प्रेस समीक्षा: ‘डबल इंजन’ का ‘डबल दवाब’




उपेन्द्र कुशवाहा मोतिहारी में, अंबेडकर के महापरिनिर्वाण दिवस पर रालोसपा द्वारा आयोजित चिंतन शिविर में (फ़ोटो साभार: ट्विटर)

-मनीष शांडिल्य

बीते साल जब बिहार में एनडीए की सरकार बनी तो इसे सत्ता पक्ष की ओर से ‘डबल इंजन की सरकार’ बताया गया. माने कि पटना और दिल्ली में एक ही गठबंधन की सरकार होने से विकास की गाड़ी ज्यादा तेज दौड़ेगी. इस डबल इंजन का कितना फायदा सूबे को हुआ यह तो आने वाले समय में पता चलेगा लेकिन मीडिया के अघोषित सेंसरशिप पर इस ‘डबल इंजन‘ का ‘डबल दवाब‘ साफ़ दिख रहा है.

इसका उदाहरण शुक्रवार को पटना से छपने वाले ज्यादातर बड़े अख़बारों में देखने को मिला. कुशवाहा ने कल मोतिहारी में मंदिर मुद्दे पर भाजपा की तीखी आलोचना की लेकिन पटना के ज्यादातर अखबारों ने या तो यह खबर नहीं छापी या खबर छापी भी तो उसे प्रमुखता से जगह नहीं दी.



उपेन्द्र कुशवाहा बिहार एनडीए में सीट शेयरिंग के फ़ॉर्मूले पर बीते करीब डेढ़ महीने से नाराज चल रहे हैं और इस मुद्दे पर मुखर हैं. उपेन्द्र कुशवाहा ने ही घोषणा कर रखी थी कि चार से छह दिसम्बर के बीच रालोसपा कार्यकारिणी की बैठक के बाद वे एनडीए में बने रहने पर अंतिम फैसला करेंगे. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. रालोसपा द्वारा मोतिहारी में आयोजित खुला अधिवेशन को संबोधित करते हुए उपेन्द्र कुशवाहा ने एक बात को छोड़ लगभग सारी पुरानी बातें ही दोहराईं.

मोतिहारी में कुशवाहा द्वारा जो एक मात्र नई और बड़ी बात कही गई, वह था राम मंदिर निर्माण जैसे भाजपा के कोर एजेंडे पर उनका विरोध. उन्होंने कहा, “जनता के ध्यान को भटकाने के लिए अंतिम समय में मंदिर निर्माण की बात की जा रही है. सामने चुनाव है तो चर्चा इस बात पर होनी चाहिए कि हमने महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी दूर की या नहीं? लेकिन देश की जनता इस पर सवाल नहीं पूछे इसलिए वे (भाजपा) लोक सभा चुनाव के पहले मंदिर निर्माण का मुद्दा उठाने की बात कर रहे हैं. रालोसपा भाजपा के इस रवैये का सख्त विरोध करती है. हम इस पर एतराज व्यक्त करते हैं. हम भाजपा से कहना चाहते हैं कि मंदिर निर्माण में हस्तक्षेप न करे और वह कम-से-कम चुनावी लाभ के लिए यह काम बिल्कुल न करे.”

भाजपा के एक सहयोगी दल द्वारा मंदिर निर्माण के मुद्दे पर भाजपा का विरोध करना हर लिहाज से बड़ी खबर थी. लेकिन पटना के बड़े अखबारों की ‘समझ’ दूसरी निकली. यह सही है कि हाल के दिनों में कुशवाहा का ‘कभी हाँ, कभी न”, मोल-भाव करने वाला रवैया सामने आया है लेकिन उनके इस रुख के कारण उनके किसी बड़े बयान को मीडिया से गायब कर दिया जाए ऐसा तो पत्रकारिता के किसी किताब में नहीं लिखा है.

शुक्रवार को पटना से निकले करीब-करीब सभी बड़े हिंदी अखबारों से यह खबर लगभग गायब थी. प्रभात खबर, दैनिक भास्कर और राष्ट्रीय सहारा ने रालोसपा के कल के मोतिहारी के कार्यक्रम और उसमें कुशवाहा के भाषण की खबर पटना में छापी ही नहीं. दिलचस्प यह भी कि दैनिक भास्कर और राष्ट्रीय सहारा ने रालोसपा के लम्बे समय से बागी विधायक ललन पासवान का वह बयान छापा जिसमें उन्होंने एनडीए नहीं छोड़ने की घोषणा के लिए उपेन्द्र कुशवाहा पर निशाना साधा था. लेकिन इन दोनों अख़बारों ने वह खबर नहीं छापी जिसके आधार पर ललन पासवान ने यह बयान दिया था.

हिंदुस्तान अखबार ने कुशवाहा के कल के भाषण पर आधारित दो खबर छाप कर ‘सेंसरशिप दवाब’ का अपने तरीके से सामना किया. इसने पहले पन्ने पर जो खबर छापी उसमें कुशवाहा द्वारा भाजपा पर हमले का जिक्र नहीं था. हां, अपने अन्दर के पन्ने पर एक खबर में उसने यह खबर छापी और शीर्षक दिया, “मुद्दों से भटकाने को दिया जा रहा मंदिर का नारा: उपेन्द्र”



दैनिक जागरण भी इस खबर को छापने लायक नहीं समझा. उसने उपेन्द्र के भाषण की खबर अहम माने जाने दूसरे पन्ने पर छापी, इसी बहाने कुशवाहा से जुड़े एक पुराने राजनीतिक घटनाक्रम के आधार पर भी स्टोरी की मगर यह नहीं बताया कि कुशवाहा ने भाजपा पर राम मुद्दे को लेकर हमला बोला है.

अंग्रेजी अख़बारों में द टेलीग्राफ ने अपने अन्दर के पन्ने तीन कॉलम में यह खबर अच्छे से छापी और उसमें कुशवाहा द्वारा कही गई ‘नई बात’ का प्रमुखता से जिक्र किया. वहीं हिन्दुस्तान टाइम्स ने कुशवाहा के कार्यक्रम की खबर पहले पन्ने पर प्रमुखता से जरूर छापी मगर भाजपा की तीखी आलोचना वाला हिस्सा ‘शेष भाग’ बनाकर अन्दर के पन्ने पर छापा.

साल 2012 में ओपन मैगज़ीन ने ‘एडिटर-इन-चीफ ऑफ़ बिहार’ शीर्षक से एक रिपोर्ट छापी थी जिसमें उसने यह बताया था कि सूबे में कैसा सेंसरशिप है और कैसे एक मुख्यमंत्री ने राज्य की मीडिया को अपनी इच्छानुसार झुका दिया है. उपेन्द्र कुशवाहा से जुडी खबर की शुक्रवार सुबह हुई ‘हत्या’ के आईने में देखें तो इस रिपोर्ट के छह साल बाद स्थिति और बदतर जान पड़ती है. बिहार के मीडिया का बड़ा हिस्सा अब ‘डबल इंजन’ के ‘डबल दवाब’ में है, पटना और दिल्ली दोनों जगह का सेंसरशिप कबूल कर चुका है.

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