महिलाओं के लिए ही क्यों?

वह दक्षिण भारतीय राज्यों को मिलाकर एक अलग द्रविड़नाडू (द्रविड़ देश) बनाने चाहते थे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. आज ही की तरह जब दक्षिण भारतियों पर हिंदी थोपने की कोशिश की गयी तब भी उनहोंने इसका पुरजोर विरोध किया था.

उनका एक मशहूर वाक्य था: “कुछ भी केवल इसलिए स्वीकार नहीं करो कि मैंने कहा है. इस पर विचार करो. अगर तुम समझते हो कि इसे तुम स्वीकार सकते हो तभी इसे स्वीकार करो, अन्यथा इसे छोड़ दो.”

पेरियार रामायण को धार्मिक किताब नहीं मानते थे. उनका कहना था कि यह एक राजनीतिक पुस्तक है, जिसे ब्राह्मणों ने दक्षिणवासी अनार्यों पर उत्तर के आर्यों की विजय और प्रभुत्व को जायज ठहराने के लिए लिखा. यह गैर-ब्राह्मणों पर ब्राह्मणों और महिलाओं पर पुरुषों के वर्चस्व का भी उपकरण है. पेरियार ने अपनी रामायण लिखी जिसे हिंदी में सच्ची रामायण से अनुवाद किया गया. इस पुस्तक पर दिसंबर, 1969 को तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रतिबंध लगाया था लेकिन इसे सुप्रीम कोर्ट ने बाद में यह कह कर खारिज कर दिया कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पहरा है.

पेरियार के तर्क को आज तक कोई चुनौती नहीं दे सका. इसके बावजूद उन्हें हिन्दू समाज के विरोधी के रूप में प्रचारित किया जाता रहा है.

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